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भारत खड़ा कर रहा है 100 अरब डॉलर का टेक एंपायर, ये 6 क्षेत्र भर रहे हैं फर्राटा

ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक जेफरीज ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में एक 'नई औद्योगिक क्रांति' देखने को मिल रही है. उसने इसका आधार भारत के मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र को बताया है.

भारत खड़ा कर रहा है 100 अरब डॉलर का टेक एंपायर, ये 6 क्षेत्र भर रहे हैं फर्राटा
नई दिल्ली:

ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक जेफरीज ने उम्मीद जताई है कि भारत आर्थिक विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है. जेफरीज की हाल में आई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक 'नई औद्योगिक क्रांति' देखने को मिल रही है. रिपोर्ट में इसका आधार मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर को बताया गया है.रिपोर्ट के मुताबिक भारत सेमीकंडक्टर प्लांट, डेटा सेंटर, सोलर उपकरण और सैटेलाइट से लेकर कई क्षेत्रों में तेजी से अपनी औद्योगिक क्षमता बढ़ा रहा है.

जेफरीज के मुताबिक, इस विकास को भारत का बड़ा उपभोक्ता बाजार, निजी निवेश में बढ़ोतरी और नई इंडस्ट्री को आकर्षित करने के लिए सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं से मजबूती मिल रही है.इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब केवल टेक्नोलॉजी खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि खुद टेक्नोलॉजी विकसित और तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग

भारत अब केवल रॉकेट लॉन्च करने तक सीमित नहीं है. वह अब एक पूरी स्पेस इंडस्ट्री तैयार कर रहा है. जेफरीज के मुताबिक, भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिनके पास अंतरिक्ष के क्षेत्र में मजबूत क्षमता है. भारत की स्पेस इकोनॉमी साल 2030 तक करीब पांच गुना बढ़कर 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इस क्षेत्र में निजी कंपनियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं. Skyroot, Pixxel और Agnikul जैसी कंपनियां अब केवल प्रयोग या रिसर्च तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कमर्शियल लॉन्च की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं.

भारत की निजी क्षेत्र की कंपनी स्काईरू

भारत की निजी क्षेत्र की कंपनी स्काईरूट ने अगस्त में अपने पहले ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' का सफल परीक्षण किया था.
Photo Credit: SKYROOT X

सेमीकंडक्टर चिप भी अब भारत में ही बनेगी

भारत में पिछले कई सालों से सेमीकंडक्टर बनाने की बात हो रही थी. लेकिन अब इस दिशा में वास्तविक काम शुरू हो चुका है.भारत में करीब 20 अरब डॉलर का निवेश सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में हुआ है. एक चिप फैब्रिकेशन प्लांट का निर्माण चल रहा है, जबकि चिप की पैकेजिंग और टेस्टिंग से जुड़ी कई परियोजनाओं में उत्पादन शुरू हो गया है. इसके अलावा, करीब 13 अरब डॉलर की नई प्रोत्साहन योजना पर भी काम चल रहा है. इससे भारत में केवल चिप बनाने का काम ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ा पूरा इकोसिस्टम विकसित होने की उम्मीद है.

तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर 

पांच साल पहले भारत की डेटा सेंटर क्षमता काफी कम थी. लेकिन अब यह करीब पांच गुना बढ़ चुकी है. यह बढ़कर दो गीगावाट से ज्यादा हो गई है. जेफरीज का अनुमान है कि अगले पांच सालों में यह क्षमता बढ़कर 10 गीगावाट तक हो सकती है. इससे बिजली, कूलिंग सिस्टम, निर्माण और नेटवर्किंग जैसे क्षेत्रों में करीब 45 अरब डॉलर का अवसर पैदा हो सकता है. AI का इस्तेमाल जितना बढ़ेगा, उतने ही ज्यादा सर्वर और डेटा सेंटर की जरूरत होगी. भारत इस बढ़ती जरूरतों को पूरा करने वाला बड़ा केंद्र बनना चाहता है.

भारत अब मोबाइल फोन बनाता भी है

भारत में पहले मोबाइल फोन असेंबलिंग का काम होता था. इसमें दूसरे देशों में बने पुर्जों को भारत में जोड़कर मोबाइल फोन तैयार किए जाते थे. लेकिन अब इसमें बदलाव हो रहा है. भारत केवल फोन की असेंबलिंग की जगह उनके जरूरी पुर्जों को अपने यहां ही बनाने पर जोर दे रहा है. फिलहाल मोबाइल से जुड़े कंपोनेंट्स में भारत की घरेलू वैल्यू एडिशन 20 फीसद से भी कम है. जेफरीज का अनुमान है कि अगले छह साल में यह बढ़कर करीब 50 फीसद हो सकता है.

भारत में बने सेमीकंडक्टर को दिखाते सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव.

भारत में बने सेमीकंडक्टर को दिखाते सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव.
Photo Credit: PTI

सोलर पावर का सरताज बनता भारत 

भारत पहले से ही दुनिया में अधिक सोलर सेल बनाने वाले देशों में शामिल है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर PV निर्माता है. भारत में करीब 35 गीगावाट की सोलर सेल क्षमता पहले से काम कर रही है, जबकि करीब 100 गीगावाट की अतिरिक्त क्षमता के विकास पर काम चल रहा है. जेफरीज का अनुमान है कि 2030 तक सोलर से जुड़ी पूरी वैल्यू चेन का करीब 90 फीसद हिस्सा भारत में ही तैयार होने लगेगा. इससे भारत केवल अपनी जरूरत के लिए सोलर उपकरण बनाने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि इनके निर्यात में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है.

हवाई जहाज के पुर्जे सप्लाई करने वाला देश

बोइंग और एयरबस जैसी बड़ी विमान कंपनियां हर साल डेढ़ अरब डॉलर से अधिक मूल्य के विमान पुर्जे भारत से खरीद रही हैं. इसका प्रमुख कारण भारत की कम लागत और बड़ी संख्या में उपलब्ध इंजीनियरिंग प्रतिभा को माना जा रहा है. दुनिया में विमानों की मांग बढ़ने के कारण एयरोस्पेस कंपनियों की सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में भारतीय कंपनियां दुनिया की बड़ी विमान निर्माता कंपनियों और उनके बड़े सप्लायर्स के लिए महत्वपूर्ण पार्ट्स सप्लायर के रूप में उभर रही हैं.

भारत की इस तरक्की पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ

आईटी और एआई क्षेत्र की कंपनी RedoQ के सीईओ डिपल दत्ता इसे भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण बदलाव का समय बताते हैं. उन्होंने कहा कि भारत एक वैश्विक सर्विस हब से आगे बढ़कर कोर टेक्नोलॉजी और एडवांस इंजीनियरिंग की बड़ी ताकत बनने की दिशा में बढ़ रहा है. उनके मुताबिक, सेमीकंडक्टर, स्पेस सिस्टम और नई पीढ़ी के डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में भारत अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. इसका मतलब केवल वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनना भर नहीं है, बल्कि उस सप्लाई चेन को नए तरीके से आकार देना भी है.दत्ता के मुताबिक स्थानीय स्तर पर ज्यादा वैल्यू वाले उत्पादों का निर्माण और बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास अभी शुरुआत है. आने वाले दशक में यह बदलाव टेक्नोलॉजी आधारित और टिकाऊ आर्थिक विकास की दिशा को काफी हद तक बदल सकता है.

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