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कोलकाता के अभय चरण कैसे बने इस्कॉन संस्थापक स्वामी प्रभुपाद, सिर्फ ₹40 लेकर पहुंचे थे अमेरिका, आज दुनिया में 700 ISKCON मंदिर

Swami Prabhupada and ISKCON Story: इस्कॉन मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए अब पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य कर दी गई है. जानिए कैसे 1966 में न्यूयॉर्क की सड़कों से शुरू हुआ हरे कृष्णा आंदोलन आज दुनिया भर में एक विशाल आध्यात्मिक क्रांति बन चुका है.

कोलकाता के अभय चरण कैसे बने इस्कॉन संस्थापक स्वामी प्रभुपाद, सिर्फ ₹40 लेकर पहुंचे थे अमेरिका, आज दुनिया में 700 ISKCON मंदिर

अब इस्कॉन मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को खास ड्रेस कोड का पालन करना होगा. श्रद्धालुओं को मंदिर में पारंपरिक वेशभूषा धारण करके आना ही अनिवार्य है. महिलाओं को पारंपरिक साड़ी और पुरुषों को पैंट-शर्ट या फिर धोती-कुर्ता में ही प्रवेश मिलेगा. अगर बात करें इस्कॉन की तो इसकी शुरुआत 1966 में न्यूयॉर्क में हुई थी. आपने कभी सड़कों पर 'हरे कृष्णा' के सुरीले कीर्तन में झूमते, ढोलक और मंजीरों की धुन पर गाते लोगों को देखा होगा. इसे दुनिया 'हरे कृष्णा आंदोलन' के नाम से जानती है. जो बाद में इस्कॉन कहलाया. इसकी शुरुआत स्वामी ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने की थी.

आज दुनिया भर में इसके 700 से ज्यादा भव्य मंदिर, आश्रम और ग्रामीण समुदाय फल-फूल रहे हैं. इतना ही नहीं, शुद्ध और सात्विक जीवनशैली का संदेश देने के लिए इसके 110 से अधिक मशहूर शाकाहारी रेस्टोरेंट भी चल रहे हैं. सदियों से जो भक्ति योग और कृष्ण चेतना भारत की पावन धरती तक सीमित थी, उसे दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी एक शख्सियत को जाता है, तो वो हैं श्रील प्रभुपाद. 
 

महात्मा गांधी से मिली प्रेरणा

कहानी शुरू होती है एक सितंबर, 1896 को कलकत्ता में, जब एक बालक का जन्म हुआ- नाम रखा गया अभय चरण डे. युवावस्था में देशप्रेम का ऐसा जज्बा जागा कि वे महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ गए. लेकिन साल 1922 में उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी. उनकी मुलाकात हुई उस वक्त के महान विद्वान और आध्यात्मिक गुरु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती जी से. 


गुरु का आदेश और संकल्प

पहली ही मुलाकात में गुरुदेव ने अभय के भीतर की आध्यात्मिक लौ को पहचान लिया. उन्होंने अभय से एक बड़ी बात कही- 'भगवान कृष्ण के इस संदेश को अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया तक ले जाओ.' साल 1933 में वे उनके औपचारिक शिष्य बने और मन में ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, गुरु के इस आदेश को पूरा करना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है. इसके बाद के 32 साल अभय (जो बाद में स्वामी प्रभुपाद कहलाए) ने इसी ऐतिहासिक पश्चिम यात्रा की तैयारी में लगा दिए.

