हिंदू धर्म में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा माना गया है. आमतौर पर यह धारणा रहती है कि माता-पिता के निधन के बाद बेटे ही इन कर्मकांडों को करते हैं. लेकिन अगर किसी परिवार में बेटा नहीं है और सिर्फ बेटी है तो ऐसी स्थिति में श्राद्ध और अंतिम संस्कार कौन कर सकता है. इस सवाल पर कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने श्रद्धालु को जवाब दिया है.
बेटी का बेटा कर सकता है पितरों का कर्म
सतसंग में अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने बताया कि अगर किसी व्यक्ति की केवल बेटी है और बेटी का बेटा यानी नाती है तो वह अपने नाना-नानी के लिए धार्मिक कर्म कर सकता है. उनके बताए अनुसार, नाती द्वारा किया गया श्राद्ध, पिंडदान और अन्य कर्मकांड नाना-नानी को प्राप्त होते हैं. उन्होंने कहा कि यह बात केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति में जिन लोगों के बेटे नहीं हैं वे भी इस परंपरा को समझ सकते हैं.
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नाती नहीं हो तो दामाद कर सकता है कर्म
अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने आगे बताया कि अगर बेटी का बेटा नहीं है तो ऐसी स्थिति में दामाद द्वारा भी अंतिम संस्कार और श्राद्ध संबंधी कर्म किए जा सकते हैं. यानी बेटा न होने की स्थिति में धाार्मिक कर्म रुकते नहीं हैं.
बेटी की भूमिका को लेकर क्या कहा?
इस सवाल के जवाब में अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अंतिम संस्कार और श्राद्ध को लेकर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं. इसलिए परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक रीति के अनुसार निर्णय लिया जा सकताा है. ध्यान रहे कि श्राद्ध और अंतिम संस्कार की विधियों को लेकर अलग-अलग संप्रदायों और क्षेत्रों में परंपराएं भिन्न हो सकती हैं. ऐसे में किसी विशेष परिस्थिति में परिवाार के पुरोहित या विद्वान से विधि की जानकारी लेना उचित मानाा जाता है.
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