अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा. रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान, हवाई सफर, ट्रांसपोर्ट, पेंट, प्लास्टिक और कई दूसरी इंडस्ट्री की लागत भी बढ़ सकती है. Goldman Sachs ने चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो इस साल के आखिर तक ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. ऐसे में सवाल है कि किन सेक्टरों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा और क्यों? आइए आसान भाषा में समझते हैं...
$100 के ऊपर बना हुआ है कच्चा तेल, क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
शुक्रवार, 24 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहीं. ब्रेंट क्रूड 0.43% यानी 44 सेंट की बढ़त के साथ 100 डॉलर से ऊपर कारोबार करता दिखा. वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड 0.69% यानी 64 सेंट चढ़कर 92.83 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया.
बाजार के जानकारों के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने लाल सागर (Red Sea) में सऊदी तेल टैंकरों पर हमला किया है. वहीं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में पहले से ही रुकावट बनी हुई है. ये दोनों दुनिया के सबसे अहम तेल सप्लाई रूट माने जाते हैं.
कुछ ही दिन पहले $120 के करीब पहुंच गया था ब्रेंट क्रूड
गुरुवार को ब्रेंट क्रूड में करीब 7% की तेज बढ़त देखने को मिली और यह मई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया. हालांकि यह अब भी युद्ध के दौरान बने करीब 120 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड लेवल से नीचे है. इससे पहले अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और नेवल ब्लॉकेड की खबरों के दौरान ब्रेंट क्रूड 119.50 डॉलर से 120 डॉलर तक पहुंच गया था. यानी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ते ही तेल की कीमतें तेजी से उछल सकती हैं.
बता दें कि कुछ सप्ताह पहले हालात बिल्कुल अलग थे. तब अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद उम्मीद थी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुल जाएगा. इसी उम्मीद में ब्रेंट क्रूड 72 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गया था.
Goldman Sachs की चेतावनी, $120 तक जा सकता है ब्रेंट क्रूड
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल का निर्यात सामान्य नहीं हुआ तो इस साल के आखिर तक ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. ऐसे में दुनियाभर के बाजारों के साथ भारत की कई इंडस्ट्री पर भी दबाव बढ़ सकता है.
ऑटो और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सबसे पहले पड़ेगा असर
कच्चा तेल महंगा होने का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की लागत पर पड़ता है. इससे तेल कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है. ट्रक, बस, टैक्सी और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने का असर माल ढुलाई पर भी दिख सकता है. अगर ट्रांसपोर्ट महंगा होता है तो सब्जी, फल, अनाज और दूसरे रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.
FMCG और पैकेजिंग कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है
बिस्कुट, साबुन, शैम्पू, खाने का तेल और दूसरे FMCG प्रोडक्ट्स की प्लास्टिक पैकेजिंग पेट्रोकेमिकल से जुड़ी होती है. इसके साथ ही ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बढ़ सकता है. ऐसे में कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है या फिर कुछ मामलों में ग्राहकों तक महंगे दाम का असर पहुंच सकता है.
पेंट, प्लास्टिक और केमिकल इंडस्ट्री क्यों रहेगी दबाव में?
पेंट, प्लास्टिक पाइप, सिंथेटिक रबर, पैकेजिंग और कई केमिकल उत्पाद पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल से बनते हैं. इसलिए कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर इनकी प्रोडक्शन कॉस्ट भी बढ़ सकती है. हालांकि अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचा पाती हैं या नहीं.
टेक्सटाइल सेक्टर पर भी पड़ सकता है असर
पॉलिएस्टर और दूसरे सिंथेटिक फाइबर पेट्रोकेमिकल चेन से जुड़े होते हैं. ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आती है तो टेक्सटाइल सेक्टर के लिए कच्चा माल महंगा हो सकता है.
सीमेंट, स्टील और इंफ्रास्ट्रक्चर की भी बढ़ सकती है लागत
सीमेंट, स्टील और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भारी मशीनरी चलाने और माल ढुलाई के लिए डीजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. सड़क निर्माण में बिटुमेन भी अहम भूमिका निभाता है, जो पेट्रोलियम से जुड़ा उत्पाद है. ऐसे में महंगा क्रूड इन परियोजनाओं की कुल लागत बढ़ा सकता है.
एविएशन सेक्टर में मार्जिन और हवाई किराए पर असर
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की लागत बढ़ सकती है. एयरलाइंस के कुल खर्च में ईंधन की बड़ी हिस्सेदारी होती है. अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो इसका असर एयरलाइन कंपनियों के मार्जिन और हवाई किराए दोनों पर पड़ सकता है.
एग्रीकल्चर और फूल इन्फ्लेशन पर भी पड़ सकता है असर
खेती में ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और फसल की ढुलाई के लिए डीजल का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा कई कृषि इनपुट की सप्लाई चेन भी ऊर्जा लागत पर निर्भर करती है. ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने से खेती की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर आगे चलकर फूल इन्फ्लेशन पर भी देखने को मिल सकता है.
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