महुआ मतलब सस्ती शराब.शहरों में तो इसका यही मतलब है. आदिवासियों के लिए यह पेड़ कल्पवृक्ष की तरह है, जिससे भोजन और तेल के साथ शराब भी बनती है. जिसका उपयोग हर पूजा की शुरुआत में शुद्धिकरण के लिए भी किया जाता है. आदिवासी अपने मेहमान का स्वागत भी अक्सर महुए की शराब से करते हैं.
अंग्रेजों के इस देश में आने के साथ जंगल के साथ साथ महुआ पर भी बुरी नज़र पड़ी थी. अंग्रेजों को जल्दी यह समझ आ गया था कि अगर महुए की शराब शहरों में लोकप्रिय हो गई तो उनके व्हिस्की और स्कॉच आदि की बिक्री कम हो जाएगी. इस वजह से उन्होंने महुआ बीनने और महुए की शराब बनाने पर पाबंदी लगा दी थी.
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गांधी जी ने क्यों किया था दांडी मार्च
नमक पर ऐसे ही प्रतिबंध के कारण गांधी ने नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च किया था. पर आदिवासियों को उनका गांधी आज तक नहीं मिला है. यद्यपि नमक क़ानून को नेहरू ने तब बदला जब देश आज़ाद हुआ. यह अलग कहानी है कि नेहरू ने 1953 में फिर से नमक पर टैक्स लगा दिया था, जो 2017 में हटा.
अथर्ववेद में महुए का ज़िक्र आता है. आयुर्वेद से जुड़े तमाम ग्रंथों में भी इसका जिक्र है.आदिवासी नेता अरविंद नेताम के मुताबिक जब वो केंद्रीय मंत्री थे तो उन्होंने इंदिरा गांधी से कहकर क़ानून में यह परिवर्तन करवाया था कि आदिवासी अपने उपयोग के लिए महुए की शराब बना सकता है. लेकिन उसे बेचना अभी भी ग़ैर क़ानूनी है.
महुआ मध्य भारत के 12-13 प्रदेशों में पाया जाता है. इसका बड़ा इलाक़ा 31 मार्च 2026 को 'आज़ाद' हुआ है तो अब यह देखना है कि क्या इस नई 'आज़ादी' के साथ महुआ भी 'आज़ाद' होगा? जिस तरह पूरे देश के लिए नमक महत्वपूर्ण था और इसलिए ही गांधी ने उसे चुना था, महुआ भी आदिवासी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है.
महुआ की ब्रांडिंग
आबकारी विभाग आजकल अधिकतर प्रदेशों के लिए आय का मुख्य स्रोत है. यह ट्राइबल इकोनॉमी को भी बदल सकता है. गांधी शराब को पसंद नहीं करते थे, इसलिए आज भी गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में शराब पर पाबंदी है. लेकिन ट्राइबल इकोनॉमी को बदलने के लिए शराब को गांधी के सर्वोदय और कोऑपरेटिव के विचारों से जोड़ना होगा.
बस्तर जैसी जगहों में महुआ बनाम माइनिंग की तीखी बहस रही है. लेकिन महुए की शराब भी अगर केंद्रीयकृत रूप से बनाई जाएगी तो उसका लाभ भी पूजीपतियों या सरकार तक ही जाएगा, जैसा आज माइनिंग में होता है. मध्य प्रदेश में सरकार ने कुछ साल पहले आदिवासी स्व सहायता समूहों को महुए की शराब बनाने की अनुमति दी थी. लेकिन इकोनॉमी तब ही बदलेगी जब वह शराब बिकेगी और लाभ का पैसा लोगों के पास पहुंचेगा. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की पिछली सरकार ने एक कंपनी के साथ महुए की शराब बनाने का एमओयू साइन किया था. सरकार बदलने के बाद स्थानीय लोगों के विरोध के कारण वह फ़ैक्टरी आज तक नहीं खुल पाई है.
