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This Article is From Sep 19, 2016

लाल होते-होते रह गई फिल्म ‘पिंक’...

Dr Vijay Agrawal
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 20, 2016 15:06 pm IST
    • Published On सितंबर 19, 2016 22:25 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 20, 2016 15:06 pm IST
जर्मनी के महान नाटकार बर्टोल्ट ब्रेख्त ने नाटकों के बारे में कहा था कि इसे लिखते और इसके मंचन के समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहए कि पाठक या दर्शक की चेतना के साथ उसकी एक दूरी बनी रहे, ताकि वह उसके बारे में विचार करने की स्थिति में हो. ब्रेख्त के यह विचार उनसे लगभग 2300 साल पहले के यूनानी विचारक अरस्तू से बिल्कुल उलट थे, जो नाटक की शक्ति को देखते ही इस रूप में थे कि वह दर्शकों को भावनात्मक रूप से कितना उद्वेलित कर पाता है. इसे ही हमारे भरत मुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में साधारणीकरण के सिद्धांत द्वारा भावनात्मक आवेगों का जागृत होना कहा.

दरअसल, फिलहाल बहुत ही चर्चित फिल्म ‘‘पिंक’’, जिसे कुछ लोग यथार्थवादी तो कुछ लोग प्रयोगधर्मी, तो कुछ लोग बहुत बोल्ड फिल्म कह रहे हैं, को देखते समय एक साथ यह तीनों विचारक याद आए. इनमें से केवल एक ही याद इसलिए नहीं आए, क्योंकि इस फिल्म ने किसी एक लकीर को लेकर चलने की कोशिश तो की, जो ब्रेख्त की लकीर है, लेकिन बहुत जल्दी वह लड़खड़ाकर अपना ट्रेक बदलकर दूसरी लकीर पर दौड़ने लगती है. इसका नतीजा यह होता है कि पहले दिमाग को झिंझोड़कर सोचने को मजबूर करने वाली यह फिल्म बाद में दिल में उथल-पुथल पैदा करने लगती है. और इसी रूप में यह खत्म भी हो जाती है.

फिल्म ‘‘पिंक’’ आज की लड़कियों से जुड़ी हुई एक बहुत बड़ी और समाज के लिए, विशेषकर लड़कों के लिए एक बहुत ही शर्मनाक घटना को महानगरीय परिवेश के अत्यंत आधुनिक संदर्भों में उठाती है. इसमें पुरुष मित्र के साथ रात में रॉक शो में जाना, फिर अनजान लड़कों के साथ वहीं से डिनर के लिए चले जाना, उनके साथ बैठकर ‘ड्रिंक’ लेना, अश्लील चुटकुले सुनाना, फिर उनके साथ अकेले ही कमरे में जाकर दुबारा ड्रिंक लेने को आज की लड़कियों के एक अधिकार के रूप में प्रस्तुत करके ‘वीमेन लिब’ को एक व्यापक परिभाषा दी गई है. चूंकि बाद में कोर्ट में सारी बहस इसी ‘नारी स्वतंत्रता’ पर केंद्रित है, इसलिए अपने कथ्य में इसे एक यथार्थवादी फिल्म ही कहा जाएगा.

इस फिल्म की विषयवस्तु की प्रासंगिकता के कारण (विशेषकर निर्भया कांड के बाद से) यह कहना गलत नहीं है कि इसे हर लड़के और लड़की को देखना चाहिए, ताकि उनकी मानसिकता में बदलाव आ सके. निःसंदेह रूप से यह बदलाव न केवल जरूरी है, बल्कि जरूरी यह भी है कि यह जल्दी से जल्दी घटित हो. यानी कि यहां सिनेमा की सामाजिक भूमिका को स्वीकारा जा रहा है. इसे रूसी साहित्यकार टालस्टाय ने तब ही स्वीकार कर लिया था, जब लगभग सवा सौ साल पहले उन्होंने दुनिया की पहली फिल्म देखी थी.
    
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिनेमा जैसी विधा कला के इस उद्देश्य को क्या दर्शकों में भावनात्मक उत्तेजना पैदा करके, जो काफी अतार्किक होती है, पूरा कर सकती है? फिल्म ‘पिंक’ में अंततः यही तरीका दिखाई देता है, और इसका अनुभव भी होता है. वकील दीपक सहगल (अभिताभ बच्चन) के पास अपने मुवक्किलों (तीनों लड़कियों) के पक्ष में ऐसे अकाट्य, प्रभावशाली और यहां तक कि कानूनी तर्क नहीं हैं, जो अपील करते हों. यहां तक कि उन गतिविधियों को, जिनकी चर्चा इसी में पहले की गई है? (अनजान लड़कों के साथ जाना, ड्रिंक लेना आदि-आदि), को वे ‘शरीरिक संबंधों के प्रति व्यक्त की गई सहमति के संकेत’ को नकारने में कमजोर पड़ गए हैं. वहां वे तर्क देने वाले एक वकील या बौद्धिक व्यक्ति की बजाए एक उपदेशक या एक्टिविस्ट  ज्यादा मालूम पड़ते हैं.
    
दूसरी ओर अभिताभ बच्चन उन प्रबल साक्ष्यों पर एकदम ध्यान नहीं देते, जो उनके पक्ष को पुख्ता बनाते, मसलन उन लड़कियों को किराये के घर से निकाले जाने की धमकी, लड़कों द्वारा सीधे-सीधे लड़कियों को दी जाने वाली चेतावनियां, एक लड़की का खुलेआम अपहरण होना तथा उन लड़कियों द्वारा पुलिस में लिखवाई गई रिपोर्ट आदि. यह घटनाएं फिल्म में प्रमुखता से दर्ज हैं. यदि बाद में इनका इस्तेमाल नहीं किया जाना था, तो फिर इनका औचित्य ही क्या था? शायद दर्शकों के भावनात्मक उद्रेक के लिए. और यहीं पर फिल्म अपने सामाजिक मकसद से दूर जाती मालूम पड़ने लगती है. बाद में लड़कियों की तकलीफें, दयनीयता, इसी बीच वकील की पत्नी के निधन के दृश्य मात्र इसी भावोद्रेगता के लिए लाए गए हैं. इससे एक यथार्थवादी फिल्म मूलतः मेलोड्रामा टाइप की फिल्म बन गई है.

इस फिल्म को देखते हुए फिल्मकार शोएब मंसूर की दो फिल्में ‘खुदा के लिए’ तथा ‘बोल’ बेतहाशा याद आने लगती हैं, जिनमें क्रमश: धर्म तथा नारी अधिकार के पक्ष में ऐसे तीखे एवं प्रबल तर्क दिए गए हैं कि दर्शक उन्हें मानने को विवश हो जाता है. ‘पिंक’ में भी इसकी गुंजाइश थी, जिसे गंवा दिया गया. कोई भी फिल्म केवल अभिनय के दम पर अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह नहीं कर सकती. उसमें व्यक्त विचारों में दम होना जरूरी है. तभी वह लाल रंग अख्तियार कर पाती है.

डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

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