1 अप्रैल 2026 से नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत के साथ ही नौकरीपेशा लोगों के जीवन में बड़े बदलाव होने जा रहे हैं. सरकार नया इनकम टैक्स एक्त 2025 (New Income Tax Act 2025) और नया लेबर कोड (New Labour Code) लागू करने जा रही है. इन नियमों के लागू होने के बाद सैलरी स्ट्रक्चर, इन-हैंड सैलरी और रिटायरमेंट फंड पर सीधा असर पड़ेगा.
क्या है नया लेबर कोड?
नए लेबर कोड में सबसे बड़ा बदलाव बेसिक सैलरी को लेकर है. नए नियमों के अनुसार किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी उसकी कुल सीटीसी का कम से कम 50 फीसदी होनी चाहिए. अभी के समय में कई कंपनियां टैक्स बचाने के लिए बेसिक सैलरी को कम रखती हैं और भत्तों जैसे एचआरए, ट्रेवल अलाउंस और स्पेशल अलाउंस को 70 से 80 फीसदी तक बढ़ा देती हैं. अब नए नियम के बाद सभी भत्ते कुल सैलरी के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकते.
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टेक-होम सैलरी पर असर
बेसिक सैलरी बढ़ने का सीधा असर आपकी टेक-होम यानी हाथ में आने वाली सैलरी पर पड़ेगा. क्योंकि पीएफ और ग्रैच्युटी का कैलकुलेशन बेसिक सैलरी के बेस पर होता है, इसलिए बेसिक पे बढ़ने से आपका पीएफ योगदान भी बढ़ जाएगा. पीएफ ज्यादा कटने से महीने के आखिर में मिलने वाली इन-हैंड सैलरी में कमी आ सकती है. हालांकि इसकी अच्छी बात ये है कि आपका रिटायरमेंट फंड पहले की तुलना में काफी बड़ा हो जाएगा.
इनकम टैक्स का गणित
सैलरी स्ट्रक्चर बदलने से टैक्स पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है. जो कर्मचारी पुरानी टैक्स रिजीम में हैं, उनके लिए बेसिक पे बढ़ने से एचआरए पर मिलने वाली टैक्स छूट कम हो सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि एचआरए छूट का एक हिस्सा बेसिक सैलरी के 10% के बेस पर तय होता है. हालांकि दूसरी तरफ न्यू टैक्स रिजीम चुनने वालों के लिए समस्या कम है. नए रिजीम में 12.75 लाख रुपये तक की साल की इनकम पर कोई टैक्स नहीं देना होगा.
कंपनियों और कर्मचारियों के लिए बड़ी बातें
कंपनियों को अब अपने पेरोल सिस्टम को नए सिरे से बनाना होगा. अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी अभी टोटल सैलरी का 20 से 30% है तो कंपनी को उसे बढ़ाकर 50% करना जरूरी होगा. इससे कंपनी पर ग्रैच्युटी और पीएफ कंट्रीब्यूशन का बोझ भी बढ़ेगा.
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