आज टाटा ग्रुप फिर खबरों में है. दरअसल टाटा संस के चेयरमैन पद से एन चंद्रशेखरन ने इस्तीफा दे दिया है. इस ग्रुप के पास टाटा की करीब 30 कंपनियों का कंट्रोल था. इनमें टाटा मोटर्स, TCS और एयर इंडिया जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं. बता दें कि एन चंद्रशेखरन 2009 में TCS के CEO बने थे, जबकि 2017 में उन्हें टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया था. इस खबर के सामने आने के बाद एक बार फिर टाटा ग्रुप और उसकी विरासत की चर्चा होने लगी है. टाटा हमेशा से ही बिजनेस के साथ देश और समाज के लिए सोचता रहा है. जब भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान दंगे हुए तो टाटा ग्रुप सरकार के साथ मदद के लिए आगे आया था. इतना ही नेहरू को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष यानी पीएम रिलीफ फंड का आइडिया भी उस वक्त टाटा ग्रुप के चेयरमैन जेआरडी टाटा ने दिया था.
देश में दंगों से व्यथित हो गए जेआरडी टाटा
पूरे देश में जश्न का माहौल था. दो दिन बाद, भारत के आखिरी ब्रिटिश गवर्नर जनरल, लॉर्ड माउंटबेटन मुंबई के मशहूर ताज महल होटल पहुंचे और वहां से उन्होंने लोगों को संबोधित किया. यह कोई इत्तेफाक नहीं था कि उन्होंने इसके लिए ताज होटल को चुना. 40 साल पहले जमशेदजी टाटा द्वारा बनाई यह शानदार इमारत भारत और मुंबई के गौरव का प्रतीक बन चुकी थी. आजादी का वह खुमार अभी उतरा भी नहीं था कि इस सुनहरे आसमान पर बंटवारे के काले बादल घिर आए. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे ने भयानक दंगों और खौफनाक बर्बादी को जन्म दिया. यह शायद मानव इतिहास का सबसे बड़ा पलायन था, जहां लोग अपनी जान बचाकर सरहदें पार कर रहे थे. अनुमान है कि करीब 2 करोड़ लोग इस त्रासदी का शिकार हुए.

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ऐसे मुश्किल वक्त में प्रधानमंत्री की एक अपील पर, अक्टूबर 1947 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने छात्रों की एक विशेष टीम दिल्ली भेजी. इनका काम था शरणार्थियों का सही तरीके से रजिस्ट्रेशन करना, ताकि उन्हें दोबारा बसाने में मदद मिल सके. दोराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा स्पॉन्सर्ड इस टीम ने दिन-रात एक करके इन परिवारों की पढ़ाई, पेशे और जरूरत का पूरा डेटा तैयार किया. खुद प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके काम की तारीफ करते हुए कहा था, "बाकी लोग जो जोश के साथ काम कर रहे थे और इन प्रशिक्षित युवाओं के काम में जमीन-आसमान का फर्क था. सिर्फ उत्साही होने और हुनरमंद होने में यही अंतर होता है."
जेआरडी ने दिया नेहरू को सुझाव
सरकार और तमाम टीमों की कोशिशों के बावजूद, यह साफ था कि पाकिस्तान से आए इन लाखों बेघर लोगों के दर्द पर मरहम लगाने के लिए बहुत बड़े सहारे की जरूरत थी. जेआरडी टाटा इस राष्ट्रीय संकट से बहुत विचलित थे और चाहते थे कि टाटा ग्रुप इसमें बढ़-चढ़कर मदद करे. लेकिन उनकी सोच इससे भी बड़ी थी. वो चाहते थे कि देश में एक ऐसा स्थायी प्लेटफॉर्म बने, जहां से हर तरह की राष्ट्रीय आपदा में राहत के लिए तुरंत फंड जुटाया जा सके. अक्टूबर 1947 में उन्होंने पंडित नेहरू को सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री के नाम पर एक 'राष्ट्रीय राहत कोष' बनाया जाए, ताकि इसकी अहमियत और गंभीरता बनी रहे. साथ ही उन्होंने टाटा ग्रुप की तरफ से इसमें एक बड़ी रकम देने की पेशकश भी की.
जेआरडी के बायोग्राफर आरएम लाला बताते हैं कि जेआरडी ने प्रधानमंत्री से यहां तक पूछा था कि अगर सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है, तो वो उन्हें बताएं कि टाटा ग्रुप को क्या करना चाहिए. उन्होंने लिखा था कि मेरा मानना है कि लोगों द्वारा दिए गए दान का इस्तेमाल उन जरूरतों को पूरा करने के लिए होना चाहिए जो सरकारी मदद से पूरी नहीं हो पातीं.

दो महीने बाद, 11 दिसंबर 1947 को प्रधानमंत्री नेहरू ने जेआरडी को खत लिखा - "मेरे प्यारे जहांगीर, राष्ट्रीय राहत कोष को लेकर फैसला करने में काफी देरी हुई. अपने सहयोगियों से चर्चा के बाद हमने कुछ फैसले लिए हैं, जो साथ में भेजे गए नोट में हैं. मुझे उम्मीद है कि तुम इनसे सहमत होगे." नेहरू का वह नोट आज हमारे इतिहास का एक बेहद दिलचस्प हिस्सा है. उन्होंने लिखा था - "तय किया गया है कि एक विशेष फंड शुरू किया जाए, जिसे 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' (PMNRF) कहा जाएगा. यह एक स्थायी फंड होगा, जिसका इस्तेमाल फिलहाल पंजाब और पाकिस्तान के बाकी हिस्सों से आए शरणार्थियों के लिए होगा."
इस तरह नींव पड़ी 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' की. 1948 में इसके बनने के तुरंत बाद टाटा ग्रुप ने इसमें अपना योगदान दिया. तब से लेकर आज तक, यह फंड बाढ़, भूकंप और तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं में लाखों परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा सहारा साबित हुआ है.
जेआरडी जैसे बड़े उद्योगपति, जो आजादी के तुरंत बाद के उस उथल-पुथल वाले दौर में अपनी कंपनियों को संभालने में दिन-रात व्यस्त रहे होंगे, उन्हें देश के इन बड़े मुद्दों के लिए वक्त और ऊर्जा कहां से मिलती थी. शायद इसका जवाब उस 'विजन' में छिपा है, जो टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा ने तय किया था - कि आप जो भी करें, उसके केंद्र में समाज और देश होना चाहिए.
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