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Exclusive: दूध-पनीर से मसालों तक, कैसे रुकेगी मिलावट? फूड सेफ्टी कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने बताया समाधान

खाना सुरक्षित है या नहीं, यह सिर्फ देखकर पता नहीं चलता. महाराष्ट्र के फूड सेफ्टी कमिश्नर तुकाराम मुंढे बता रहे हैं कि खेत से थाली तक खाने की ट्रैकिंग भारत में फूड सेफ्टी का सिस्टम कैसे बदल सकती है.

Exclusive: दूध-पनीर से मसालों तक, कैसे रुकेगी मिलावट? फूड सेफ्टी कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने बताया समाधान
Photo: Canva, NDTV

विश्व खाद्य दिवस 2026 की थीम है "Innovate Today. Nourish Tomorrow" (आज नया सोचें, कल का पोषण संवारें). यह थीम हमें सिर्फ नई तकनीकों या नए उत्पादों तक सीमित रहने के बजाय यह सोचने का मौका देती है कि हम अपने पूरे फूड सिस्टम को ज्यादा सुरक्षित, भरोसेमंद और जवाबदेह कैसे बनाएं. भारत के लिए इस दिशा में सबसे बड़ा और कारगर कदम यह हो सकता है कि हम खाने की 'ट्रेसेबिलिटी' (सप्लाई चेन में माल की आवाजाही का पूरा हिसाब-किताब) को खेत से लेकर थाली तक अनिवार्य और नियमित बनाएं.

भारत में लोग जो खाना खाते हैं, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अनौपचारिक या खुले बाजारों से होकर आता है. इनमें खुला दूध, मसाले, खाने का तेल, फल-सब्जियां और मिठाइयां शामिल हैं. जब कभी किसी चीज में कोई खराबी या मिलावट मिलती है, तो उसके असली स्रोत (फैक्ट्री या खेत) तक पहुंचने में हफ्तों लग जाते हैं. तब तक बहुत मुमकिन है कि वह खराब खाना लोग खा चुके हों. 2024-25 में देश भर में जांचे गए 1.7 लाख से ज्यादा फूड सैंपल्स में से 34,388 (यानी लगभग हर पांचवां सैंपल) तय मानकों पर फेल पाया गया. ऐसे किसी भी नतीजे का फायदा तभी है, जब हम उस खराब बैच के स्रोत तक फौरन पहुंच सकें.

इसके लिए अगला कदम यह होना चाहिए कि एक आसान डिजिटल सिस्टम के जरिए लाइसेंस, इनवॉइस (बिल), बैच नंबर और माल भेजने के रिकॉर्ड को आपस में जोड़ दिया जाए. यह तरीका छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के लिए भी आसान होना चाहिए. मोबाइल पर रखा गया एक साधारण रिकॉर्ड कि माल किससे खरीदा गया और आगे किसे बेचा गया सप्लाई की पूरी चेन पर नजर रखने के लिए काफी है.

इसका फायदा सिर्फ छापे मारने तक सीमित नहीं है. जब कोई सैंपल फेल होगा, तो फूड सेफ्टी अफसर पूरी दुकान या मंडी का सारा माल सीज करने के बजाय कुछ ही घंटों में उस खास खराब लॉट को अलग कर सकेंगे. ईमानदार कारोबारियों को इसका फायदा मिलेगा क्योंकि वे साबित कर सकेंगे कि उनका माल पूरी तरह खरा है. वहीं ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा कि जो खाना वे खरीद रहे हैं, उसका पूरा इतिहास साफ और जांचा-परखा है.ट्रेसेबिलिटी का मकसद यही होना चाहिए कि गड़बड़ी सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय हम खराब खाना लोगों तक पहुंचने से पहले ही रोक सकें.

