भारत में ज्यादातर लोग रिटायरमेंट के बाद पैसिव इनकम (Passive Income) के लिए एक छोटा सा कमर्शियल स्टोर या दुकान खरीदकर उसे किराए पर देने के प्लान के बारे में सोचते हैं. लोगों को लगता है कि दुकान किराये पर चढ़ेगी, हर महीने कमाई होगी और समय के साथ प्रॉपर्टी की कीमत भी बढ़ सकती है. लेकिन क्या एक दुकान से रिटायरमेंट का खर्च निकल सकता है? यह प्लान बहुत आसान और फायदेमंद लगता है. दुकान खरीदो, हर महीने किराया पाओ और रिटायरमेंट के बादर बेफिक्र होकर जियो. लेकिन क्या यह वाकई इतना आसान है?
हकीकत यह है कि ₹50 लाख की दुकान का किराया अक्सर आपकी बैंक EMI से कम पड़ता है, यानी जेब से पैसे देने पड़ते हैं. क्या वाकई एक दुकान आपका बुढ़ापा संवार सकती है .इसका जवाब खरीद की कीमत, किराये, लोन और प्रॉपर्टी की लोकेशन पर निर्भर करता है. आइए समझते हैं ₹50 लाख के निवेश, EMI, मेंटेनेंस और 15 साल के इंतजार का पूरा गणित...
₹50 लाख की दुकान से कितनी कमाई?
मान लीजिए, कोई व्यक्ति ₹50 लाख की दुकान खरीदता है और उसे ₹25,000 महीने के किराये पर देता है. इससे सालाना ₹3 लाख की कमाई होगी. इस हिसाब से दुकान की ग्रॉस रेंटल यील्ड 6% होगी. रेंटल यील्ड का मतलब प्रॉपर्टी की कीमत के मुकाबले सालाना किराये से मिलने वाला रिटर्न है. लेकिन पूरा किराया मालिक की जेब में नहीं आएगा. मरम्मत, मेंटेनेंस और दुकान खाली रहने जैसी स्थितियों के लिए 15% रकम अलग रखने पर सालाना ₹2.55 लाख बचेंगे. यह करीब ₹21,250 महीने है. इस तरह नेट ऑपरेटिंग यील्ड 5.1% रह जाती है.
EMI किराये से ज्यादा तो क्या होगा?
अगर दुकान खरीदने के लिए ₹10 लाख डाउन पेमेंट दिया जाए और बाकी ₹40 लाख का लोन 20 साल के लिए 9% ब्याज पर लिया जाए, तो EMI करीब ₹36,000 महीने होगी.इसके मुकाबले दुकान से खर्च निकालने के बाद ₹21,250 ही मिल रहे हैं. ऐसे में हर महीने करीब ₹14,750 अपनी सैलरी या बचत से देने होंगे. इसमें इनकम टैक्स, स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और खरीद के दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं.
15 साल बाद कितनी बढ़ सकती है कीमत?
मान लें कि दुकान की कीमत और किराया हर साल 5% बढ़ते हैं. यह सिर्फ अनुमान है, भविष्य में मिलने वाले रिटर्न की गारंटी नहीं.इस हिसाब से 15 साल बाद ₹50 लाख की दुकान की कीमत करीब ₹1.04 करोड़ हो सकती है. वहीं, ₹25,000 का मासिक किराया बढ़कर करीब ₹52,000 हो सकता है. सालाना किराया ₹6.24 लाख होगा.इसमें से 15% रकम खर्च और दुकान खाली रहने की स्थिति के लिए अलग रखने पर करीब ₹5.30 लाख सालाना या ₹44,200 महीने बचेंगे. यह इनकम टैक्स और बचे हुए लोन की EMI से पहले का हिसाब है.
हालांकि, हर जगह किराये की मांग एक जैसी नहीं होती. अच्छी लोकेशन की दुकान और खाली पड़े कॉम्प्लेक्स की दुकान का रिटर्न काफी अलग हो सकता है.
दुकान बेचकर बड़ी प्रॉपर्टी खरीदना सही है?
निवेशक चाहें तो कुछ साल बाद दुकान बेचकर किसी बड़े बिजनेस डिस्ट्रिक्ट, प्राइम हाई स्ट्रीट या अच्छी कनेक्टिविटी वाले इलाके में दूसरी प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं. इससे किराया बढ़ने की संभावना हो सकती है, लेकिन बड़ी प्रॉपर्टी के लिए ज्यादा पैसा भी लगेगा. दुकान बेचने पर बचे लोन, बिक्री के खर्च, लागू टैक्स और नई प्रॉपर्टी की खरीद का खर्च निकालना होगा. इसलिए बिक्री की पूरी रकम को मुनाफा मानना सही नहीं है.
₹50,000 महीने की इनकम के लिए कितना किराया चाहिए?
अगर रिटायरमेंट के बाद आज के हिसाब से ₹50,000 महीने की इनकम चाहिए, तो सालाना ₹6 लाख की जरूरत होगी.पहली दुकान से खर्च निकालने के बाद करीब ₹2.55 लाख सालाना मिलते हैं. यह लक्ष्य का लगभग 43% है. 15 साल बाद अनुमानित कमाई बढ़कर ₹5.30 लाख सालाना हो सकती है, लेकिन तब तक महंगाई के कारण खर्च भी बढ़ चुके होंगे.₹50,000 की जो कीमत आज है, 15 साल बाद उसी रकम से उतनी चीजें खरीद पाना मुश्किल हो सकता है. इसलिए रिटायरमेंट की प्लानिंग में महंगाई को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
दुकान किराये पर दें या अपना बिजनेस चलाएं?
रिटायरमेंट के बाद दुकान का इस्तेमाल अपना बिजनेस शुरू करने के लिए भी किया जा सकता है. इससे किसी दूसरे मकान मालिक को किराया नहीं देना पड़ेगा. हालांकि, सामान, स्टाफ, मशीनों और रोजमर्रा के काम पर खर्च होगा. बिजनेस चलाने के लिए समय और मेहनत भी चाहिए.
दूसरा ऑप्शन दुकान किराये पर देने का है. इसमें रोजाना काम कम हो सकता है, लेकिन किरायेदार ढूंढने, मरम्मत, एग्रीमेंट और दुकान खाली रहने जैसी जिम्मेदारियां बनी रहेंगी.
सिर्फ एक दुकान के भरोसे जल्दी रिटायर हुआ जा सकता है?
एक दुकान से रिटायरमेंट की तैयारी हो सकती है.दुकान आगे चलकर परिवार की संपत्ति भी बन सकती है. अगली पीढ़ी इसे किराये पर देकर कमाई कर सकती है या खुद का बिजनेस चला सकती है. हालांकि, उसके साथ मेंटेनेंस और दूसरी जिम्मेदारियां भी आएंगी. लेकिन सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ने का इंतजार करना सही नहीं है.इसलिए ये फैसला लेने के लिए किराये से होने वाली असली कमाई, लोन का बोझ और भविष्य के खर्चों का हिसाब लगाना जरूरी है.
इसके अलावा, इमरजेंसी फंड और दूसरे निवेश बनाए रखना जरूरी है. पूरी सेविंग एक ही दुकान में लगाने से रिस्क बढ़ सकता है, क्योंकि कमाई एक लोकेशन, एक किरायेदार और स्थानीय बाजार पर निर्भर हो सकती है.
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