देश में डिजिटल पेमेंट की रीढ़ कहे जाने वाले यूपीआई (UPI) को लेकर बहस छिड़ी हुई है. टैक्सेशन और अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम, 2026 और भुगतान व निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन से जुड़े कानून को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की मंजूरी के बाद सरकार को UPI और रुपे कार्ड से ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने का कानूनी आधार मिल गया है. हालांकि सरकार ये तय कर सकेगी कि किस तरह के लेनदेन पर MDR चार्ज नहीं लगेगा.
इस बहस के बीच डिजिटल पेमेंट क्रांति के शिल्पकारों में से एक, NPCI यानी नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पूर्व निदेशक डॉ शांतनु पॉलपॉल (Dr Santanu Paul) का मानना है कि आम लोगों के लिए UPI पूरी तरह मुफ्त रहना चाहिए.
किसी दबाव में न झुके भारत: डॉ पॉल
'कैशलेस नेशन' नाम से किताब लिख चुके कंप्यूटर इंजीनियर डॉ शांतनु पॉल ने NDTV से इंटरव्यू में कहा कि आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों के लिए यूपीआई पूरी तरह मुफ्त रहना चाहिए.
क्या बड़े कारोबारियों और हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन पर लगेगा शुल्क?
डॉ पॉल का मानना है कि देश में डिजिटल पेमेंट के इस विशाल नेटवर्क को बनाए रखने और इसका विस्तार करने के लिए एक मजबूत और टिकाऊ बिजनेस मॉडल की जरूरत है. भविष्य में केवल बड़े कारोबारियों और ज्यादा रकम वाले (High-Value) लेन-देन पर ही 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक का मामूली एमडीआर (MDR) शुल्क लगाया जा सकता है. हालांकि, आम जनता और छोटे व्यापारियों को इससे पूरी तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
छोटे दुकानदारों को क्यों मिलना चाहिए फायदा?
उनका तर्क है कि नकद पैसा संभालने (Cash Handling) में होने वाले खर्च में कमी आने और एटीएम के कम इस्तेमाल से जो बचत होती है, वह इस बात को पूरी तरह सही साबित करती है कि छोटे व्यापारियों को डिजिटल भुगतान पर छूट का लाभ मिलना जारी रहना चाहिए.
कैशलेस भारत की ओर कदम विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का 'कैशलेस नेशन' बनने का सफर तभी सफल हो सकता है, जब आम नागरिकों के लिए डिजिटल पेमेंट की सुविधा पूरी तरह मुफ्त बनी रहे और साथ ही इसका पूरा इकोसिस्टम वित्तीय रूप से सुरक्षित रहे.
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