भारत जैसे विशाल देश में प्रधानमंत्री का आम नागरिकों से सीधा संवाद आसान काम नहीं है. फिर भी पिछले 12 सालों से हर महीने के आखिरी रविवार को एक आवाज पूरे देश में गूंजती है. यह आवाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है और कार्यक्रम का नाम है 'मन की बात'. आकाशवाणी पर शुरू हुआ यह कार्यक्रम आज रेडियो, दूरदर्शन, यूट्यूब और मोबाइल तक पहुंच चुका है. सवाल यह है कि लोग इसे इतनी आत्मीयता से क्यों सुनते हैं.
बीती 30 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मन की बात कार्यक्रम को सुनने के लिए ईस्ट दिल्ली का सैनी एंक्लेव का पार्क सुबह साढ़े बजे तक भर चुका था.पार्क में आए लोगों में बिजनेस की दुनिया से लेकर पेशेवर लोग थे. वहां पर महिलाओं और नौजवान भी काफी थे.
कब हुई थी 'मन की बात' की शुरुआत
इस कार्यक्रम की शुरुआत तीन अक्टूबर 2014 को विजयदशमी के दिन हुई थी. उस समय कई लोग सोच रहे थे कि रेडियो का जमाना तो बीत गया. टीवी और सोशल मीडिया के युग में प्रधानमंत्री रेडियो क्यों चुनेंगे. लेकिन यही चुनाव इसकी सबसे बड़ी ताकत बना. देश के कई गांवों और दूर-दराज के इलाकों में टीवी या तेज इंटरनेट नहीं है, लेकिन रेडियो पहुंच जाता है. आकाशवाणी का जाल बहुत बड़ा है. इसलिए यह आवाज शहर से लेकर पहाड़ी गांव तक पहुंची.
ईस्ट दिल्ली में केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा के साथ मन की बात सुन रहे सोशल वर्कर और आयकर मामलों के सलाहकार सुरेंद्र गंभीर कहते हैं कि 'मन की बात' की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजनीति नहीं होती. प्रधानमंत्री स्वयं कई बार कह चुके हैं कि इसके असली एंकर देश के नागरिक हैं. हर महीने लाखों पत्र, संदेश और सुझाव आते हैं. कुछ लोग फोन पर अपनी बात कहते हैं. इन कहानियों को प्रधानमंत्री अपनी भाषा में पिरोते हैं. कोई किसान चाची हो, कोई छात्र जो घाट साफ करता हो, कोई बच्चा जो शिकारा चलाता हो या कोई महिला जो गांव में बदलाव ला रही हो, सबकी चर्चा होती है. आम आदमी जब अपनी जैसी कहानी रेडियो पर सुनता है तो उसे लगता है कि प्रधानमंत्री उसे जानते हैं. यही आत्मीयता पैदा करता है.
कैसी है 'मन की बात' की भाषा
भाषा बहुत सरल होती है. भारी शब्दों और आंकड़ों का ढेर नहीं लगाया जाता. बात परिवार के बड़े सदस्य की तरह होती है. गंभीर जी के साथ बैठे बिजनेसमैन सुशील तिवारी कहते हैं कि इसमें नारा नहीं, कहानी होती है. नसीहत नहीं, प्रेरणा होती है. लोग कहते हैं कि सुनते समय ऐसा लगता है मानो प्रधानमंत्री उनके घर में बैठे बात कर रहे हों. रेडियो का माध्यम भी इसमें मदद करता है. टीवी पर चेहरा दिखता है, रेडियो पर सिर्फ आवाज आती है. आवाज दिल तक पहुंचती है.
आईआईएम रोहतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की करीब 96 फीसद जनता इस कार्यक्रम से परिचित है. करीब 23 करोड़ लोग इसे नियमित सुनते हैं और सौ करोड़ से अधिक लोगों ने कम से कम एक बार सुना है. श्रोताओं ने इसकी लोकप्रियता का कारण सशक्त नेतृत्व और भावनात्मक जुड़ाव बताया. लोग प्रधानमंत्री को ज्ञानी, संवेदनशील और सहानुभूति रखने वाला मानते हैं. सर्वे में यह भी आया कि 60 फीसद लोग राष्ट्र निर्माण में रुचि रखते हैं और 73 फीसद मानते हैं कि देश सही दिशा में जा रहा है.
