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LPG संकट के बीच मिसाल बना चंदौली का यह गांव, तगड़ा जुगाड़ लगाकर 125 घरों के जले रहे हैं चूल्हे

जहां शहर वाले खाली सिलेंडर थामे लंबी लाइनों में पसीने बहा रहे हैं, वहां इस गांव के लोग 'गोबर' से लजीज रोटियां सेंक रहे हैं. बीटेक पास एक छोरे ने अपनी गौशाला से ऐसी 'देसी' पाइपलाइन बिछाई कि आज पूरा गांव एलपीजी की महंगाई और किल्लत को ठेंगे पर रख रहा है.

LPG संकट के बीच मिसाल बना चंदौली का यह गांव, तगड़ा जुगाड़ लगाकर 125 घरों के जले रहे हैं चूल्हे
सिलेंडर की किल्लत और लंबी कतारों को मारो गोली! यूपी के इस गांव ने ढूंढ निकाला गजब का 'देसी' जुगाड़
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Chandauli Bio-gas plant village: दुनिया में छिड़ी जंग और एलपीजी की आसमान छूती कीमतों ने सबकी रसोई का बजट बिगाड़ रखा है, लेकिन यूपी के चंदौली जिले का एक गांव आज भी बड़े सुकून से रोटियां सेंक रहा है. जब शहर के लोग गैस सिलेंडर की लंबी लाइनों में पसीने बहा रहे हैं, तब एकौनी गांव के 125 परिवार गोबर से बनी गैस पर लजीज खाना बना रहे हैं. यकीन मानिए, ये कहानी किसी 'जुगाड़' से बढ़कर एक शानदार क्रांति है.

दुनिया के नक्शे पर भले ही रूस-यूक्रेन या इजरायल-ईरान की जंग सुर्खियां बटोर रही हो, लेकिन इसकी तपिश भारत की रसोई तक भी पहुंच चुकी है. एलपीजी की भारी किल्लत के बीच उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का नियमताबाद ब्लॉक चर्चा का केंद्र बन गया है. यहां का एक छोटा सा गांव है 'एकौनी', जहां के बाशिंदों को सिलेंडर खत्म होने का कोई डर नहीं सताता. इस गांव के करीब 150 परिवारों में से 125 घर ऐसे हैं, जिनके चूल्हे सीधे बायोगैस प्लांट से जुड़े हुए हैं. सुबह और शाम तीन-तीन घंटे की पाइपलाइन सप्लाई ने यहां की गृहणियों की जिंदगी मानों गुलजार कर दी है.

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Photo Credit: Wikimedia Commons

बीटेक वाले 'गौ रक्षक' ने पलटी गांव की किस्मत (B.Tech Graduate Turns Cow Dung into Green Fuel)

इस पूरी मुहीम के पीछे दिमाग है गांव के ही लाल चंद्र प्रकाश सिंह का. भोपाल से बीटेक करने के बाद उन्होंने नौकरी की भागदौड़ छोड़ अपने पिता की गौशाला संभालने की ठानी. जहां पहले सिर्फ 50 गायें थीं, आज वहां 200 गौमाताएं हैं. रोजाना निकलने वाले 3000 किलो गोबर का क्या किया जाए? बस यही सवाल बायोगैस प्लांट की नींव बना. साल 2022 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज गांव की लाइफलाइन बन चुका है. कंचन सिंह और अखिलेश सिंह जैसे ग्रामीण बताते हैं कि अब उन्हें न तो लाइन में लगना पड़ता है और न ही महंगे सिलेंडर का बोझ उठाना पड़ता है.

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आधे दाम में ईंधन और पर्यावरण की सुरक्षा (Eco-Friendly Fuel at Half the Market Price)

यह बायोगैस न केवल सस्ती है, बल्कि एलपीजी के मुकाबले इसकी लागत लगभग आधी आती है. आर्थिक बचत के साथ साथ यह गांव वालों को आत्मनिर्भर भी बना रही है. एकौनी गांव का यह मॉडल आज के दौर में किसी संजीवनी से कम नहीं है. चंद्र प्रकाश की इस पहल ने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो और साथ में तकनीक का तड़का लगे, तो गांव के गोबर से भी सोना (यानी सस्ता ईंधन) उगाया जा सकता है. 

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कहते हैं 'आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है', और एकौनी गांव ने इसे सच कर दिखाया. जब पूरी दुनिया ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस से जूझ रही है, तब चंदौली का यह छोटा सा गांव आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा उदाहरण पेश कर रहा है.

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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