मध्य प्रदेश में आदिवासी स्व सहायता समूह के साथ महुए की शराब बनाने का प्रयोग क्यों सफल नहीं हुआ, इसे समझने की ज़रूरत है. लोग कहते हैं दूध बेचना कठिन है पर शराब के लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं है. पर मध्य प्रदेश में शराब बेचने का प्रयोग लगभग असफल हुआ और गुजरात में दूध बेचने का अमूल का सहकारिता का प्रयोग सफल.
मध्य प्रदेश के लिए पहला कारण यह बताया जाता है कि सरकार ने महुए की शराब बेचने के लिए मार्केटिंग में अधिक निवेश नहीं किया. एयरपोर्ट और पांच सितारा होटलों के अलावा सामान्य दुकानों में महुए की शराब नहीं दिखती. इसके अलावा भी दिक़्क़तें होंगी, जिनकी समझ बनाए जाने की ज़रूरत है.
पेरिस में भी बिकती है महुआ से बनी शराब
राहुल श्रीवास्तव पेरिस में रहते हैं. वो वहां महुए की शराब बनाकर बेचते हैं. वो कहते हैं, ''भारत में महुए को लेकर क़ानून और टैक्स इतने अवास्तविक हैं कि सुनने में ज़रूर अजीब लगे पर फ़्रांस में महुए की शराब बनाना भारत से सस्ता पड़ता है.'' उनका कहना है,''महुआ भारत का राष्ट्रीय पेय बन सकता है.हमें यूरोप और अमेरिका में बाज़ार की तलाश करनी चाहिए.''
देश में आबकारी राज्य का विषय है. मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों ने इस दिशा में क़ानून बदले हैं. डेसमंड नैज़रेथ आंध्र में महुए की शराब बनाकर उसे गोवा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में बेचते हैं. उनका कहना है कि रूस के वोदका, मैक्सिको के टकीला और स्कॉटलैंड की स्कॉच की ही तरह महुआ भारत का राष्ट्रीय पेय हो सकता है.इस पर काम करना चाहिए.''
छत्तीसगढ़ में एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक राज्य में शराब की दुकानें सरकार के नियंत्रण में हैं, उनके माध्यम से महुआ की शराब बेची जा सकती है. यहां मध्य प्रदेश जैसी दिक़्क़त नहीं होगी. लेकिन मध्य प्रदेश की ही तरह यहां के महुआ शराब को और प्रदेशों में बेचने के लिए उन प्रदेशों के साथ अलग-अलग करार करना पड़ेगा.
महुआ और इकोनॉमी
इसलिए क़ानून प्रदेशों के साथ-साथ देश में भी बदलने की ज़रूरत है. सबसे पहले महुए की शराब के लिए जीआई टैगिंग और पेटेंट की व्यवस्था करनी चाहिए. इसे पूरे देश में हैरिटेज शराब की मान्यता मिले, जिससे स्थानीय के साथ पूरे देश में महुआ शराब बेचना सुगम हो सके और शुरू में इसे टैक्स में छूट भी दी जानी चाहिए.
मध्य प्रदेश में महुए के स्वाद को लेकर भी कुछ दिक़्क़तें हुई थी, उस ओर भी पहले से ही ध्यान देना होगा.आदिवासी आज 30-40 रुपये प्रति किलो के भाव से महुआ बेचता है. लेकिन गुजरात के अमूल प्रयोग की तरह यदि वह महुए के फूल की जगह शराब बनाकर अबूझमाड़ महुआ यूनियन लिमिटेड (अमूल) या बी(बस्तर)मूल को बेचे तो उसकी आमदनी कई गुना बढ़नी चाहिए. गुजरात में अमूल के प्रयोग को वल्लभ भाई पटेल जैसे नेताओं के साथ कुरियन जैसे मैनेजरों का नेतृत्व मिला था. अमूल और बीमूल जैसे प्रयोगों को भी मार्केटिंग, ब्रांडिंग और क्वालिटी कंट्रोल आदि के आधुनिकतम टैलेंटों की ज़रूरत होगी. सरकार को शुरू में यह सब सुनिश्चित करना होगा, जब तक कि ये प्रयोग अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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