- UPI की सबसे बड़ी ताकत मुफ्त और आसान व्यवस्था है, जिसने 55 करोड़ से अधिक लोगों को डिजिटल भुगतान से जोड़ा है.
- UPI के जरिए वित्त वर्ष 2025-26 में 314 लाख करोड़ रुपये के भुगतान हुए और यह 11 देशों में काम कर रहा है.
- आगे की चुनौती इसे टिकाऊ बनाना है, लेकिन किसी भी संभावित शुल्क का बोझ इस प्रणाली के इस्तेमाल पर असर डाल सकता है
भारत की सबसे बड़ी वित्तीय डिजिटल लेनदेन इंटरफेस यूपीआई की कामयाबी की अनकही कहानी चांदनी चौक की भीड़भरी गलियों से लेकर सड़क किनारे सामान बेचने वालों और बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों तक फैली हुई है. यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस ने भारत के पैसे देने और लेने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. देश के सबसे व्यस्त बाजारों में शामिल चांदनी चौक में एनडीटीवी ने डिजिटल भुगतान के इस असाधारण सफर को समझने की कोशिश की और जाना कि तकनीक, सरकारी नीति और नए प्रयोगों ने मिलकर भारत को डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया की बड़ी ताकत कैसे बनाया.
यूपीआई की दसवीं वर्षगांठ पर कंप्यूटर वैज्ञानिक, ‘कैशलैस नेशन' के सह-लेखक और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के पूर्व निदेशक मंडल सदस्य डॉ. शांतनु पॉल ने एनडीटीवी के विज्ञान संपादक पल्लव बागला के साथ चांदनी चौक की सैर की और बताया कि यूपीआई आज भारत के लिए उतना ही नहीं, बल्कि उसके शुरू होने के समय से भी ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों हो गया है.
यूपीआई की कामयाबी की यह कहानी भारत के डिजिटल बदलाव की उन कहानियों में से है, जिसने देश के करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के लेन-देन का तरीका बदल दिया.
आज यूपीआई देश के 55 करोड़ से ज्यादा लोगों और 6.5 करोड़ कारोबारियों को जोड़ता है. इसे एक सार्वजनिक डिजिटल सुविधा के तौर पर तैयार किया गया था. इसका मकसद केवल पैसे भेजने और लेने की सुविधा देना नहीं था, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को औपचारिक डिजिटल वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना भी था. इसी वजह से यूपीआई ने वित्तीय पहुंच बढ़ाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई.
आज दुनिया के वास्तविक समय में होने वाले हर दो डिजिटल भुगतानों में से एक भारत में होता है. यूपीआई के जरिए हर सेकंड करीब 1 करोड़ रुपये के लेन-देन होते हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में यूपीआई के माध्यम से 314 लाख करोड़ रुपये का भुगतान हुआ.
यूपीआई की पहुंच अब भारत तक सीमित नहीं है. इस वक्त यह दुनिया के 11 देशों में काम कर रहा है. इनमें फ्रांस, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुल्क शामिल हैं. भारत की क्यूआर कोड पर आधारित भुगतान प्रणाली दुनिया की डिजिटल भुगतान व्यवस्था में एक बड़ी कामयाबी बन चुकी है और दूसरे देश भी इसे अपना रहे हैं.

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लेकिन सवाल यह है कि आखिर यूपीआई इतना सफल कैसे हुआ?
इसकी सबसे बड़ी वजहों में से एक इसकी आसान और मुफ्त व्यवस्था है. आम लोगों और छोटे कारोबारियों के लिए तत्काल भुगतान की सुविधा बिना शुल्क के उपलब्ध होने से करोड़ों लोगों ने इसे अपनाया. व्यापारी छूट शुल्क नहीं होने से लाखों छोटे कारोबारियों के लिए डिजिटल भुगतान अपनाना आसान हुआ.
भारत में सड़क किनारे सामान बेचने वाला छोटा दुकानदार हो या बड़े बाजार का कारोबारी, ग्राहक के फोन से कुछ ही सेकंड में उसके खाते में पैसे पहुंच जाते हैं. न नकदी गिनने की जरूरत, न छुट्टे पैसे की चिंता और न ही पैसे लेकर चलने का जोखिम.
यूपीआई की इस सफलता के पीछे सिर्फ एक तकनीक नहीं थी. इसके पीछे कई वर्षों में तैयार हुआ पूरा डिजिटल ढांचा था. स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल, आधार, जनधन खातों और सीधे लाभ हस्तांतरण ने देश में डिजिटल वित्तीय व्यवस्था की नींव मजबूत की. नोटबंदी ने डिजिटल भुगतान की जरूरत को और तेज किया, तो कोविड महामारी के दौरान संपर्क रहित भुगतान की जरूरत ने यूपीआई को और अधिक लोगों तक पहुंचा दिया.
इस तरह तकनीक, सरकारी नीतियां और आम आदमी की बदलती जरूरतों ने एक साथ यूपीआई के विस्तार का रास्ता न केवल तैयार किया बल्कि इसकी रफ्तार भी बढ़ाई.
आज इसकी पहुंच चांदनी चौक जैसे बाजारों में आसानी से देखा जा सकता है. यहां रेहड़ी लगाने वाले, दुकानदार, थोक कारोबारी और ग्राहक रोजाना यूपीआई से भुगतान करते हैं. भारत के छोटे शहरों और गांवों में भी क्यूआर कोड अब आम दृश्य बन चुका है.
यही बदलाव यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत है. यह केवल बड़े शहरों या बड़े कारोबारियों की भुगतान व्यवस्था नहीं है. इसने छोटे कारोबारियों और आम लोगों को भी डिजिटल भुगतान की दुनिया में बराबरी की जगह दी है.

