भारत की आजादी से तीन साल पहले जनवरी 1944 में एक दस्तावेज छपा. इसने अंग्रेजों के बीच भारी हलचल और चिंता पैदा कर दी. बाद में यही यूके में भी छापा गया. लेकिन यह दस्तावेज आखिर था क्या, जिससे अंग्रेज घबरा गए थे. असल में यह भारत के आर्थिक विकास का प्लान था, जिसे जल्द ही 'बॉम्बे प्लान' कहा जाने लगा. इस प्लान को 8 लोगों ने मिलकर तैयार किया था.
इस प्लान को जिसने तैयार किया था, उसनें जेआरडी टाटा और जीडी बिड़ला भी थे. इसलिए इसे 'टाटा-बिड़ला प्लान' का नाम भी दिया गया. यह एक ऐसा प्लान था, जिसमें देश के औद्योगिक विकास में भारी निवेश की बात कही गई थी.
अंग्रेज क्यों हो गए थे इतना परेशान?
इस प्लान से भारत में उस समय वायसराय लॉर्ड वेवेल इतने परेशान हुए कि उन्होंने तुरंत लंदन में विदेश मंत्री को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि 'भारत के लिए 10 हजार करोड़ रुपये की आर्थिक योजना ने काफी हलचल मचा दी है.'
इसके बाद मई 1944 में एक और पत्र में उन्होंने लिखा कि 'सर ग्रेगरी का मानना है कि हमें तुरंत एक जवाबी पैम्फलेट तैयार करना चाहिए और उसे इंडिया ऑफिस के माध्यम से प्रसारित करना चाहिए.'
साफ है कि अंग्रेजों को चोट पहुंची थी. उन्हें इस बात से चोट पहुंची थी कि भारतीय, भारत के भविष्य के लिए सोच-विचार के मामले में उनसे बहुत आगे निकल गए थे.
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किसने तैयार किया 'बॉम्बे प्लान'?
इस प्लान को तैयार करने वालों में जेआरडी टाटा शामिल थे, जिन्होंने 8 साल पहले ही टाटा ग्रुप के चेयरमैन का पद संभाला था. उनसे 10 साल बड़े और बिड़ला ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के मालिक जीडी बिड़ला भी इसमें थे.
इन दोनों के अलावा, इस प्लान को तैयार करने वालों में दिल्ली के डीसीएम ग्रुप के चेयरमैन लाला श्रीराम, अहमदाबाद के उद्योगपति कस्तूरभाई लालभाई और मुंबई के बिजनेसमैन और टाटा ग्रुप के डायरेक्टर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास भी थे.
इन पांच उद्योगपतियों के साथ तीन टेक्नोक्रेट- सर अर्देशिर दलाल, एडी श्रॉफ और डॉ. जॉन मथाई थे. तीनों ही टाटा ग्रुप से थे.

इस प्लान को क्यों बनाया गया?
इस बारे में जेआरडी टाटा ने एक बार कहा था, 'मुझे पता था कि हमारे देश को आजादी मिलनी ही थी. मुझे पता था कि देश की इकॉनमी को संभालना होगा, ताकि आर्थिक समृद्धि सिर्फ कुछ लोगों तक ही नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और इसके लिए सिर्फ सरकार को ही नहीं, बल्कि बिजनेसमैन को भी भूमिका निभानी चाहिए.'
इस प्लान को तैयार करना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि ब्रिटिश सरकार के पास भारत के भविष्य के लिए कोई लॉन्ग टर्म आर्थिक प्लान नहीं था.
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'बॉम्बे प्लान' में क्या था?
इस प्लान को भारत की जरूरत और भारत के भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. इसमें इंसान की तीन बुनियादी जरूरतों- रोटी, कपड़ा और मकान का ध्यान रखा गया था.
जेआरडी टाटा आत्मकथा में लिखते हैं, 'जीडी बिड़ला बहुत बुद्धिमान और जानकार व्यक्ति थे. जब हम कोई ढांचा तय करने में जूझ रहे थे तो उन्होंने ही सुझाव दिया कि आजादी के बाद भारत को क्या करना चाहिए? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. इसलिए पहले यह अनुमान लगाते हैं कि लोगों को किस तरह का जीवन-स्तर चाहिए. इसके लिए क्या-क्या चाहिए? कितनी कैलोरी वाला भोजन, कितने मीटर कपड़ा, कितने घर, स्कूल वगैरह की जरूरत होगी.'
'बॉम्बे प्लान' में लिखा था कि एक वयस्क भारतीय को रोजाना 2,600 कैलोरी वाला संतुलित और पौष्टिक आहार मिलना चाहिए. इसमें हिसाब लगाया गया कि भारत की उस समय की 38.9 करोड़ की आबादी तक यह खाना पहुंचाने के लिए सालाना 2,100 करोड़ रुपये के खर्च की जरूरत होगी. भोजन, कपड़े, घर, शिक्षा और उद्योग के लिए कुल 10,000 करोड़ रुपये की जरूरत का हिसाब इसमें लगाया गया था.
इस प्लान में यह भी बताया गया था कि इस जरूरत को पूरा करने के लिए पैसा कहां-कहां से लाया जा सकता है. इसमें देश के गोल्ड के इस्तेमाल का भी सुझाया गया था. साथ ही टैक्स लगाने और नए नोट छापने जैसे सुझाव भी थे. आजाद भारत के आर्थिक विकास के लिए यह पहला व्यवस्थित प्लान था. यह प्लान अगले 15 साल के लिए था.
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अंग्रेज घबराए, भारतीयों ने क्या कहा?
'बॉम्बे प्लान' के आते ही अंग्रेज घबरा गए थे. एक तरह से यह उनके लिए चेतावनी थी कि अब भारत छोड़ दें और भारतीयों को सत्ता सौंप दें. दूसरी तरफ भारत में भी इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली. गांधीवादी लोगों ने इसे गांधीजी की विचारधारा के खिलाफ माना. वहीं, कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वालों ने जल्द ही इसके जवाब में अपना प्लान पेश किया.
15 फरवरी 1944 को बॉम्बे के रोटरी क्लब को संबोधित करते हुए जेआरडी टाटा ने इस प्लान का बचाव करते हुए कहा, 'एक ऐस देश में, जिसे कुदरत ने भरपूर मैनपावर, टैलेंट और प्राकृतिक संसाधनों से नवाजा है, वहां गरीबी और बदहाली का होना शर्म की बात है. इस पर हमें शर्म और गुस्सा आना चाहिए और हमारे लोगों के साथ हुए इस भयानक अन्याय को खत्म करने की इच्छा होनी चाहिए.'
हालांकि, आजादी के बाद इस प्लान को गंभीरता से नहीं लिया गया. कई सालों बाद 1986 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने 'बॉम्बे प्लान' को जेआरडी टाटा के अहम योगदानों में से एक बताया था. इस पर जेआरडी टाटा ने जवाब देते हुए कहा- 'इसमें मेरा एकमात्र योगदान बॉम्बे प्लान को लिखवाने का इंतजाम करना था. इस प्लान का ड्राफ्ट तैयार करने का काम डॉ. जॉन मथाई ने किया था, लेकिन काफी चर्चा और विचार-विमर्श के बाद.'
'बॉम्बे प्लान' दुनिया में अपनी तरह का पहला ऐसा उदाहरण है, जिसमें इंडस्ट्री लीडर्स ने अपनी सीमाओं और प्रतिद्वंद्विता से बाहर निकलकर और आपस में मिलकर एक राष्ट्रीय आर्थिक योजना तैयार की थी.
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