क्या कभी आपने सोचा है कि अगर रात के घने अंधेरे में भी अचानक सूरज की चमचमाती धूप खिल जाए, तो दुनिया कैसी दिखेगी? क्या आधी रात को भी दिन जैसा उजाला होना मुमकिन है? सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म या सपने जैसा लगता है, लेकिन अमेरिका की एक स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी इसे हकीकत में बदलने की तैयारी कर रहा है.अंतरिक्ष में रचे जा रहे एक अनोखे चमत्कार की बदौलत अब धरती पर रात के समय भी सूरज की रोशनी पहुंचाई जा सकेगी.कंपनी अंतरिक्ष में बड़े-बड़े शीशे वाले सैटेलाइट भेजने की योजना बना रही है, जो रात में धरती पर चुनिंदा जगहों तक सूरज की रोशनी पहुंचाएंगे.
सबसे गर्व की बात यह है कि इस ऐतिहासिक मिशन में भारत एक बेहद अहम भूमिका निभा रहा है.इस काम में भारत की स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस भी मदद करेगी. दोनों कंपनियों के बीच इसके लिए दो रॉकेट लॉन्च करने का समझौता हुआ है. आखिर कैसे मुमकिन होगा रात में धूप का खिलना और भारत की मदद से धरती पर क्या नया कमाल होने जा रहा है? आइए जानते हैं...
रात में कैसे खिलेगी धूप?
कैलिफोर्निया की स्टार्टअप कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल (Reflect Orbital) ऐसे सैटेलाइट का ग्रुप तैयार करना चाहती है, जिनमें बड़े रिफ्लेक्टिंग मिरर लगे होंगे. ये शीशे सूरज की रोशनी को धरती की खास जगहों की तरफ मोड़ेंगे. कंपनी का दावा है कि इस रोशनी की मदद से रात में भी करीब 5 किलोमीटर के इलाके में उजाला किया जा सकेगा. इसकी चमक को जरूरत के हिसाब से कम-ज्यादा किया जा सकेगा और इसे कभी भी बंद किया जा सकेगा.
स्काईरूट के रॉकेट से होंगे लॉन्च
इस योजना के लिए रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ दो लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट किया है. पहला सैटेलाइट स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा, जबकि दूसरे लॉन्च के लिए कंपनी के विकास के दौर से गुजर रहे विक्रम-1U रॉकेट का इस्तेमाल होगा.
विक्रम-1U में पहले स्टेज के एक्स्ट्रा बूस्टर लगाए गए हैं और इसकी क्षमता भी बेहतर की गई है. रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का कहना है कि स्काईरूट के साथ इस समझौते से उसे तय समय पर लॉन्च की सुविधा मिलेगी. कंपनी अमेरिका के लॉन्च सेंटर से भी लॉन्च करने की योजना बना रही है.
कहां काम आएगी रात की धूप?
कंपनी इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कई तरह के कामों के लिए करना चाहती है. आपदा वाले इलाकों में रात के समय राहत और बचाव अभियान चलाने में इससे मदद मिल सकती है. सोलर फार्म में सूरज की रोशनी का समय बढ़ाकर बिजली बनाने की अवधि भी बढ़ाई जा सकती है. इसके अलावा, दूर-दराज के इंडस्ट्रियल इलाकों में रात में काम करने का समय बढ़ाने, जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को रोशन करने और सिक्योर्टी से जुड़े कामों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. कंपनी सार्वजनिक जगहों पर होने वाले कार्यक्रमों के लिए भी इसे एक खास अनुभव के तौर पर पेश करना चाहती है.
अमेरिका से मिली पहली मंजूरी
जुलाई में रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल को अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) से अपने डेमोंस्ट्रेशन सैटेलाइट को बनाने, लॉन्च करने और चलाने की मंजूरी मिली थी.
पहले भी हो चुका है ऐसा कारनामा
अंतरिक्ष से धरती पर सूरज की रोशनी पहुंचाने का ये आइडिया नया नहीं है. साल 1993 में रूस के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने करीब 65 फीट का एक शीशा अंतरिक्ष में भेजा था. इस एक्सपेरिमेंट का नाम ज्नाम्या (Znamya) था. इसके जरिए धरती पर घूमती हुई सूरज की रोशनी पहुंचाई गई थी. यह प्रयोग सफल रहा, लेकिन पैसों की कमी के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया गया.
योजना पर उठ रहे सवाल
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की योजना को लेकर पर्यावरण संगठनों ने चिंता जताई है. कई संगठनों ने FCC से डेमोंस्ट्रेशन सैटेलाइट को मिली मंजूरी रद्द करने की मांग की है. उनका कहना है कि रात में तेज रोशनी पड़ने से वन्यजीवों पर असर हो सकता है, एस्ट्रोनॉमी वैज्ञानिकों की पढ़ाई और रिसर्च में परेशानी आ सकती है और इंसानों की नींद-जागने की प्राकृतिक दिनचर्या भी प्रभावित हो सकती है. ऐसे में इस टेक्नोलॉजी को बड़े स्तर पर शुरू करने से पहले इसके फायदे के साथ पर्यावरण और इंसानों पर पड़ने वाले असर को समझना भी जरूरी होगा.
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