क्या होता ही पीएम मोदी की अपील की असर
इस कार्यक्रम ने कई सामाजिक आंदोलनों को ताकत दी. पहले एपिसोड में खादी पहनने की बात हुई तो खादी की बिक्री तेजी से बढ़ी. स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, वोकल फॉर लोकल, हर घर तिरंगा जैसी मुहिमों को इससे बल मिला. योग, पर्यावरण, स्टार्टअप, अंगदान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषय बार-बार आए. कोरोना काल में यह कार्यक्रम और महत्वपूर्ण हो गया. लोग घर बैठे सरकार की योजनाएं और सही जानकारी इसी से लेते थे.
कार्यक्रम सिर्फ बोलने का नहीं, सुनने का भी माध्यम बना. प्रधानमंत्री हर महीने सुझाव मांगते हैं. लोग लिखते हैं कि अगली बार किस विषय पर बात हो. इससे नागरिक को लगता है कि उसकी राय मायने रखती है. लोकतंत्र में संवाद दो तरफा होना चाहिए.'मन की बात' इसी दो तरफा संवाद का आधुनिक रूप है. भारत में इतने लंबे समय तक नियमित चलने वाला ऐसा कार्यक्रम नया है.
अनाम लोगों की कहानी सुनाते हैं पीएम मोदी
एक और वजह है सकारात्मकता. आजकल खबरों में अक्सर नकारात्मक बातें छाई रहती हैं. 'मन की बात' में देश के अच्छे काम, गुमनाम नायक और छोटी-बड़ी सफलताओं की चर्चा होती है. इससे लोगों के मन में आशा बढ़ती है. कई श्रोता कहते हैं कि सुनने के बाद स्वेच्छा से कुछ अच्छा करने का मन होता है. स्वयंसेवा की भावना बढ़ी है. गांव में स्वच्छता, पेड़ लगाना, बेटी की पढ़ाई जैसे कामों में लोग आगे आए.
युवा भी इसे सुनते हैं. कई सर्वे बताते हैं कि युवा यूट्यूब पर इसे देखते हैं. उन्हें देश की जानकारी और प्रधानमंत्री का नजरिया जानने में दिलचस्पी होती है. शिक्षा जैसे विषय सबसे प्रभावशाली माने गए. कार्यक्रम कई भाषाओं और बोलियों में अनुवाद होकर पहुंचता है. इससे भाषा की दीवार टूटती है. दक्षिण हो या पूर्वोत्तर, हर क्षेत्र का श्रोता अपनी भाषा में सुन सकता है. कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ प्रचार है. लेकिन इतने साल लगातार चलना और इतने लोगों तक पहुंचना आसान नहीं है. अगर लोग न सुनते तो यह इतना लंबा न चलता. रेडियो की लोकप्रियता भी इससे बढ़ी. कई लोग बताते हैं कि 'मन की बात' की वजह से वे फिर से रेडियो सुनने लगे हैं.
गंभीर जी कहते हैं कि 12 साल बाद भी हर महीने लोग इसका इंतजार करते हैं. कोई नया उदाहरण होगा, कोई नई पहल होगी. यह इंतजार ही आत्मीयता है. देश सुनता है क्योंकि उसे लगता है कि उसकी बात भी कहीं न कहीं सुनी जा रही है. 'मन की बात' इसलिए सिर्फ प्रधानमंत्री की बात नहीं रह गई. यह देश के 'मन की बात' बन गई है. लोग इसे इसलिए सुनते हैं क्योंकि इसमें उन्हें अपना देश, अपने लोग और अपनी उम्मीद दिखाई देती है. सरल भाषा, सच्ची कहानियां और सीधा संवाद ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. जब बात दिल से निकलती है तो दिल तक पहुंचती है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)