सुरक्षा से समझौता किए बिना सब तक खाना पहुंचाना

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खाना हर किसी की पहुंच में होना और उसका सुरक्षित होना, दो अलग-अलग बातें नहीं हैं. जो खाना असुरक्षित है, उसे सही मायनों में 'सुलभ खाना' नहीं कहा जा सकता. जब खाना सस्ता तो होता है लेकिन सुरक्षित नहीं होता, तो उसकी असली कीमत हम बाद में चुकाते हैं अस्पतालों के भारी बिल, काम से छूटने वाली दिहाड़ी, बच्चों का कमजोर पड़ता स्वास्थ्य और आम जनता का टूटता भरोसा.

आंकड़े बेहद गंभीर हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 2026 के अनुमानों के मुताबिक, दुनिया भर में खराब खाने की वजह से हर साल लगभग 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और 15 लाख लोगों की जान चली जाती है. 5 साल से कम उम्र के बच्चे दुनिया की आबादी का सिर्फ 9% हैं, लेकिन दूषित खाने से होने वाली बीमारियों का लगभग एक-तिहाई बोझ अकेले झेलते हैं.

भारत की बात करें तो भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का अनुमान है कि देश में हर साल करीब 10 करोड़ लोग खाने से होने वाली बीमारियों का शिकार होते हैं, जिससे देश को लगभग 15 अरब डॉलर का नुकसान होता है. 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 15 से 17.7 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है. वहीं विश्व बैंक का अनुमान है कि खराब खाने के कारण कम और मध्यम आय वाले देशों को हर साल काम के नुकसान और इलाज के खर्च के रूप में लगभग 110 अरब डॉलर का फटका लगता है.

इसलिए खाद्य सुरक्षा (सबको खाना मिलना) और भोजन की गुणवत्ता (सुरक्षित खाना) दोनों पर एक साथ इन पांच अहम मोर्चों पर काम करना होगा:

1. छोटे खाद्य कारोबारियों को मजबूत करना: भारत में ज्यादातर खाना छोटे दुकानदार, ढाबे, मिठाई की दुकानें और डेयरियां बेचती हैं. इनमें से बहुत से लोग किसी बदनियति से नहीं, बल्कि सही जानकारी, साफ पानी, कोल्ड स्टोरेज या ट्रेनिंग की कमी के कारण नियमों का पालन नहीं कर पाते. FSSAI का FoSTaC ट्रेनिंग प्रोग्राम, 'क्लीन स्ट्रीट फूड हब' और 'ईट राइट इंडिया' जैसी पहलें, साथ ही फूड सेफ्टी एक्ट की धारा 32 के तहत मिलने वाला सुधार नोटिस, कारोबारियों को अपनी कमियां सुधारने का पूरा मौका देते हैं. नियमों का पालन सख्त होना चाहिए, लेकिन निष्पक्ष भी.

2. सरकारी भोजन योजनाओं में सबसे ऊंचे मानक: मिड-डे मील (पीएम पोषण), आंगनवाड़ी राशन, आदिवासी आश्रम शालाओं और हॉस्टल की कैंटीनों में वे बच्चे और जरूरतमंद खाना खाते हैं, जिनके पास अपनी पसंद चुनने का कोई विकल्प नहीं होता. इनकी रसोइयों, कैटरर्स और सप्लायर्स की जांच और सैंपलिंग भी किसी भी कमर्शियल होटल जितनी ही गंभीरता से होनी चाहिए. 'ईट राइट स्कूल' और 'ईट राइट कैंपस' जैसी पहलें इन संस्थानों में सुरक्षा का माहौल तैयार कर सकती हैं.

3. बचे हुए खाने का सुरक्षित बंटवारा: यूएनईपी (UNEP) के 2024 के फूड वेस्ट इंडेक्स के अनुसार, भारत में हर व्यक्ति हर साल लगभग 55 किलो खाना बर्बाद करता है, जो पूरे देश में करीब 7.8 करोड़ टन बैठता है. इस बर्बादी को रोकना जरूरी है, लेकिन जो बचा हुआ खाना जरूरतमंदों में बांटा जाए, उसका सुरक्षित होना भी उतना ही जरूरी है. FSSAI के 2019 के नियम बताते हैं कि रजिस्टर्ड संस्थाएं यह खाना कैसे इकट्ठा करें और परोसें. खाना बांटना अच्छी पहल है, लेकिन गलत तापमान पर रखा गया बचा हुआ खाना जरूरतमंदों को बीमार भी कर सकता है.

