'गाजर का हलवा' और 'बटर चिकन' जैसे डिश बनाने की कोशिश करने के लिए क्या आप पाक कला की किताबों के पन्ने पलटना पसंद करेंगे या उसका ऑनलाइन वीडियो देखना चाहेंगे? आज के समय में आपके सारे सवालों का जवाब ऑनलाइन सर्च इंजनों के पास मौजूद हैं, बस आप एक शब्द टाइप कीजिए और उससे संबंधित सैकड़ों-हजारों लिंक आप अपने सामने पाएंगे. ऐसे समय में क्या पाक कला की पुस्तकें अपनी चमक खो रही है? खैर, लेखकों और प्रकाशकों को तो ऐसा कुछ नहीं लगता.
इन व्यंजनों और इससे संबंधित अनुभवों व इनके सारे पहलुओं को विस्तारपूर्वक अपनी किताबों में उल्लेख करने वाले आज के युवा और अनुभवी लेखकों का कहना है कि पाक कला की एक पत्रिका में छपी उसकी तस्वीरें तमाम पकवानों और उसके स्वाद को जीवंत कर देती है और इन किताबों के जरिए खुद से खाना पकाने की आपकी आजादी कभी भी अपनी चमक नहीं खो पाएगी.
बनी रहेगी किताबों की महत्ता
'माय बॉम्बे किचन-ट्रेडिशनल एंड मॉडर्न पारसी होम कुकिंग' की अमेरिकी लेखिका निलोफर किंग का कहना है कि उनके प्रशंसक किसी भी भोजन के बारे में उसके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भो को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं.
किंग ने बताया कि मुझे लगता है कि मेरे लक्षित पाठकों में ऐसे लोग हैं जो किसी किताब को उनके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भो में पढ़ना पसंद करते हैं, जो पाक कला की किताब को महज पकवान की सूचियों और तस्वीरों के रूप में नहीं देखते हैं. 74 वर्षीय लेखिका ने कहा है कि मुझे लगता है कि भोजन पर लिखी किताबों की महत्ता भविष्य में भी सदैव बनी रहेगी.
कहीं भी पढ़ सकते हैं किताबें
'अपर क्रस्ट' नामक पाक कला की एक पत्रिका की संपादक और प्रकाशक फरजाना कॉन्ट्रैक्टर का कहना है कि पाक कला की पुस्तकों की यूएसपी यह है कि वे ज्यादा जीवंत और काफी निजी है. उन्होंने कहा कि आप इन्हें ट्रेन में पढ़ सकते हैं, आप इसे विमान में पढ़ सकते है, आपको इसे बंद नहीं करना पड़ता, जैसाकि हवाई जहाज में आपको अपना वाई-फाई बंद करना पड़ता है. आप इन तस्वीरों की तुलना नहीं कर सकते हैं.
चलन से बाहर नहीं होंगी किताबें
गौरमैंड कुक बुक्स पेरिस 2008 में अपनी किताब 'मासी-द मैन बिहाइंड द लीजेंड' के लिए विशेष ज्यूरी अवॉर्ड जीतने वाली गोवा की लेखिका और फूड आलोचक ओडेट मास्केरनहास भी इसी तरह की विचार रखती हैं. सेलीब्रिटी शेफ रणवीर बरार की पहली किताब 'कम इंटू माइ किचेन' पिछले साल ही प्रकाशित हुई थी, जिनका मानना है कि किताबें कभी भी चलन से बाहर नहीं होगी.
इन व्यंजनों और इससे संबंधित अनुभवों व इनके सारे पहलुओं को विस्तारपूर्वक अपनी किताबों में उल्लेख करने वाले आज के युवा और अनुभवी लेखकों का कहना है कि पाक कला की एक पत्रिका में छपी उसकी तस्वीरें तमाम पकवानों और उसके स्वाद को जीवंत कर देती है और इन किताबों के जरिए खुद से खाना पकाने की आपकी आजादी कभी भी अपनी चमक नहीं खो पाएगी.
बनी रहेगी किताबों की महत्ता
'माय बॉम्बे किचन-ट्रेडिशनल एंड मॉडर्न पारसी होम कुकिंग' की अमेरिकी लेखिका निलोफर किंग का कहना है कि उनके प्रशंसक किसी भी भोजन के बारे में उसके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भो को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं.
किंग ने बताया कि मुझे लगता है कि मेरे लक्षित पाठकों में ऐसे लोग हैं जो किसी किताब को उनके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भो में पढ़ना पसंद करते हैं, जो पाक कला की किताब को महज पकवान की सूचियों और तस्वीरों के रूप में नहीं देखते हैं. 74 वर्षीय लेखिका ने कहा है कि मुझे लगता है कि भोजन पर लिखी किताबों की महत्ता भविष्य में भी सदैव बनी रहेगी.
कहीं भी पढ़ सकते हैं किताबें
'अपर क्रस्ट' नामक पाक कला की एक पत्रिका की संपादक और प्रकाशक फरजाना कॉन्ट्रैक्टर का कहना है कि पाक कला की पुस्तकों की यूएसपी यह है कि वे ज्यादा जीवंत और काफी निजी है. उन्होंने कहा कि आप इन्हें ट्रेन में पढ़ सकते हैं, आप इसे विमान में पढ़ सकते है, आपको इसे बंद नहीं करना पड़ता, जैसाकि हवाई जहाज में आपको अपना वाई-फाई बंद करना पड़ता है. आप इन तस्वीरों की तुलना नहीं कर सकते हैं.
चलन से बाहर नहीं होंगी किताबें
गौरमैंड कुक बुक्स पेरिस 2008 में अपनी किताब 'मासी-द मैन बिहाइंड द लीजेंड' के लिए विशेष ज्यूरी अवॉर्ड जीतने वाली गोवा की लेखिका और फूड आलोचक ओडेट मास्केरनहास भी इसी तरह की विचार रखती हैं. सेलीब्रिटी शेफ रणवीर बरार की पहली किताब 'कम इंटू माइ किचेन' पिछले साल ही प्रकाशित हुई थी, जिनका मानना है कि किताबें कभी भी चलन से बाहर नहीं होगी.
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