भारंगम के शुभारंभ के मौके पर कवलम नारायण पणिक्कर निर्देशित 'उत्तररामचरित' का मंचन किया गया.
नई दिल्ली:
बसंत पंचमी के उल्लास और बजट की उत्सुकता के बीच भारत ही नहीं एशिया के सबसे बड़े नाट्य उत्सव भारत रंग महोत्सव (भारंगम) की औपचारिक शुरुआत हुई. यह उन्नीसवां भारंगम है. इस आयोजन का सिलसिला 1999 में शुरू हुआ था. कमानी सभागार में हुए उद्घाटन समारोह की मुख्य अतिथि थीं प्रसिद्ध नृत्यागना सोनल मानसिंह. नाट्य निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्कृति सचिव नरेंद्र कुमार सिन्हा और इजराइल की निर्देशिका बेरजाक शिंडर के साथ वरिष्ठ रंगकर्मी रतन थियम भी मंच पर थे.
दीप प्रज्ज्वलन से समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई. निर्देशक वामन केंद्रे ने अपने वक्तव्य में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की उपलब्धियों का ब्यौरा दिया और इस महोत्सव की रूपरेखा के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने बताया कि भारंगम के अतिरिक्त रानावि आदि रंग महोत्सव , पूर्वोत्तर नाट्य महोत्सव , शास्त्रीय नाटक महोत्सव भी आयोजित कर रहा है. उन्होंने उम्मीद जताई कि भारंगम का सैटेलाइट महोत्सव अगले साल 12 शहरों में हो सकेगा जो इस वर्ष छह शहरों में हो रहा है. उन्होंने कहा कि रानावि थिएटर ओलंपियाड की मेजबानी के लिए भी प्रयास कर रहा है. 
रंग निर्देशक फिरोज अब्बास खान, जिन्होंने हाल ही में के आसिफ के क्लासिक सिनेमा मुगल-ए -आज़म को मंच पर उतारा है, ने कहा कि कलाकार को नहीं बोलना चाहिए उसके काम को बोलना चाहिए. महोत्सव विविधता, समावेशिकता, तार्किकता जैसे मूल्यों को दिखाते हैं, जो हमारी सभ्यता में हैं. रंगमंच पर इन्हें अभिव्यक्ति मिलती है. अपनी नाट्य प्रस्तुति के लिए भारंगम में आईं इजराइल की निर्देशिका वेरा बारज़ाक़ ने कहा कि रंगमंच कलाकार को स्वतंत्रता देता है कि वे निर्भीकता से अपनी अभिव्यक्ति करें. सचिव नरेंद्र कुमार सिन्हा ने एनएसडी की तुलना देश के अन्य शिक्षा संस्थानों से करके बताया कि एनएसडी कैसे लगातार बेहतर कर रहा है. उन्होंने कहा कि रानावि को अपने प्रशिक्षण का विस्तार ऑनलाइन पोर्टल के जरिए करना चाहिए ताकि और लोग भी लाभान्वित हों.
सोनल मानसिंह ने बसंत पंचमी को याद करते हुए सरस्वती को याद किया जो ज्ञान की देवी हैं और अज्ञान के अन्धकार को दूर करती हैं. सीखते रहने पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि वे आज भी सीखने के लिए तत्पर हैं. अध्यक्षीय वक्तव्य में रतन थियम ने रंगमंच के महत्व और उसकी प्रकृति की बात की कैसे वह मनुष्य के बाहरी और भीतरी दुनिया को जोड़ता है. साथ ही उन्होंने बताया कि भारत में थिएटर की अर्थव्यवस्था को बदलने की जरूरत है क्योंकि इसका संघर्ष बढ़ गया है. उन्होंने जब सत्तर साल पहले कैरियर शुरू किया तब से आज तक थिएटर की अर्थव्यवस्था नहीं बदली. धन्यवाद ज्ञापन त्रिपुरारी शर्मा ने किया. समारोह के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे.
उद्घाटन समारोह के बाद प्रेम मटियानी, पणिक्कर और कन्हाईलाल को श्रद्धांजलि दी गई और कवलम नारायण पणिक्कर निर्देशित उत्तररामचरित का मंचन किया गया. उत्तररामचरित भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है जिसमें राम को पारंपरिक प्रतिमानों से अलग धरातल पर दिखाया गया है. इसमें रावण को पराजित करने वाले देवता राम की जगह वह मनुष्य राम अधिक दिखते है जो पत्नी वियोग में पीड़ित है. क्रौंच वध से व्यथित वाल्मीकि द्वारा निषाद को शाप देने के प्रसंग से नाटक शुरू होता है. यह नाटक के मूड को स्थापित कर देता है. केरल की पारंपरिक नाट्य शैलियों, संस्कृत रंगमंच की रूढ़ियों और आधुनिक रंगमंच की तकनीक के मिश्रण से बनी इस प्रस्तुति का मिजाज शास्त्रीय है जो देखे जाने के लिए दर्शकों से पर्याप्त धैर्य की मांग करता है, जो कमानी में मौजूद दर्शकों ने दिखाया. नाटक का हिंदी अनुवाद और मलयालम अभिनेताओं की हिंदी बोलने में असहजता नाटक की गति को भंग भी करती है. राजा को प्रजा प्रिय और अपनी प्रिया के लिए प्रिय भी होना चाहिए इस गीत के साथ नाटक समाप्त होता है. भारंगम में मध्यमव्यायोग, उरूभंगम, और भगवद्जुकीयम जैसे संस्कृत नाटकों के मंचन देखे जा सकते हैं.
