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This Article is From Aug 02, 2025

नई पीढ़ी के जीवन से गायब होता पुराना संगीत

माधवी मिश्र
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 02, 2025 00:36 am IST
    • Published On अगस्त 02, 2025 00:34 am IST
    • Last Updated On अगस्त 02, 2025 00:36 am IST
नई पीढ़ी के जीवन से गायब होता पुराना संगीत

बारिश की किसी उदास दोपहर में ख़याल या सवाल आता है कि क्या हम सभी लोग किसी भी अनुभूति को एक समान तीव्रता से महसूस कर पाते हैं, जब मन व्यथित हो, व्याकुल हो तो क्या एक ही तरह से समझाते हैं, क्या सभी के कानों में वही नगमें गूंजते होंगे जिनसे हमारा हर पल गुंजित होता आया है, कौन सा है वो स्वरित्र जिसके कारण वही अनुनाद दूर कहीं बैठे किसी लिखने वाले के मन में उसी तीव्रता, उसी संवेदना से जागृत हुआ होगा और फिर रचा गया होगा, वह गीत, वह मास्टरपीस जो हमें कई सदियों तक भाव विह्वल करता रहेगा. क्या उनका मन भी उसी राग विराग अनुराग में डूबता उतराता होगा? क्या उन्होंने भी अपनी जिंदगी से सवाल किया होगा- मैं कोई पत्थर नहीं इंसान हूं, कैसे कह दूं ग़म से घबराता नहीं….क्या दर्द की उस उच्चतम अवस्था में आपने भी यही सोचा … .दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं,याद इतना भी कोई ना आए ….क्या आपने भी महसूस किया कि बड़ी सूनी सूनी है ज़िंदगी ये ज़िंदगी …या मुझे ले चलो आज उस गली में….माधुर्य और भावों के ये रंग हमारी ज़िंदगी में इस क़दर घुल चुके हैं और अपनी पूरी शिद्दत से स्वीकार्य भी हैं. आज हम देखते हैं कि कैसे किसी गाने की एक लाइन उस गीत को विशिष्टतम की श्रेणी में पहुंचा देती है…कैसे और क्यों इतनी बड़ी दुनिया में दो लोग एक दूसरे से नितांत अंजान हैं पर बिलकुल एक तरह से सोच रहे हैं. योगेश जब लिखते हैं- कहां तक ये मन को अंधेरे छलेंगे उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे…तो लगता है ऐसा ही तो मैं भी सोच रही थी, बस अभी अभी. मुझे लगता है गीतों में उदासी,अकेलापन और संवेदनाओं के ये सिलसिले कभी ख़त्म ना हों मैं लगातार उन्हें सुनती ही रहूं, अपने उर में बसा लूं ऐसे सहेज लूं कि वो मुझसे कभी ना बिछड़ें मृत्यु पर्यन्त.

ज़िंदगी में रस, छन्द, अलंकार

इस संदर्भ में ऐसे विद्वान और गुणी जनों का ज़िक्र लाज़मी है जिन्होंने उन्ही चंद शब्दों, रसों और अलंकारों का प्रयोग किया जो नितांत परिचित थे पर उनकी कल्पनाशक्ति बेजोड़ थी उन्होंने मानव मन की कमजोरियों, विकारों, भावों और भावनाओं का जो ताना बाना बुना, जो इंद्र जाल रचा उसके सम्मोहन से, मायाजाल से हम कभी मुक्त नहीं हो पाए या यूं कहें कोशिश भी नहीं की यही तो है- Willing Suspension of Disbelief.

ये गीत हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर समाहित हैं मानो उन्हीं से हमारा अस्तित्व निर्धारित है. बीते दिनों अपनी एक अजीज़ को एक दुर्घटना में खो दिया और जगजीत सिंह बरबस ही दिल दिमाग़ पर छाए रहे और सुनाई देते रहे..एक आह भरी होगी हमने न सुनी होगी, जाते जाते तुमने आवाज़ तो दी होगी… क्या आपने भी ऐसा नहीं महसूस किया किसी के अपने जीवन से सदा के लिए चले जाने पर.. कभी ये भी सोचा कि मंजिल कहां है.. बड़े से जहां में तेरा घर कहां है..

एआई के जमाने में फिल्मी गाने

ये समय है उच्छृंखलताओं का,अतिश्योक्ति की खोखली संवेदनाओं का. ना वो दिल रहे न वो दुनियादारी न दिलों के रिश्ते रहे और ना निभाने की समझदारी अब सब कुछ AI प्रदत्त है, ठगिनी माया है, जहां एक पल ब्रेकअप्स है अगले ही पल Move ons है, पर कहीं नहीं है वो ख़याल- कल तड़पना पड़े याद में जिनकी रोक लो रूठ कर उनको जाने ना दो, बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम वो फिर नहीं आते… या फिर- कहीं किसी रोज़ यूं भी होता हमारी हालत तुम्हारी होती…जो रात हमने गुज़ारी मरके वो रात तुमने गुज़ारी होती…

दोष इनका भी नहीं है कहीं न कहीं हमने ही इन्हें ये राह दिखाई है, जो समृद्ध विरासत हमें मिली संगीत की, साहित्य की, मूल्यों की, वो इन्हें सौंपने में हम चूक गए हमने इन्हें ज्यादा प्रैक्टिकल बनाया ग्लोबलाइजेशन की होड़ में हम इन्हें 
झोंकते चले गए पर इस आपाधापी में मन कहीं पीछे छूटता गया, जिम जाने वाले युवा भावनाओं में कमजोर होते चले गए. हमने इन्हें विकृति सौंपी, प्रदूषण सौंपा, हमने इन्हें साहिर से नहीं मिलवाया जो इन्हें सिखा पाते कि ग़म और ख़ुशी में फ़र्क ना महसूस हो जहां मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया या फिर मन रे तू काहे ना धीर धरे….

बादल बिजली चंदन पानी जैसा प्यार

हमने उन्हें वैश्विक भाषाएं सीखने के अवसर दिए पायथन,जावा और zenzi सिखाया पर हम उन्हे मजरूह, साहिर, गुलज़ार, शैलेंद्र और नीरज के गीतों के अद्भुत रंगों से नहीं मिलवा पाए उन अद्भुत रूपकों और मानकों से नहीं मिलवा सके जो उन्हें यह बताता कि उफक पर खड़ी होती है सहर, धनक का भी झूला होता है, बादल बिजली चंदन पानी जैसा प्यार होता है और रातें दसों दिशाओं से प्यार की कहानियां सुनाती हैं, जहां प्यार को महकती आंखों की ख़ुशबू से देखा जा सकता है. सिर्फ़ प्यार नहीं इनकार की अवस्था में भी मन ये गा सकता है कि तुम्हें अपना कहने की चाह में कभी हो सके ना किसी के हम, यही दर्द मेरे जिगर में है मुझे मार डालेगा बस ये ग़म या फिर जहाने-दिल पे हुकूमत तुम्हें मुबारक हो …रही शिकस्त तो वो मैं अपने नाम कर लूंगा या फिर मैं जानता हूं कि तू ग़ैर है मगर यूं ही…

कितना कुछ खो दिया है हमने बहुत कुछ पाया भी है पर दिल उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता है सिर्फ़ समझौता कर पाता है और हम जैसे 70 के दशक वालों के सामने तो भावनाओं से भरे मन लिए विवश खड़े रहना ही शेष है.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): लेखिका संगीत मर्मज्ञ हैं. वो उज्जैन के दिल्ली पब्लिक स्कूल की डायरेक्टर हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.
 

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