4. जांच की सुविधा जनता के करीब लाना: 'फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स' जैसी मोबाइल टेस्टिंग वैन, तुरंत नतीजे देने वाली रैपिड टेस्ट किट और राज्यों की मजबूत लैब के जरिए जांच को सस्ता और आम दुकानदारों व ग्राहकों की पहुंच में लाया जा सकता है.

5. असुरक्षित खाने पर सख्त और तुरंत कार्रवाई: समझाना-सिखाना पहला कदम है, लेकिन अगर कोई खाना सेहत के लिए खतरनाक पाया जाए, तो उसे फौरन बाजार से हटाया जाना चाहिए. गरीबों को खराब खाना खिलाना कोई दया या रहमदिली नहीं है.
 

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वो खतरे जो न दिखते हैं, न सूंघे जा सकते हैं

फूड सेफ्टी में जो बात सबसे ज्यादा डराती है, वह यह है कि कई बड़े खतरे ऐसे होते हैं जिन्हें ग्राहक न तो देख सकते हैं, न सूंघ सकते हैं और न ही चख सकते हैं. मीडिया का ध्यान अक्सर उन चीजों पर जाता है जो आंखों से दिखती हैं जैसे कोई गंदी रसोई, खाने में निकला कीड़ा या कोई वायरल वीडियो. ये मुद्दे जरूरी हैं, लेकिन कानून बनाने वालों के लिए असली चिंता वे खतरे हैं जो बिल्कुल अदृश्य होते हैं.

WHO के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 2021 में दूषित खाने से हुई कुल मौतों में से करीब 73% मौतें 'केमिकल कंटामिनेशन' (रासायनिक मिलावट और जहर) की वजह से हुईं. इस लिहाज से तीन खतरे सबसे बड़े हैं:

रोजमर्रा की चीजों में संगठित मिलावट: दूध, पनीर, खोया, घी, खाने का तेल और मसाले हर घर में इस्तेमाल होते हैं. कुछ संगठित गिरोह रसायनों से सिंथेटिक दूध तैयार करते हैं. ऐसा मिलावटी सामान किसी की पकड़ में आने से पहले ही लाखों लोगों की सेहत बिगाड़ चुका होता है. 2025-26 में संसद में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, देश भर में जांचे गए 39,351 दूध और डेयरी सैंपल्स में से 14,668 (37.3%) तय मानकों पर खरे नहीं उतरे. हालांकि इनमें से सभी जहरीले नहीं थे कई फैट या सॉलिड्स-नॉट-फैट (SNF) कम होने की वजह से फेल हुए लेकिन यह आंकड़ा बताता है कि डेयरी सेक्टर पर लगातार नजर रखना कितना जरूरी है.

केमिकल से फलों को पकाना: कैल्शियम कार्बाइड से फल पकाने पर 2011 के नियमों के तहत पूरी तरह रोक है, फिर भी चोरी-छिपे इसका इस्तेमाल जारी है. यहां तक कि सरकार द्वारा मंजूर किए गए केमिकल्स का भी गलत इस्तेमाल हो रहा है. इस तरह पकाए गए फल बाजार में देखने में बिल्कुल सामान्य और ताजे लगते हैं.