दीप प्रज्ज्वलन से समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई. निर्देशक वामन केंद्रे ने अपने वक्तव्य में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की उपलब्धियों का ब्यौरा दिया और इस महोत्सव की रूपरेखा के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने बताया कि भारंगम के अतिरिक्त रानावि आदि रंग महोत्सव , पूर्वोत्तर नाट्य महोत्सव , शास्त्रीय नाटक महोत्सव भी आयोजित कर रहा है. उन्होंने उम्मीद जताई कि भारंगम का सैटेलाइट महोत्सव अगले साल 12 शहरों में हो सकेगा जो इस वर्ष छह शहरों में हो रहा है. उन्होंने कहा कि रानावि थिएटर ओलंपियाड की मेजबानी के लिए भी प्रयास कर रहा है.

रंग निर्देशक फिरोज अब्बास खान, जिन्होंने हाल ही में के आसिफ के क्लासिक सिनेमा मुगल-ए -आज़म को मंच पर उतारा है, ने कहा कि कलाकार को नहीं बोलना चाहिए उसके काम को बोलना चाहिए. महोत्सव विविधता, समावेशिकता, तार्किकता जैसे मूल्यों को दिखाते हैं, जो हमारी सभ्यता में हैं. रंगमंच पर इन्हें अभिव्यक्ति मिलती है. अपनी नाट्य प्रस्तुति के लिए भारंगम में आईं इजराइल की निर्देशिका वेरा बारज़ाक़ ने कहा कि रंगमंच कलाकार को स्वतंत्रता देता है कि वे निर्भीकता से अपनी अभिव्यक्ति करें. सचिव नरेंद्र कुमार सिन्हा ने एनएसडी की तुलना देश के अन्य शिक्षा संस्थानों से करके बताया कि एनएसडी कैसे लगातार बेहतर कर रहा है. उन्होंने कहा कि रानावि को अपने प्रशिक्षण का विस्तार ऑनलाइन पोर्टल के जरिए करना चाहिए ताकि और लोग भी लाभान्वित हों.
सोनल मानसिंह ने बसंत पंचमी को याद करते हुए सरस्वती को याद किया जो ज्ञान की देवी हैं और अज्ञान के अन्धकार को दूर करती हैं. सीखते रहने पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि वे आज भी सीखने के लिए तत्पर हैं. अध्यक्षीय वक्तव्य में रतन थियम ने रंगमंच के महत्व और उसकी प्रकृति की बात की कैसे वह मनुष्य के बाहरी और भीतरी दुनिया को जोड़ता है. साथ ही उन्होंने बताया कि भारत में थिएटर की अर्थव्यवस्था को बदलने की जरूरत है क्योंकि इसका संघर्ष बढ़ गया है. उन्होंने जब सत्तर साल पहले कैरियर शुरू किया तब से आज तक थिएटर की अर्थव्यवस्था नहीं बदली. धन्यवाद ज्ञापन त्रिपुरारी शर्मा ने किया. समारोह के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे.
उद्घाटन समारोह के बाद प्रेम मटियानी, पणिक्कर और कन्हाईलाल को श्रद्धांजलि दी गई और कवलम नारायण पणिक्कर निर्देशित उत्तररामचरित का मंचन किया गया. उत्तररामचरित भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है जिसमें राम को पारंपरिक प्रतिमानों से अलग धरातल पर दिखाया गया है. इसमें रावण को पराजित करने वाले देवता राम की जगह वह मनुष्य राम अधिक दिखते है जो पत्नी वियोग में पीड़ित है. क्रौंच वध से व्यथित वाल्मीकि द्वारा निषाद को शाप देने के प्रसंग से नाटक शुरू होता है. यह नाटक के मूड को स्थापित कर देता है. केरल की पारंपरिक नाट्य शैलियों, संस्कृत रंगमंच की रूढ़ियों और आधुनिक रंगमंच की तकनीक के मिश्रण से बनी इस प्रस्तुति का मिजाज शास्त्रीय है जो देखे जाने के लिए दर्शकों से पर्याप्त धैर्य की मांग करता है, जो कमानी में मौजूद दर्शकों ने दिखाया. नाटक का हिंदी अनुवाद और मलयालम अभिनेताओं की हिंदी बोलने में असहजता नाटक की गति को भंग भी करती है. राजा को प्रजा प्रिय और अपनी प्रिया के लिए प्रिय भी होना चाहिए इस गीत के साथ नाटक समाप्त होता है. भारंगम में मध्यमव्यायोग, उरूभंगम, और भगवद्जुकीयम जैसे संस्कृत नाटकों के मंचन देखे जा सकते हैं.
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