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देश में 200 स्‍पेस स्‍टार्टअप्‍स, विक्रम-1 की सफलता से मिला बूम, 2030 तक इतनी हो सकती है हिस्‍सेदारी

भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से बदल रहा है. प्राइवेट कंपनियां अब रॉकेट और सैटेलाइट बना रही हैं. विक्रम-1 की सफलता और नई पॉलिसी के बाद देश 2030 तक ग्लोबल स्पेस मार्केट में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की तैयारी कर रहा है.

देश में 200 स्‍पेस स्‍टार्टअप्‍स, विक्रम-1 की सफलता से मिला बूम, 2030 तक इतनी हो सकती है हिस्‍सेदारी
विक्रम-1 से मिली स्पेस सेक्टर को रफ्तार.

भारत का स्पेस सेक्टर अब तेजी से आगे बढ़ रहा है. पहले स्पेस मिशन की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह इसरो के पास थी, लेकिन अब कई प्राइवेट कंपनियां भी इस क्षेत्र में काम कर रही हैं. भारत के पहले प्राइवेट तौर पर बने ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफलता को इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है. एक नई इंडिया नैरेटिव रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अब करीब 200 स्पेस स्टार्टअप्स हैं और भारत ने 2030 तक ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में अपनी हिस्सेदारी 8% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.

सरकारी मॉडल से आगे बढ़कर बना नया स्पेस इकोसिस्टम

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब सिर्फ इसरो के भरोसे नहीं है. देश में ऐसा मल्टी-एक्टर स्पेस इकोसिस्टम बन रहा है, जहां सरकारी एजेंसियों के साथ प्राइवेट कंपनियां भी रॉकेट, सैटेलाइट और दूसरी स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं. भविष्य में भारत अपने क्रू वाले स्पेस मिशन और स्पेस स्टेशन की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि विक्रम-1 की सफलता उस सफर को आगे बढ़ाती है जिसकी शुरुआत चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग और आदित्य-एल1 मिशन से हुई थी.

2020 के सुधार और इन-स्पेस ने बदली तस्वीर

रिपोर्ट के अनुसार, 2020 के आसपास शुरू हुए स्पेस सेक्टर के सुधारों और इन-स्पेस के गठन ने इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई. इन-स्पेस ने स्काईरूट एयरोस्पेस को अपना हार्डवेयर टेस्ट करने और श्रीहरिकोटा में इसरो की लॉन्च रेंज का इस्तेमाल करने की सुविधा दी. इन-स्पेस का काम प्राइवेट लॉन्च कंपनियों, सैटेलाइट बनाने वाली कंपनियों और डाउनस्ट्रीम सर्विस प्रोवाइडर्स को एक ही नेशनल इकोसिस्टम से जोड़ना है. इससे हर कंपनी को अलग-अलग पूरी व्यवस्था बनाने की जरूरत नहीं पड़ती.

विक्रम-1 में इस्तेमाल हुई एडवांस्ड टेक्नोलॉजी

हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 बनाने में कई एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. इसमें ऑल-कार्बन कम्पोजिट मोटर केसिंग, हाई-परफॉर्मेंस सॉलिड मोटर्स और 3डी-प्रिंटेड प्रोपल्शन कंपोनेंट्स शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ समय पहले तक ऐसी मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी सिर्फ इसरो और दुनिया की चुनिंदा बड़ी एयरोस्पेस कंपनियों के पास ही थी.

विक्रम-1 मिशन में भारत की ग्रहा स्पेस, कॉस्मोसर्व, जर्मनी की डीक्यूबेड और स्काईरूट के टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड भी शामिल थे. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह इस बात का सबूत है कि दुनिया के ग्राहक भारत की प्राइवेट लॉन्च क्षमता पर भरोसा जता रहे हैं, जबकि उनके पास दूसरे देशों के विकल्प भी मौजूद थे.

200 स्टार्टअप्स तक पहुंचा सेक्टर, 2030 तक बड़ा लक्ष्य

रिपोर्ट के मुताबिक, पॉलिसी सुधारों के बाद भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 2022 में सिर्फ एक से बढ़कर 2024 तक लगभग 200 हो गई. इस सेक्टर ने 2023 के पहले आठ महीनों में ही करीब 1,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया.

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2021 में ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी करीब 2% थी. अब सरकार का लक्ष्य इसे 2030 तक 8% और 2047 तक 15% तक पहुंचाना है. रिपोर्ट का कहना है कि विक्रम-1 की सफलता यह दिखाती है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी इंडस्ट्रियल बेस अब भारत में तैयार हो चुका है.

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