क्या यूपीआई लेन-देन पर कोई लेन-देन शुल्क लगाया जाना चाहिए?
हालांकि यूपीआई की इस कामयाबी के बीच अब इसके भविष्य के आर्थिक मॉडल को लेकर बहस भी तेज हो रही है. सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ श्रेणियों के यूपीआई लेन-देन पर व्यापारी छूट दर या कोई लेन-देन शुल्क लगाया जाना चाहिए, खासकर बड़े कारोबारियों और बड़े लेन-देन के मामले में.
डॉ. शांतनु पॉल का मानना है कि आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर इसका बोझ नहीं पड़ना चाहिए. उनके मुताबिक यूपीआई की सफलता का सीधा संबंध इसके मुफ्त इस्तेमाल से है और इसमें बदलाव करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि आम लोगों से कभी शुल्क लिया जाएगा. पैसे भेजने वालों से शुल्क नहीं लिया जाएगा और शायद 95 प्रतिशत से ज्यादा कारोबारियों से भी कभी शुल्क नहीं लिया जाएगा."
उनके मुताबिक असली समस्या यह है कि यूपीआई के लगातार बढ़ते आकार को बनाए रखने के लिए टिकाऊ कमाई का मॉडल होना चाहिए. भारत में अगले दस साल में यूपीआई का इस्तेमाल अभी के मुकाबले पांच गुना तक बढ़ सकता है और इसे अगले एक अरब लोगों तक पहुंचाने के लिए लंबे समय की आर्थिक व्यवस्था जरूरी होगी.
तो कमाई का मॉडल क्या हो सकता है?
इसी वजह से उनका सुझाव है कि अगर भविष्य में शुल्क लगाया जाए तो उसे केवल बड़े कारोबारियों और बड़े लेन-देन तक सीमित रखा जा सकता है.
उन्होंने कहा, "जहां कुछ बड़े कारोबारी कुछ बड़े लेन-देन के लिए थोड़ा शुल्क दें, वहां कमाई के मॉडल में छोटा बदलाव करना एक स्वीकार्य समझौता हो सकता है."
उन्होंने यह भी कहा कि यह शुल्क अंतरराष्ट्रीय कार्ड भुगतान व्यवस्था की तुलना में काफी कम होना चाहिए. उनके मुताबिक भविष्य में 0.3 से 0.4 फीसद तक व्यापारी छूट दर बड़े कारोबारियों से ली जा सकती है और यह शायद 2000 रुपये से ज्यादा के लेन-देन पर लागू हो. लेकिन आम नागरिक और छोटे कारोबारी इस व्यवस्था से बाहर रहने चाहिए.
पॉल साफ कहते हैं, "इसका बोझ आम ग्राहकों पर नहीं जाना चाहिए. पैसे भेजने वालों पर नहीं जाना चाहिए. छोटे कारोबारियों पर नहीं जाना चाहिए."
उनके मुताबिक भारत में करीब 10 करोड़ छोटे कारोबारी हैं और अभी करीब 65 फीसद छोटे कारोबारी ही इस व्यवस्था तक पहुंचे हैं. इसलिए जब तक हर छोटा कारोबारी यूपीआई का इस्तेमाल करने में सक्षम नहीं हो जाता, तब तक उन पर शुल्क लगाने का सवाल नहीं उठना चाहिए.