दवाओं और कीटनाशकों के अंश: फलों-सब्जियों पर कीटनाशकों के अंश, दूध और पोल्ट्री में एंटीबायोटिक दवाओं के अवशेष, और सीलन में रखे अनाज में पैदा होने वाले फफूंद के जहर (एफ्लाटॉक्सिन) बहुत खतरनाक होते हैं. ये तुरंत बीमार नहीं करते, लेकिन धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर लंबे समय में गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं. दूध और मांस में मौजूद एंटीबायोटिक दवाओं के अंश 'एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस' (दवाओं का बेअसर होना) को बढ़ावा देते हैं, जो आज दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है. मेडिकल जर्नल 'द लांसेट' की एक स्टडी के अनुसार, 2019 में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण दुनिया भर में 12.7 लाख मौतें हुई थीं.
 

ये खतरे इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं खींच पाते क्योंकि इनका कोई तुरंत दिखने वाला शिकार नहीं होता. सालों बाद होने वाली बीमारी को किसी खास खाने से जोड़ना आसान नहीं होता. इसके लिए लैब में गहन जांच की जरूरत होती है.

उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र में हम लैब की क्षमता बढ़ा रहे हैं, खुफिया इनपुट के आधार पर सैंपलिंग कर रहे हैं और त्योहारों के दौरान ज्यादा जोखिम वाली चीजों पर पूरे राज्य में विशेष अभियान चला रहे हैं. मिलावटखोरों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए हम पुलिस, दूसरे राज्यों और FSSAI के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

बाहर खाते वक्त इन बातों पर भी रखें नजर

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साफ-सफाई सिर्फ वही नहीं है जो डाइनिंग एरिया में दिखती है. असली फूड सेफ्टी कच्चे माल की खरीद से लेकर प्लेट तक की पूरी कड़ी पर निर्भर करती है:

बिना बिल और पहचान का कच्चा माल: कई बार होटल और रेस्टोरेंट बिना बिल के, बिना लाइसेंस वाले सप्लायर्स से खुला कच्चा माल खरीदते हैं. अगर बुनियादी पनीर, मावा या तेल ही मिलावटी है, तो बड़े से बड़ा शेफ भी उस खाने को सुरक्षित नहीं बना सकता.

डेयरी और मीट का गलत रखरखाव: डेयरी प्रोडक्ट्स, मीट और सी-फूड को लगातार ठंडे तापमान (कोल्ड चेन) में रखना जरूरी होता है, जिसकी अक्सर कमी दिखती है. इसके अलावा खाना पकाने, पीने और बर्फ के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी की भी नियमित जांच नहीं होती.

एक ही तेल को बार-बार खौलाना: कड़ाही में बार-बार वही तेल गर्म करने से वह खराब होने लगता है और उसमें हानिकारक तत्व (Total Polar Compounds) बन जाते हैं. FSSAI का नियम है कि अगर यह मात्रा 25% से ज्यादा हो जाए, तो उस तेल को फेंक देना चाहिए. ऐसे इस्तेमाल हो चुके तेल को RUCO योजना के तहत बायोडीजल बनाने के लिए भेजा जा सकता है. FSSAI के मुताबिक, हर साल करीब 220 करोड़ लीटर इस्तेमाल किया गया तेल इस काम में लाया जा सकता है.

तापमान और बासी खाने की लापरवाही: पके हुए खाने को घंटों सामान्य तापमान पर छोड़ देना या खराब फ्रिज में जरूरत से ज्यादा सामान ठूंस देना बैक्टीरिया को तेजी से पनपने का मौका देता है. कच्चे और पके खाने को एक ही चॉपिंग बोर्ड या चाकू से काटने से भी संक्रमण फैलता है. ग्रेवी, मिठाइयों और ड्रिंक्स में गैर-कानूनी सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल भी एक बड़ी समस्या है.

