दिल्ली-एनसीआर की ऊंची इमारतों और शोर-शराबे से महज 15 किलोमीटर दूर एक ऐसा गांव है, जहां की हवाओं में इतिहास और आस्था का एक अलग ही रंग घुला है. यह है ग्रेटर नोएडा का बिसरख गांव. जब पूरा देश दशहरे पर रावण के पुतले फूंक रहा होता है, तब इस गांव में सन्नाटा पसर जाता है. यहां लोग त्योहार नहीं मनाते, बल्कि शोक मनाते हैं. बिसरख के लोगों के लिए रावण कोई खलनायक नहीं, बल्कि उनके अपने 'बाबा' यानी पूर्वज हैं.
पिता विश्रवा के नाम पर पड़ा गांव का नाम
पौराणिक कहानियों के मुताबिक, बिसरख का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम पर पड़ा. पहले इसे 'विश्वेशरा' कहा जाता था, जो धीरे-धीरे बिसरख बन गया. शिवपुराण में भी इस जगह का जिक्र मिलता है. कहा जाता है कि त्रेता युग में ऋषि विश्रवा ने इसी मिट्टी पर जन्म लिया था और यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी. मंदिर के पुजारी रामदास बताते हैं कि यह स्थान ऋषि पुलस्त्य का आश्रम था. यहीं पर रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और सूपर्णखा का बचपन बीता.
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रावण दहन नहीं, यहां होती है विशेष पूजा
देशभर में जहां रावण के पुतले को आग के हवाले किया जाता है, वहीं बिसरख में लोग उसकी मौत का दुख मनाते हैं. दशहरे के दिन यहां रावण की विद्वता को याद करते हुए यज्ञशाला के सामने उसकी मूर्ति रखकर विशेष हवन और पूजा की जाती है. गांव के कृष्ण कुमार और संजीव जैसे निवासी कहते हैं कि उन्होंने बचपन से ही रावण को अपने पूर्वज के रूप में पूजते देखा है. बिसरख के प्राचीन शिव मंदिर में एक अनोखा अष्टकोणीय शिवलिंग है. मान्यता है कि रावण ने इसी शिवलिंग पर महादेव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी और अष्ट सिद्धियां पाई थीं.

गाड़ियों और दुकानों पर गर्व से लिखा है 'रावण'
बिसरख की विरासत सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है. यहां के युवा आज भी अपनी गाड़ियों, दुकानों और बिजनेस के नाम के आगे गर्व से रावण का नाम जोड़ते हैं. आपको यहां आसानी से 'रावण डीजे' या 'रावण किराना स्टोर' जैसे नाम देखने को मिल जाएंगे. युवाओं का मानना है कि रावण प्रकांड ज्ञानी और शक्तिशाली था, और यही दमदार पहचान उनके गांव की भी है. गांव में एक पुराना जर्जर महल भी है, जिसे लोग 'रावण का घर' मानते हैं. यहां की मिट्टी से आज भी पुराने जमाने के सिक्के और अवशेष मिलते रहते हैं.

अब पर्यटकों को भी खींच रही है बिसरख की मिट्टी
कभी गुमनाम सा रहने वाला यह गांव अब सोशल मीडिया और इंटरनेट की वजह से देश-दुनिया के नक्शे पर चमक रहा है. दूर-दूर से लोग इस अनोखी परंपरा को देखने आ रहे हैं. ग्रेटर नोएडा वेस्ट के गिरीश और केरल से सपरिवार आईं पीता जैसी सैलानी यहां सिर्फ यह देखने आते हैं कि आखिर वह कौन सी जगह है जो रावण को इस रूप में सहेज कर बैठी है. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व सांसद फूलन देवी और तांत्रिक चंद्रास्वामी जैसी कई बड़ी हस्तियां भी इस ऐतिहासिक धरोहर पर माथा टेकने आ चुकी हैं.
बिसरख की यह अनूठी कहानी हमें सिखाती है कि इतिहास और किरदारों को देखने का हर समाज का अपना एक अलग नजरिया होता है. जिसे दुनिया बुराई का अंत मानती है, उसे यह गांव अपने घर का बेटा मानकर आज भी याद करता है.
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