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समुद्र का वो तूफानी सफर

साल 1965 की बात है. उम्र थी 69 साल- एक ऐसी उम्र जब लोग आराम की सोचते हैं. लेकिन प्रभुपाद के कंधों पर गुरु का आदेश था. उन्होंने एक मालवाहक जहाज 'जलदूत' में किसी तरह एक मुफ्त टिकट का इंतजाम किया और अमेरिका के लिए रवाना हो गए. यह सफर कोई आसान सफर नहीं था. उन्हें जहाज पर दो-दो बार दिल का दौरा पड़ा. मौत के मुंह से बचकर, 35 दिनों के लंबे और खतरनाक सफर के बाद जब वे बोस्टन के एक सूने बंदरगाह पर उतरे, तो उनके पास न तो कोई बड़ा सहारा था और न ही पैसे. जेब में थे सिर्फ सात डॉलर के बराबर भारतीय रुपए और हाथों में था संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद का एक संदूक.


न्यूयॉर्क का संघर्ष और 'कीर्तन' की गूंज

इसके बाद वे न्यूयॉर्क पहुंचे, जहां संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ. रहने का कोई ठिकाना नहीं था. उन्होंने यहां  श्रीमद्भगवद्गीता की क्लास लेना शुरू किया. टॉम्पकिंस स्क्वॉयर पार्क में पेड़ के नीचे बैठकर वे मंजीरा बजाते और हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करते. उनकी सादगी, उनके चेहरे का तेज और शांति के इस संदेश ने वहां के युवाओं को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया.

वो दौर ऐसा था, जब अमेरिकी युवा शांति की तलाश में भटक रहे थे और प्रभुपाद के इस कीर्तन ने उनके दिलों को छू लिया. जल्द ही, इन युवाओं की मदद से न्यूयॉर्क के लोअर ईस्ट साइड में एक छोटी सी दुकान किराए पर ली गई, जो दुनिया का पहला इस्कॉन मंदिर बना. 

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इस्कॉन की स्थापना 

जुलाई 1966 में, स्वामी ने 'अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ' यानी इस्कॉन (ISKCON) की स्थापना की. उनका मकसद बहुत साफ था- दुनिया में गिरते नैतिक मूल्यों को संभालना और मानवता को वास्तविक शांति और एकता के सूत्र में बांधना. 

अगले 11 सालों में बुजुर्ग संन्यासी स्वामी प्रभुपाद ने पूरी दुनिया के 14 चक्कर लगा डाले. वे जहां भी गए, लोग उनके संदेश के मुरीद होते गए. हर तबके के लोग उनके साथ जुड़ते गए. देखते ही देखते पूरी दुनिया में मंदिर, फॉर्म कम्युनिटीज, पब्लिशिंग हाउस और गुरुकुल खुल गए. इसी दौरान उन्होंने 'हरे कृष्णा फूड फॉर लाइफ' की शुरुआत की, जो आज दुनिया का सबसे बड़ा शाकाहारी भोजन वितरण कार्यक्रम बन चुका है. 

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फिर भारत ने बुलाया

विदेशों में कृष्ण भक्ति जगाने के बाद प्रभुपाद भारत लौटे. उन्होंने वृंदावन और मायापुर जैसे पावन धामों में उन्होंने विशाल केंद्रों और मंदिरों की स्थापना की. 

प्रभुपाद ने कृष्ण भक्ति परंपरा पर 70 से ज्यादा किताबें लिखीं, जिन्हें दुनिया भर के बड़े-बड़े विद्वान उनके गहरे ज्ञान और प्रामाणिकता के लिए बेहद सम्मान से देखते हैं. उनकी किताबें कई यूनिवर्सिटीज के सिलेबस का हिस्सा हैं और इनका 76 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. 'The Bhagavad-gita As It Is', 30 खंडों में 'श्रीमद्भागवतम' और 17 खंडों में 'श्री चैतन्य-चरितामृत' उनकी अमर कृतियां हैं.

14 नवंबर, 1977 को वृंदावन में अपने प्यारे शिष्यों के बीच नाम-संकीर्तन सुनते हुए श्रील प्रभुपाद ने अपने प्राण त्याग दिए. आज उनके शिष्य पूरी दुनिया में उनके इस मिशन को पूरी शिद्दत से आगे बढ़ा रहे हैं. 

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