स्टाफ की ट्रेनिंग और मेडिकल फिटनेस: खाना बनाने और परोसने वालों की उचित ट्रेनिंग और मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट न होना भी खतरे को बढ़ाता है. जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. लाइसेंसिंग नियमों का 'शिड्यूल 4' (Schedule 4)  इसे कानूनी रूप से जरूरी बनाता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

ऑनलाइन डिलीवरी और अखबार की पैकेजिंग: क्लाउड किचन और ऑनलाइन डिलीवरी में खाना कई हाथों से होकर गुजरता है. गर्म खाने को घटिया प्लास्टिक में पैक करना या समोसे-स्नैक्स को अखबार में लपेटना बेहद खतरनाक है, क्योंकि अखबार की जहरीली स्याही खाने में घुल सकती है. इसके अलावा खाने में क्या-क्या चीजें (एलर्जेंस) मिली हैं, यह ग्राहकों को साफ-साफ नहीं बताया जाता.

'हाइजीन रेटिंग' और 'ईट राइट स्टेशन' जैसी कोशिशें होटलों और भोजनालयों को अपने मानक सुधारने के लिए प्रेरित कर रही हैं. साफ-सुथरा डाइनिंग एरिया अच्छा लगता है, लेकिन असली सुरक्षा काउंटर के पीछे और सप्लाई चेन के अंदर तैयार होती है.

महाराष्ट्र FDA मिलावट की जड़ तक कैसे पहुंचती है?

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महाराष्ट्र में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) किसी भी मिलावटी उत्पाद को दुकान से लेकर उसकी फैक्ट्री तक ट्रैक करने के लिए एक तय प्रक्रिया अपनाती है:

1. पैकेट का लेबल: पैकेट पर निर्माता का नाम, बैच नंबर, बनने की तारीख और FSSAI लाइसेंस नंबर दर्ज होता है. FoSCoS पोर्टल के जरिए यह तुरंत पता चल जाता है कि लाइसेंस किसके नाम पर है, यूनिट कहां है और इसे किसने जारी किया था.

2. बिल और रिकॉर्ड की जांच: हर लाइसेंसधारी कारोबारी के लिए खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड रखना जरूरी है. फूड सेफ्टी ऑफिसर दुकानदार के इनवॉइस से डिस्ट्रीब्यूटर तक और डिस्ट्रीब्यूटर के रिकॉर्ड से असली मैन्युफैक्चरर तक पहुंचते हैं. फैक्ट्री के कच्चे माल और डिस्पैच रिकॉर्ड से यह साफ हो जाता है कि वह माल कहां से आया था और कहां-कहां भेजा गया.

3. लैब जांच और कानूनी कार्रवाई: सैंपल्स को सरकारी नियमों के तहत लैब में जांच के लिए भेजा जाता है. नतीजे बताते हैं कि खाना असुरक्षित है, सब-स्टैंडर्ड है या उस पर गलत लेबल लगाया गया है. 2024-25 में देश भर में ऐसे मामलों में 31,407 कानूनी केस दर्ज किए गए.

4. माल की जब्ती और रिकॉल: खतरा पाए जाने पर संदिग्ध माल को फौरन जब्त किया जाता है और कारोबारी को पूरे बाजार से वह लॉट वापस (Recall) बुलाने का आदेश दिया जाता है. जरूरत पड़ने पर लाइसेंस भी सस्पेंड किए जाते हैं. 

5. जिम्मेदारी तय करना और अंतर-राज्यीय समन्वय:  फूड सेफ्टी कानून की धारा 27 के तहत निर्माता, वितरक और खुदरा विक्रेता तीनों की जिम्मेदारियां तय हैं. अगर कोई रिटेलर सप्लायर से मिली वैध वारंटी दिखा देता है, तो जिम्मेदारी ऊपर की सप्लाई चेन पर चली जाती है. यही वजह है कि ईमानदार व्यापारियों के लिए पक्का रिकॉर्ड रखना जरूरी है. वहीं, जब सप्लाई चेन जिले या राज्य की सीमा पार कर जाती है, तो मामला संबंधित फूड सेफ्टी कमिश्नर या केंद्र के स्तर पर FSSAI को सौंप दिया जाता है.

