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आप जो साबूदाना व्रत में खाते हैं, उसका युद्ध से है कनेक्शन, जानें इसके पीछे की दिलचस्प कहानी

क्या आप जानते हैं जिस साबूदाने को आप व्रत में चाव से खाते हैं आखिर वो आपकी थाली तक कैसे आया.

आप जो साबूदाना व्रत में खाते हैं, उसका युद्ध से है कनेक्शन, जानें इसके पीछे की दिलचस्प कहानी
साबूदाने का रोचक इतिहास.

जब भी हमारे घरों में कोई व्रत या उपवास होता है, तो सबसे पहली चीज जो दिमाग में आती है, वह है खिली-खिली साबूदाना खिचड़ी या फिर क्रिस्पी साबूदाना वड़ा. नवरात्रि हो या एकादशी, सात्विक फलाहार के रूप में इसे बड़े चाव से खाया जाता है. महाराष्ट्र से लेकर उत्तर भारत तक, यह हम सबका पसंदीदा फलाहार है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस साबूदाना को हम पूरी श्रद्धा और आराम से व्रत में खाते हैं, उसका इतिहास युद्ध, भुखमरी और अकाल जैसी गंभीर घटनाओं से जुड़ा हुआ है? आइए आज आपको बताते हैं कि साबूदाना ब्राजील के जंगलों से निकलकर आपकी थाली तक कैसे पहुंचा और इसके पीछे की दिलचस्प कहानी क्या है.

​साबूदाना का सफर- 

​मूल रूप से साबूदाना हमारे देश की देन नहीं है. इसका शुरुआती इतिहास दक्षिण अमेरिका के ब्राजील देश से जुड़ा है. वहां के जंगलों में उगने वाले कसावा (यानी टैपिओका) की जड़ों से स्टार्च निकालकर इसे तैयार किया जाता था. 19वीं सदी के दौरान पुर्तगाली और अन्य विदेशी व्यापारियों के जरिए यह दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुंचा.
  
​भारत में इसकी एंट्री दक्षिण राज्यों खासकर केरल के रास्ते हुई. 1800 के दशक के आखिर में जब त्रावणकोर (केरल) का इलाका भयंकर अकाल और सूखे की चपेट में था, तब लोगों के पास खाने के लिए अनाज नहीं बचा था. ऐसे मुश्किल वक्त में वहां के राजा ने लोगों की जान बचाने के लिए ज़मीन के नीचे उगने वाले इस कंद (कसावा/टैपिओका) का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया. इस तरह इस पौधे ने अकाल के दौरान केरल के लाखों लोगों की भूख मिटाई और उनकी जिंदगियां बचाईं.

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Photo Credit: Canva

द्वितीय विश्व युद्ध और चावल की कमी का दौर-

​केरल के बाद साबूदाना के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ आया दूसरे विश्व युद्ध के दौरान. युद्ध के उस भयानक दौर में दुनियाभर में खाने-पीने की भारी किल्लत हो गई थी. सैनिकों और आम जनता के लिए अनाज जुटाना बहुत मुश्किल हो रहा था. भारत के कई हिस्सों में भी चावल की भारी कमी हो गई थी और लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए थे. तब युद्ध के उस संकट काल में टैपिओका से बनने वाला यह सस्ता और पेट भरने वाला विकल्प लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ. युद्ध के समय जब दाल और चावल आसानी से नहीं मिल पा रहे थे, तब साबूदाना और इससे जुड़ी चीजें लोगों का पेट भरने के काम आईं. इसके बाद 1940 के दशक के शुरुआती सालों में (खासकर 1943 के आसपास) तमिलनाडु के सेलम जिले में देश की पहली कमर्शियल साबूदाना यूनिट्स लगीं. धीरे-धीरे यह हमारी संस्कृति और व्रत-त्योंहारों का अहम हिस्सा बन गया.

​व्रत का सुपरफूड और सेहत का खजाना-

​युद्ध और अकाल के संकट से निकलकर साबूदाना ने भारतीय रसोई में एक बहुत ही खास जगह बना ली. हमारे देश में व्रतों के दौरान अन्न और नमक खाने की मनाही होती है, ऐसे में साबूदाना शरीर को तुरंत एनर्जी देने का काम करता है. इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है जो उपवास के दौरान कमजोरी नहीं आने देता. 

साबूदाना को लेकर न्यूट्रिशनिस्ट का क्या है कहना यहां देखें पूरा वीडियो
 

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