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इन्फ्लुएंसर के सिर से उतरा पहाड़ों पर जिंदगी बिताने का भूत, मनाली से दिल्ली आकर बोली- 2 बातों ने फंसा दिया

दिल्ली की भागदौड़ से तंग आकर ट्रैवल इन्फ्लुएंसर श्वेता ने मनाली में घर तो बसा लिया, लेकिन वहां की जमीनी हकीकत ने उनका यह सपना तोड़ दिया. बिजली कटौती, कमजोर इंटरनेट और खराब कनेक्टिविटी के कारण काम प्रभावित होने पर उन्हें भारी मन से वापस दिल्ली लौटना पड़ा.

इन्फ्लुएंसर के सिर से उतरा पहाड़ों पर जिंदगी बिताने का भूत, मनाली से दिल्ली आकर बोली- 2 बातों ने फंसा दिया
इन्फ्लुएंसर श्वेता ने बताई मनाली की ये कड़वी सच्चाई.
insta@wittyspace2

VIRAL VIDEO: मनाली की वादियों में बसने का सपना कैसे हकीकत की जमीन पर आकर टूट जाता है, इसका एक आंखें खोलने वाला अनुभव सामने आया है. ट्रैवल इन्फ्लुएंसर श्वेता (wittySpace) ने महंगे किराए और दिल्ली की भागदौड़ से तंग आकर महज पांच हजार रुपए में मनाली में आशियाना तो बसा लिया, लेकिन पहाड़ों का यह सफर आसान नहीं रहा. शुरुआती सुकून के बाद जब काम के सिलसिले में यात्राएं शुरू हुईं, तब कनेक्टिविटी, बिजली-इंटरनेट की कमी और सुदूर इलाके से लगातार सफर करने की दिक्कतों ने हकीकत का अहसास कराया. आखिरकार बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते उन्हें वापस दिल्ली लौटना पड़ा. यह वाकया सोशल मीडिया के भ्रम और पहाड़ों की जमीनी कठिनाइयों के बीच के बड़े अंतर को साफ उजागर करता है.

दिल्ली छोड़ मनाली का रुख किया, पहली नजर में हुआ प्यार

दिल्ली की भागदौड़ और महंगे किराए से तंग आकर इस ट्रैवलर ने मनाली की शांत वादियों में आशियाना तलाशने का फैसला किया. मनाली पहुंचकर जान-पहचान वालों की मदद से उन्हें एक कमरा मिल गया. ट्रैवलर बताती हैं कि जब उन्होंने कमरे में कदम रखा, तो खिड़की से आती सूरज की नारंगी किरणें और सामने लहराते पेड़ देखकर वे इस कदर मंत्रमुग्ध हो गईं कि बिना सोचे-समझे तुरंत एडवांस पेमेंट कर दी. ऐसा लगा मानो किसी रोमांटिक फिल्म का सीन चल रहा हो.  

शुरू हुआ मुश्किलों का सफर

पहाड़ों पर शिफ्ट होने का फैसला तो ले लिया, लेकिन सफर आसान नहीं था. दिल्ली की तरह वहां ऑनलाइन पैकर्स एंड मूवर्स ऐप्स काम नहीं करती थीं. आखिरकार एक मददगार ड्राइवर की बदौलत करीब 16-17 घंटे का सफर तय कर वे मनाली पहुंचीं और इत्तेफाक देखिए कि उसी दिन वहां भारी बर्फबारी भी शुरू हो गई.

शुरुआती दिन: किसी हसीन ख्वाब जैसे

मनाली में जिंदगी की शुरुआत बेहद खूबसूरत रही. सबसे बड़ा फायदा यह था कि जहां दिल्ली में अकेले का किराया 18 हजार रुपये था, वहीं मनाली में महज 5,000 रुपये में घर मिल गया. सुबह अलार्म की जगह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुलती थी. मोबाइल फोन की लत छूट गई और किताबों से दोस्ती हो गई. नल का शुद्ध पानी पीना और पेड़ों पर लदे ताजे फल देखना किसी वरदान से कम नहीं लग रहा था.

हकीकत से सामना: क्यों तोड़ना पड़ा पहाड़ों से नाता?

हसीन वादियों का यह खुमार तब टूटा जब काम के सिलसिले में देश-विदेश की यात्राएं शुरू हुईं. ट्रैवलर के मुताबिक, पहाड़ों पर कनेक्टिविटी की भारी समस्या थी. बिजली का बार-बार जाना, कमजोर इंटरनेट नेटवर्क और कचरे के निपटारे की लचर व्यवस्था बड़ी मुसीबत बन गए. चूंकि उनका काम 'wittySpace' तेजी से बढ़ रहा था, इसलिए पहाड़ों के इस बेहद सुदूर इलाके से लगातार सफर करना मुमकिन नहीं हो पा रहा था. आखिरकार उन्होंने भारी मन से वापस मैदानी इलाके यानी दिल्ली लौटने का फैसला किया.  

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पहाड़ों के शौकीनों के लिए जरूरी सीख

ट्रैवलर ने पहाड़ों में बसने की चाहत रखने वालों को दो बेहद जरूरी बातें सोचने की सलाह दी है. क्या सुदूर पहाड़ों पर जाने के बाद भी आपकी कमाई और काम का तरीका वैसे ही बना रहेगा? गहराई से सोचें कि आपको सच में पहाड़ों में उम्र बितानी है या सिर्फ 10-15 दिनों की छुट्टी मनाकर भी आपका मन भर जाएगा? पहाड़ घूमने के लिए जितने खूबसूरत हैं, जिंदगी गुजारने के लिए उतने ही कठिन.

लोग बोले- हर किसी के बस की बात नहीं पहाड़ों का जीवन

इस वीडियो पर दर्शकों ने दिल खोलकर अपनी राय रखी है, जो मुख्य रूप से सोशल मीडिया के भ्रम और पहाड़ों की जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करती है. जहां एक तरफ shubhangi_chauhan_ कहती हैं कि इंटरनेट पर हर किसी को बाली, गोवा या हिमाचल शिफ्ट होते देख दर्शक 'फोमो' (छूट जाने का डर) का शिकार हो रहे हैं, वहीं latashabhandari14 इस सच्चाई को उजागर करती हैं कि सैलानियों के लिए हफ्ता-दस दिन बिताना आसान है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए बुनियादी सुविधाओं, रोजगार और जेप्टो-ब्लिंकिट जैसी होम डिलीवरी के बिना जीवन बेहद कठिन है. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड के स्थानीय निवासी manav.parmar.12 अपना बचपन याद करते हुए लिखते हैं कि बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद उनकी जरूरतें कम हैं, इसलिए वे वहां रह पा रहे हैं, लेकिन सुख-सुविधाओं के आदी शहरी लोगों के लिए स्कूल या बाज़ार जाने के लिए रोज़ 8 किलोमीटर पैदल चलना नामुमकिन है. अंत में, green_corner45 ने कहा, 'पहाड़ दूर से ही अच्छे लगते हैं'.

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