यूपीआई से सरकार को भी आर्थिक फायदा होता है. नकदी का इस्तेमाल कम होने से नोट छापने, नकदी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने और नकदी से जुड़ी व्यवस्था को बनाए रखने का खर्च कम होता है. एटीएम का इस्तेमाल भी पहले की तुलना में कम हुआ है.
पॉल का मानना है कि इन बचतों की वजह से सरकार छोटे कारोबारियों को आगे भी समर्थन दे सकती है और बड़े कारोबारियों पर सीमित शुल्क लगाने के विकल्प पर विचार कर सकती है.
उन्होंने कहा, "छोटे कारोबारियों के लिए कुछ नहीं, पैसे भेजने वालों के लिए कुछ नहीं, ग्राहकों के लिए कुछ नहीं, आम नागरिकों के लिए कुछ नहीं, लेकिन बड़े लेन-देन और बड़े कारोबारियों के मामले में शायद शुल्क लगाया जा सकता है."
यूपीआई शुल्क पर सरकार का रुख
यूपीआई शुल्क को लेकर सरकार का मत भी साफ है. मानसून सत्र के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि ग्राहकों से यूपीआई शुल्क नहीं लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि यूपीआई शुरुआत से ही ग्राहकों के लिए मुफ्त रहा है और हर भारतीय बिना किसी लेन-देन शुल्क के इस तत्काल डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल करता रहेगा.
उन्होंने यह भी बताया कि नया विधेयक भुगतान और निपटान प्रणाली कानून, 2007 की धारा 10ए में बदलाव करता है. यह केंद्र सरकार को कानूनी आधार देता है कि वह आधिकारिक अधिसूचना के जरिए यह तय कर सके कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को मुफ्त रखा जाना चाहिए.

UPI से हर सेकेंड 1 करोड़ की लेन देन
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यूपीआई भुगतान प्रणाली में अमेरिकी किरदार
इस पूरी बहस का एक और संवेदनशील पहलू अमेरिका से जुड़े दबाव के आरोप हैं. भारत के अपने डिजिटल भुगतान नेटवर्क के तेजी से बढ़ने से वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय भुगतान कंपनियों के लिए भारतीय बाजार का परिदृश्य बदल गया है. यूपीआई ने पारंपरिक कार्ड आधारित भुगतान व्यवस्था पर निर्भरता को कम किया है.
जब डॉ. शांतनु पॉल से पूछा गया कि क्या भारत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या व्यापक अमेरिकी व्यापारिक हितों के दबाव में काम कर रहा है, तो उन्होंने कहा कि ऐसी चर्चाएं जरूर हैं.
उन्होंने कहा, "ऐसी अफवाहें हैं. मुझे निश्चित तौर पर नहीं पता कि पर्दे के पीछे वास्तव में क्या हो रहा है, लेकिन शायद यह सच है कि दुनिया में व्यापार की पूरी स्थिति ऐसी है कि अमेरिका कई देशों पर दबाव डाल रहा है."
लेकिन उनका यह साफ कहना था कि भारत को अपनी भुगतान व्यवस्था से जुड़े फैसले अपने हित में लेने चाहिए, किसी दूसरे देश के दबाव में नहीं.
उन्होंने कहा, "भारत को अमेरिका की इच्छा के मुताबिक काम नहीं करना चाहिए. जो कुछ भी किया जाए, वह इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हमें उसकी जरूरत है."
उन्होंने आगे कहा कि भारत को इस मामले में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और अपने अधिकारों को मजबूती से बनाए रखना चाहिए.
यही वर्तमान में भारत के यूपीआई की पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू भी है क्योंकि यह न केवल पैसों के लेन-देन का माध्यम है बल्कि अब देश की सबसे बड़ी डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्थाओं में से एक बन चुका है. इसने करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान से जोड़ा है, छोटे कारोबारियों को नई सुविधा दी है और भारत को दुनिया के डिजिटल भुगतान नक्शे पर सबसे आगे खड़ा किया है.

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UPI का मुफ्त मॉडल बने रहना चाहिए
यूपीआई की शुरुआत एक आसान विचार से हुई थी. इसे एक ऐसे डिजिटल भुगतान तंत्र के रूप में तैयार किया गया था जिसे आम लोग आसानी से इस्तेमाल कर सकें और जिसके लिए उन्हें कोई शुल्क न देना पड़े. दस साल बाद यही विचार भारत की सबसे बड़ी डिजिटल वित्तीय कामयाबियों में बदल चुका है.
यूपीआई की अगली कहानी केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि इसमें कितने और लोग जुड़ते हैं. यह इस बात पर भी निर्भर करेगी कि भारत अपनी इस डिजिटल व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत को कितना सुरक्षित रख पाता है.
यूपीआई इसलिए सफल हुआ क्योंकि यह न केवल आसान और तेज था बल्कि आम लोगों से लेकर छोटे कारोबारियों तक के लिए यह मुफ्त में उपलब्ध था. अगर अगले 10 साल में इसे और आगे बढ़ना है तो इसका मुफ्त मॉडल ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी रहनी चाहिए.
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