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रिकॉर्ड 281 चुनाव लड़ने वाले ‘धरतीपकड़’ का निधन; इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक को दी थी चुनावी चुनौती

भागलपुर के चर्चित समाजसेवी और देशभर में ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर नागरमल बाजोरिया का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया. 281 चुनाव लड़ने के बावजूद वे कभी चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी लगातार भागीदारी ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई.

रिकॉर्ड 281 चुनाव लड़ने वाले ‘धरतीपकड़’ का निधन; इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक को दी थी चुनावी चुनौती
281 चुनाव लड़ने वाले ‘धरतीपकड़’ नागरमल बाजोरिया का 96 वर्ष की उम्र में निधन
भागलपुर:

बिहार के भागलपुर में लोकतंत्र के अनोखे चेहरे और ‘धरती पकड़' के नाम से प्रसिद्ध नागरमल बाजोरिया का गुरुवार को 96 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. सुजागंज मुख्य बाजार के निवासी बजोरिया पिछले कई दशकों से चुनाव लड़ने के लिए देशभर में चर्चित रहे. उन्होंने 281 चुनाव लड़े, लेकिन एक भी चुनाव नहीं जीते. इसके बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी अटूट आस्था और सामाजिक मुद्दों को उठाने की उनकी शैली ने उन्हें खास पहचान दिलाई. भागलपुर के लोगों के बीच वह केवल चुनावी उम्मीदवार नहीं, बल्कि समाजसेवा और जनजागरण का प्रतीक माने जाते थे.

281 चुनाव लड़े, लेकिन कभी नहीं मिली जीत

नागरमल बाजोरिया का नाम भारतीय चुनावी इतिहास के सबसे अनोखे उम्मीदवारों में गिना जाता है. उन्होंने अपने जीवन में कुल 281 चुनाव लड़े, लेकिन कभी जीत हासिल नहीं कर सके. चुनाव में हार को लेकर उनका एक मशहूर कथन था, 'मैं चुनाव नहीं हारता, जनता हार जाती है.' यही वाक्य उन्हें आम उम्मीदवारों से अलग बनाता था. उनका चुनावी सफर नगर निगम के चुनावों से शुरू होकर लोकसभा चुनावों और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचा. वे कई बड़े नेताओं के खिलाफ भी मैदान में उतर चुके थे.

इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक को दी चुनौती

बजोरिया ने अपने राजनीतिक जीवन में कई दिग्गज नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा. इनमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नाम शामिल हैं. उनकी पहली बड़ी चुनावी चुनौती वर्ष 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. गिरि के खिलाफ रही. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए भी कई बार नामांकन किया. बताया जाता है कि उन्होंने इन दोनों पदों के लिए कुल 18 बार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाई. उनका अंतिम और 281वां चुनाव वर्ष 2019 में था.

लाहौर से भागलपुर तक का सफर

अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मे नागरमल बाजोरिया 1930 के दशक में भागलपुर आ गए थे. यहां उन्होंने सुजागंज बाजार में अपना कारोबार स्थापित किया और धीरे-धीरे सामाजिक कार्यों से जुड़ गए.

समाजसेवा को बनाया जीवन का मिशन

नागरमल बाजोरिया केवल चुनाव लड़ने के लिए ही नहीं जाने जाते थे. उन्होंने गरीब परिवारों की बेटियों के सामूहिक विवाह कराए और दहेज रहित विवाह को बढ़ावा दिया. इसके अलावा जहां पेयजल की समस्या थी, वहां ट्यूबवेल लगाने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. सामाजिक सरोकारों से जुड़े इन कार्यों के कारण उन्हें स्थानीय स्तर पर काफी सम्मान मिलता था.

लोकतंत्र में भागीदारी को मानते थे सबसे बड़ी जीत

बजोरिया के लिए चुनाव जीतना कभी प्राथमिक उद्देश्य नहीं था. उनका मानना था कि चुनाव लोकतंत्र में लोगों को जागरूक करने और सामाजिक तथा राष्ट्रीय मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने का माध्यम हैं. TOI की रिपोर्ट के अनुसार उनके पौत्र गौरव बजोरिया ने कहा कि उनके दादा देश से बेहद प्रेम करते थे और समर्पित समाजसेवी थे. उन्होंने कहा कि भले ही उन्हें चुनावी जीत नहीं मिली, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी निरंतर भागीदारी, व्यवस्था को चुनौती देने का साहस और कभी हार न मानने वाला दृष्टिकोण हमेशा लोगों की यादों में जिंदा रहेगा. शुक्रवार को भागलपुर के बरारी घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. उनके निधन से भागलपुर ने एक ऐसे शख्स को खो दिया, जिसने लोकतंत्र को केवल वोट की राजनीति नहीं, बल्कि जनजागरण का माध्यम माना.

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