प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और शासन के 25 साल पूरे होने जा रहे हैं. यह मौका उनके राजनीतिक सफर और उन बड़े बदलावों को समझने का है, जो आज के भारत को प्रभावित कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा शायद 76 नहीं, बल्कि 2047 है.
मोदी का 'विकसित भारत' का विचार केवल मौजूदा सरकार या चुनावी कार्यकाल तक सीमित नहीं है. इसका लक्ष्य 2047 में आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखना है, जो आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से सुरक्षित, रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर और अपनी संस्कृति को लेकर आत्मविश्वासी हो. एक ऐसा भारत, जो 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक ताकत को देश की प्रगति में बदल सके.
कतार के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे विकास
मोदी सरकार की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं का दायरा काफी बढ़ा है. 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज योजना का लाभ मिल रहा है. सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के आधार पर जारी जानकारी के मुताबिक, सामाजिक सुरक्षा का दायरा 2015 में आबादी के 19 फीसद से बढ़कर 2025 में 64.3 फीसद हो गया. इसका मतलब यह हुआ कि 94 करोड़ से ज्यादा लोगों को कम से कम एक सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहा है.
वित्तीय समावेशन, शौचालय, घर, पीने का साफ पानी, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी सहायता को सीधे बैंक खातों में पहुंचाने जैसी योजनाओं का उद्देश्य भी आम नागरिक तक सरकारी मदद को सीधे पहुंचाना रहा है. सरकार के मुताबिक इन प्रयासों से 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिली है. मोदी सरकार की इन योजनाओं के पीछे एक महत्वपूर्ण सोच है, भारत तब तक विकसित देश नहीं बन सकता, जब तक समाज के सबसे कमजोर लोगों को विकास की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा.
140 करोड़ लोगों की ताकत
पीएम मोदी का भारत को लेकर भरोसा देश के 140 करोड़ नागरिकों की क्षमता पर आधारित है.भारत पिछले छह सालों से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था रहा है. इसी दौरान देश में 2.3 लाख से ज्यादा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हुआ है. उदाहरण के रूप में स्काईरूट एयरोस्पेस जैसी कंपनी भारत के युवाओं की क्षमता को दिखाती है. इस कंपनी ने भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट बनाया और लांच किया.
हाईवे और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप तक, भारत की आर्थिक प्रगति का मूल उद्देश्य देश के 140 करोड़ लोगों की क्षमता और प्रतिभा को अधिक से अधिक अवसर देना है.
रक्षा में आत्मनिर्भरता बनता भारत
रक्षा क्षेत्र भारत के बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि 2014-15 में यह 46,429 करोड़ रुपये था.इसी तरह रक्षा निर्यात भी 2013-14 के केवल 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब भारत में इस्तेमाल होने वाले करीब 65 फीसद रक्षा उपकरण देश में ही बनाए जा रहे हैं. पहले स्थिति इसके उलट थी और 65-70 फीसद रक्षा उपकरणों का आयात किया जाता था.
भारत जैसे बड़े देश के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं है. यह देश की रणनीतिक स्वतंत्रता और सुरक्षा का आधार भी है.
पिछले 12 सालों में हुए बदलावों को केवल अर्थव्यवस्था और सरकारी योजनाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता. इस दौरान भारत का अपनी सभ्यतागत विरासत के साथ संबंध भी बदला है. जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा इस सांस्कृतिक बदलाव का एक बड़ा प्रतीक बनी. सदियों पुरानी एक आकांक्षा पूरी हुई. यह केवल मंदिर के निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि इससे देश में बड़े स्तर पर भावनात्मक जुड़ाव भी देखने को मिला.
आर्थिक के साथ सांस्कृतिक विकास
इसी तरह काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन का महाकाल लोक और भारत के प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों पर बढ़ा ध्यान एक बड़े सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर इशारा करता है. कई दशकों तक यह माना जाता रहा कि आधुनिक बनने के लिए भारत को अपनी परंपराओं से दूरी बनानी होगी. मोदी सरकार के सालों में इसके बजाय एक अलग सोच सामने रखी गई है, भारत अपनी सभ्यता और परंपराओं से जुड़े रहते हुए भी 21वीं सदी में नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है.
विकास और विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. तकनीक और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं. दुनिया में बड़ी भूमिका निभाने के लिए अपनी संस्कृति को लेकर संकोच करना जरूरी नहीं है. भारत का अपनी सभ्यता को लेकर बढ़ा यह आत्मविश्वास मोदी युग की सबसे लंबे समय तक रहने वाली विशेषताओं में से एक हो सकता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का छवि
भारत का बढ़ता आत्मविश्वास उसकी विदेश नीति में भी दिखाई देता है. भारत आज अमेरिका और क्वाड के साथ करीबी सहयोग करता है. रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को बनाए हुए है. यूरोप और मध्य-पूर्व के देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है. भारत ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका निभाता है और ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज को भी मजबूत करने की कोशिश करता है. प्रधानमंत्री मोदी को अब तक 30 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं. इनमें कई देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी शामिल हैं.
इस नीति का मूल विचार है, सबके साथ संबंध, लेकिन किसी एक देश पर निर्भरता नहीं. भारत की बढ़ती आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षमता इस रणनीतिक स्वतंत्रता का आधार तैयार कर रही है.
विकसित भारत के लिए मजबूत नींव
यहीं से बात फिर 2047 पर लौटती है. कोई भी प्रधानमंत्री या सरकार अकेले विकसित भारत का निर्माण नहीं कर सकती. मैन्युफैक्चरिंग की मजबूत व्यवस्था तैयार होने में दशकों लगते हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर का असर कई पीढ़ियों तक रहता है. लोगों की शिक्षा और कौशल में निवेश का फायदा धीरे-धीरे मिलता है. संस्थाएं सरकारों से ज्यादा लंबे समय तक चलती हैं.इसलिए किसी नेतृत्व को इस बात से भी समझना चाहिए कि उसने आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी नींव तैयार की.
76 साल की उम्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर को इसी नजरिए से देखा जा सकता है, गरीब और कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा, महत्वाकांक्षी लोगों के लिए आर्थिक अवसर, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता, दुनिया के साथ दोस्ताना संबंध, भारतीय सभ्यता में विश्वास और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति पर भरोसा.
उनका मुख्य प्रयास यह सुनिश्चित करना रहा है कि जब भारत 2047 में अपनी आजादी की 100वीं वर्षगांठ मनाए, तब वह केवल उम्रदराज गणराज्य न हो, बल्कि एक मजबूत, आत्मनिर्भर, अपनी संस्कृति को लेकर आत्मविश्वासी और विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खड़ा हो.
(डिस्क्लेमर: लेखक बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह-संयोजक और राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)