6. सख्त पुलिसिया कार्रवाई: जहां संगठित मिलावटखोरी का सबूत मिलता है, वहां पुलिस की मदद ली जाती है. इसमें फूड सेफ्टी एक्ट के साथ-साथ 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की सख्त आपराधिक धाराएं भी लगाई जा सकती हैं, ताकि मिलावट में पैसा लगाने वाले, केमिकल सप्लाई करने वाले और ट्रांसपोर्टर यानी पूरे नेटवर्क पर शिकंजा कसा जा सके. मकसद सिर्फ एक दुकान से माल हटाना नहीं, बल्कि उस पूरी चेन को खत्म करना है.
 

आम ग्राहक कहां गलती कर बैठते हैं?

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सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि "जो खाना दिखने में अच्छा लग रहा है और जिसे खाकर तुरंत पेट खराब नहीं हुआ, वह पूरी तरह सुरक्षित ही होगा."

दिखावे पर न जाएं: ग्राहक अक्‍सर खाने को उसकी अप‍ियरेंस से जज कर लेते हैं. बाहर से साफ और सुंदर द‍िख रहा फूड उन्‍हें सही और सेफ लगता है. चमकदार फल, चटक रंग और अच्छी खुशबू शुद्धता की गारंटी नहीं हैं. मिलावट और केमिकल से पकाने की तकनीकें इसी तरह तैयार की जाती हैं कि सामान आकर्षक दिखे. 2024-25 में ज्यादातर सैंपल्स दिखने में एकदम सामान्य थे, जो मानकों पर खरे नहीं उतरे थे.

बहुत सस्ते सामान से सावधान: अगर कोई दूध, पनीर, घी, खोया या तेल बाजार भाव से बहुत ज्यादा सस्ता बेच रहा है, तो सतर्क हो जाइए. असली सामग्री की अपनी एक लागत होती है.
लेबल्स का सच समझें: पैकेट पर 'ताजा', 'देसी', 'नेचुरल' या 'प्योर' लिखा होना सुरक्षा का पक्का सबूत नहीं है. पैकेट पर FSSAI लाइसेंस नंबर, एक्सपायरी डेट और स्टोरेज के निर्देश जरूर पढ़ें. यह भी समझें कि 'Use by' का मतलब सुरक्षा से है और 'Best before' का संबंध स्वाद और क्वालिटी से होता है.

घर की रसोई में भी सावधानी: बासी खाने को बार-बार गर्म करना, फ्रिज का तापमान सही न रखना और कड़ाही के तेल को बार-बार इस्तेमाल करना घर के खाने को भी खतरनाक बना देता है. सड़क किनारे बिना जांचे पानी और बर्फ से बने जूस या गोले गर्मियों और मानसून में बीमारी का बड़ा कारण बनते हैं.

ग्राहक के तौर पर आप कुछ आसान कदम उठा सकते हैं: हमेशा लाइसेंस वाले दुकानदारों से सामान खरीदें और पक्का बिल जरूर मांगें. अगर किसी सामान में गड़बड़ी लगे, तो उसका पैकेट और बिल संभालकर रखें और उस पर छपा बैच नंबर नोट कर लें. इसकी शिकायत FSSAI के Food Safety Connect ऐप पर या राज्य के खाद्य सुरक्षा विभाग में दर्ज कराएं. आपकी एक सटीक शिकायत अफसरों को मिलावट की जड़ तक पहुंचने में मदद करती है.

ग्राहक की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है. पक्का बिल लेना, बैच नंबर संभालकर रखना और गड़बड़ी की शिकायत करना छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन इन्हीं जानकारियों से अधिकारी किसी मिलावटी उत्पाद के स्रोत तक पहुंच सकते हैं.

(लेखक: तुकाराम मुंढे, फूड सेफ्टी कमिश्नर, महाराष्ट्र)

डिस्क्लेमर: लेख में कहीं गई बातें लेखक के निजी विचार हैं. यह मूल रूप से अंग्रेजी लेख का अनुवाद है. अंग्रेजी संस्‍करण पढ़ने के लिए यहां क्‍ल‍िक करें. 

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