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पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम क्‍या फिर बढ़ेंगे? तेल कंपनियों से सरकार ने खींचे हाथ,1.23 लाख करोड़ के बाद अब और मदद नहीं!

Petrol Diesel Prices Hike, LPG Rates Hikes Again Likely: देश में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम फिर बढ़ सकते हैं, ऐसी आशंका जताई जा रही है. सरकार ने साफ कहा है कि तेल कंपनियों की अब और मदद नहीं की जा सकती है. आप सोचेंगे ऐसा क्‍यों? जवाब अंदर है.

पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम क्‍या फिर बढ़ेंगे? तेल कंपनियों से सरकार ने खींचे हाथ,1.23 लाख करोड़ के बाद अब और मदद नहीं!
LPG Petrol Diesel Prices in India: देश में फिर बढद्य सकते हैं पेट्रोल, डीजल, LPG के दाम
NDTV इंडिया ग्राफिक्‍स/File Photo

Petrol Diesel LPG Prices Hike Again or Not: मध्यपूर्व एशिया (Middle East) में जारी सप्‍लाई संकट और युद्ध के बीच सरकार, जो अब तक इंडियन ऑयल, HPCL, BPCL जैसी तेल मार्केटिंग कंपनियों की बड़ी मदद कर रही थी और फंड सपोर्ट दे रही थी, अब नहीं देगी. वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, अब तक 1.23 लाख करोड़ की मदद कर चुके केंद्र ने तेल कंपनियों को फाइनेंशियल सपोर्ट आगे के लिए नहीं बढ़ाए जाने का फैसला लिया है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि तेल कंपनियां जो इतनी मदद के बावजूद हर रोज 652 करोड़ रुपये का नुकसान सह रही हैं, वो आगे पेट्रोल, डीजल और LPG के दाम बढ़ा सकती है. फिलहाल कंपनियों ने दाम बढ़ाने को लेकर ऐसा कुछ नहीं कहा है और फिलहाल केवल ऐसी 'आशंका' जताई जा रही है, लेकिन ऐसा हुआ तो आम लोगों पर महंगाई की एक और चोट से कम नहीं होगी! 

आपके हित में इस तरह मदद कर रही थी सरकार 

दरअसल, आम उपभोक्ताओं को महंगाई की मार से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया था. सरकार ने शुरुआती 78 दिनों के दौरान सरकारी तेल कंपनियों को आर्थिक राहत देने के लिए लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय सहयोग दिया. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस राहत पैकेज में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) में की गई कटौती भी शामिल थी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसमान छूती कीमतों के इस दौर में सरकार ने टैक्‍स रेवेन्‍यू छोड़कर कंपनियों के बढ़ते घाटे को थामने की कोशिश की थी.

78 दिनों का सपोर्ट खत्म: वित्त मंत्रालय ने क्‍यों खींचे हाथ?

हालांकि, 78 दिनों तक तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई करने के बाद अब वित्त मंत्रालय ने कड़ा रुख अपना लिया है. मंत्रालय का मानना है कि किसी एक विशेष सेक्टर को इससे ज्यादा फाइनेंशियल सपोर्ट देना व्यावहारिक और उचित नहीं होगा. यही वजह है कि सरकार ने अब तेल कंपनियों को और वित्तीय सहायता देने से साफ इनकार कर दिया है.

सूत्रों के अनुसार, इसी फैसले के बाद सरकार ने तय किया कि कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के बोझ का कुछ हिस्सा अब आम उपभोक्ताओं पर ट्रांसफर करना होगा. इसी क्रम में सरकारी तेल कंपनियों ने बीते 15 मई से पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी (LPG) की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू कर दिया था.

तेल कंपनियों को हर दिन 652 करोड़ का भारी नुकसान

एक वरिष्ठ सरकारी प्रतिनिधि से मिली जानकारी के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में हुई ताबड़तोड़ बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहद चिंताजनक है. आज भी इन कंपनियों को हर दिन करीब 652 करोड़ रुपये का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

पेट्रोलियम मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले 'पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल' (PPAC) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल 2026 के दौरान भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 डॉलर प्रति बैरल और मई 2026 के दौरान 106.23 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर दर्ज की गई थी. वर्तमान में भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 93-94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जबकि वैश्विक स्तर पर एलपीजी (LPG) की कीमतें 46% से ज्यादा बढ़ चुकी हैं.

LPG पर भारी घाटा: 1,700 रुपये तक पहुंची सप्लाई लागत

रसोई गैस के मोर्चे पर आम जनता और कंपनियों दोनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. घरेलू एलपीजी के लिए 'सऊदी सीपी बेंचमार्क' (Saudi CP benchmark) में जनवरी महीने से अब तक लगभग 50% की भारी वृद्धि हो चुकी है. इस उछाल के कारण अब एक एलपीजी सिलेंडर को सप्लाई करने का खर्च बढ़कर लगभग 1,600 से 1,700 रुपये तक पहुंच गया है.

पिछले ही रविवार को तेल कंपनियों ने घरेलू रसोई गैस के दाम में 29 रुपये की बढ़ोतरी की थी, लेकिन इस बढ़ोतरी के बावजूद हर घरेलू सिलेंडर पर कंपनियों को 600 से 700 रुपये की अंडर-रिकवरी (नुकसान) झेलनी पड़ रही है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो पिछले एक साल में घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी बढ़कर 60,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो कि एक साल पहले 41,338 करोड़ रुपये थी.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट और नए रूट की चुनौती

भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल और लगभग 60% एलपीजी अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात करता है. मध्यपूर्व में युद्ध छिड़ने से पहले तक भारत के कुल तेल आयात का 40% और एलपीजी आयात का 90% हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के संकरे समुद्री मार्ग से होकर आता था. संकट के कारण इस रूट पर सप्लाई बाधित हुई है.

इस जोखिम से निपटने के लिए भारत सरकार ने तेल कंपनियों के साथ मिलकर एलपीजी के आयात स्रोतों को बड़े स्तर पर डायवर्सिफाई (diversify) किया है. अब दुनिया के नए और वैकल्पिक बाजारों से एलपीजी का स्टॉक मंगाया जा रहा है, लेकिन नए रूट और स्रोतों की वजह से माल ढुलाई और आयात का कुल खर्च काफी ज्यादा बढ़ गया है. यही कारण है कि 15 मई, 2026 के बाद से अब तक देश में चार बार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाई जा चुकी हैं.

RBI दी चुका है चेतावनी- घटेगी GDP, बढ़ेगी महंगाई

आर्थिक मोर्चे पर गहराते इस संकट को लेकर पिछले शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर ने भी देश को आगाह किया था. मोनेटरी पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करते हुए उन्होंने कहा, 'वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति लगातार खराब हो रही है. सप्लाई चेन में लंबे समय तक व्यवधान और ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों का देश की विकास दर और महंगाई दोनों पर सीधा असर पड़ने की आशंका है.'

गवर्नर के मुताबिक, पिछले दो महीनों के दौरान भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की औसत कीमत 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रही है, जिसका असर मई से खुदरा कीमतों पर दिखना शुरू हो गया है. इन विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए आरबीआई ने मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी (GDP) वृद्धि दर के अनुमान को 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है. इसके साथ ही, सीपीआई (CPI) इनफ्लेशन यानी खुदरा महंगाई दर का अनुमान भी 50 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.1% कर दिया गया है. सरकार द्वारा हाथ खींचने और कंपनियों के बढ़ते दैनिक घाटे को देखते हुए आने वाले दिनों में तेल-गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

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