टाटा संस में एन चंद्रशेखरन के पद छोड़ने के बाद टाटा ट्रस्ट ने नए चेयरमैन की तलाश शुरू कर दी है. इसके लिए बाकायदा एक समिति बनाई जाएगी. चंद्रशेखरन फरवरी 2027 तक चेयरमैन बने रहेंगे, और इसलिए कहा जा रहा है कि उससे पहले नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. इस बारे में फिलहाल बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है, लेकिन ताजा घटनाक्रमों के बीच सबकी नजर अक्सर शांत दिखने वाले रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा पर है.
नोएल अभी टाटा ग्रुप के बेहद अहम विंग 'टाटा ट्रस्ट्स' के चेयरमैन हैं, जिसे टाटा ग्रुप में रियल इम्पैक्ट वाला टॉप पोस्ट माना जाता है. चूंकि टाटा संस के चेयरमैन का चयन टाटा ट्रस्ट्स की जिम्मेदारी है, ऐसे में नोएल टाटा का चर्चा में आना लाजिमी है.
पहले भी कई मौकों पर चर्चा में रहे हैं नोएल
बिजनेस घरानों पर स्टडी कर चुके पॉलिसी एक्सपर्ट प्रभात के सिन्हा बताते हैं कि साल 2012 में रतन टाटा ने जब टाटा संस के चेयरमैन पद से हटने का फैसला किया था, तब भी बहुतों की नजर नोएल टाटा पर थी.हालांकि, तब ये जिम्मेदारी साइरस मिस्त्री को दी गई थी. फिर 2016 में जब उन्हें पद से हटाया गया तो भी नोएल टाटा के नाम की चर्चा जोरों पर थी. हालांकि तब TCS के तत्कालीन CEO और MD रहे एन चंद्रशेखरन को टाटा संस की कमान सौंप दी गई. वो टाटा परिवार से बाहर के पहले एग्जीक्यूटिव अधिकारी थे, जिन्हें ये शीर्ष पद दिया गया.
रतन टाटा के निधन के बाद उत्तराधिकारी बने नोएल
प्रभात आगे अपनी बात बढ़ाते हुए कहते हैं कि कई वर्षों के बाद रतन टाटा के निधन के बाद जब 2024 में उनके उत्तराधिकारी की तलाश की जाने लगी तब एक बार फिर नोएल टाटा पर सबकी नजर गई. नोएल टाटा को तब टाटा संस की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर यूनिट 'टाटा ट्रस्ट्स' का चेयरमैन बनाया गया. और इसी के साथ वे टाटा समूह में वास्तविक प्रभाव वाले शीर्ष पद पर पहुंच गए.
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सादगी और स्टेबल ग्रोथ नोएल टाटा की पहचान
बड़े भाई रतन टाटा की तुलना में नोएल टाटा का सफर काफी शांत और लाइमलाइट से दूर रहा है. पर्दे के पीछे रहे नोएल अपनी सादगी और सार्वजनिक चमक-धमक से दूर रहने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपनी पहचान किसी आक्रामक रणनीति से नहीं, बल्कि लगातार स्टेबल ग्रोथ के जरिये बनाई है.
टाटा के ट्रेंट का ही उदाहरण ले लीजिए, 180 बिलियन डॉलर के टाटा ग्रुप के रिटेल वेंचर 'ट्रेंट' को वो नई ऊंचाई पर ले गए. बाद में वोल्टास और टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों में डायरेक्टर के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई.
सिन्हा के मुताबिक, नोएल की कार्यशैली ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. ट्रेंट के माध्यम से उन्होंने 'वेस्टसाइड' और 'जूडियो' जैसे ब्रांड्स को घर-घर में लोकप्रिय बनाया, जो उनकी धीमी लेकिन स्थिर और टिकाऊ विकास की सोच को दर्शाता है.
चुनौतियों के बीच मजबूत होती पकड़
रतन टाटा जैसी महान शख्सियत के बाद टाटा ट्रस्ट्स की कमान संभालना आसान नहीं था. रतन टाटा को भी अपने शुरुआती वर्षों में विरोध झेलना पड़ा था. वहीं, नोएल टाटा को भी कार्यभार संभालने के बाद कुछ अंदरूनी समीकरणों का सामना करना पड़ा. उन्होंने चुनौतियों को बेहद परिपक्वता के साथ संभाला और अपनी नेतृत्व क्षमता साबित की.
नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के भीतर अपनी स्थिति को दिन-ब-दिन मजबूत किया है. वहीं उनके बेटे नेविल टाटा भी सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में हैं. ऐसे में पारिवारिक ट्रस्ट में उत्तराधिकार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में नोएल टाटा का अहम रोल रहने वाला है. एन चंद्रशेखरन के पद छोड़ने के बाद टाटा संस के नेतृत्व और भविष्य की रणनीतिक दिशा तय करने में अब नोएल टाटा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
टाटा ग्रुप की स्थापना 1868 में जमशेदजी टाटा ने की थी. आज पूरा कारोबार 6 महाद्वीपों के 100 से अधिक देशों में फैला है, जिसमें 31 प्रमुख कंपनियां शामिल हैं. टाटा संस इस समूह की मुख्य निवेश होल्डिंग कंपनी है, जिसकी 66% हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स के पास है. ऐसे में चंद्रशेखरन के कार्यकाल पूरा होने के बाद भविष्य के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर नोएल टाटा का रुख और उनका बढ़ता प्रभाव आने वाले समय में टाटा समूह की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
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