
केंद्र ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगने के लिये न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार की यह कोशिश एक चुनावी दांव के तौर पर देखा जा रहा है. बीजेपी महासचिव राम माधव ने मोदी सरकार के इस कदम को 'बहुप्रतीक्षित' बताया है. वहीं विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है. विहिप ने कहा कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम है. वहीं सुप्रीम कोर्ट में बार-बार सुनवाई टलने के मुद्दे पर केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने सोमवार को कहा था कि अयोध्या ममाला जो करीब 70 सालों से लंबित है, उसकी जल्द सुनवाई होनी चाहिए क्योंकि देश के लोग वहां एक भव्य राम मंदिर का निर्माण होने की उम्मीद कर रहे हैं, जहां कभी बाबरी मस्जिद हुआ करती थी. प्रसाद ने कहा, "अयोध्या मामला पिछले 70 सालों से लंबित है. (2010 में) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश मंदिर के पक्ष में था, लेकिन अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है. इस मामले का जल्द निपटारा होना चाहिए." फिलहाल अब देखने वाली बात यह कोर्ट सरकार की ओर से दायर इस याचिका पर क्या कहता है.
मोदी सरकार की अर्जी की 5 बड़ी बातें
सरकार ने कहा कि 67 एकड़ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया. जमीन का विवाद सिर्फ 2.77 एकड़ का है बल्कि बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है. इसलिए उस पर यथास्थिति बरकरार रखने की जरूरत नही है.
सरकार चाहती है जमीन का बाकी हिस्सा राम जन्भूमि न्यास को दिया जाए और सुप्रीम कोर्ट इसकी इज़ाजत दे.
सरकार विवादित 0.313 एकड़ जमीन पर प्रवेश व निकासी के लिए योजना तैयार कर देगी ताकि जमीनी विवाद पर जो भी कोर्ट से केस जीते उसे 0.313 एकड़ जमीन पर जाने- आने में कोई परेशानी ना हो.
जो असली विवाद है वो 0.313 एकडट जमीन ही है. इसलिए 1993 में जो अतिरिक्त जमीन अधिग्रहीत की गई उसे वापस करने पर 1994 के संविधान पीठ के फैसले में कोई पाबंदी नहीं है.
न्याय के हित में ये सही होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में संशोधन करे ताकि केंद्र मालिकों को जमीन वापस कर दे.