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चीन के मेडोग बांध पर भारत-बांग्लादेश-नेपाल को क्यों चेता रहा जापान

भारत के लिए, इसके तत्काल प्रभाव अरुणाचल प्रदेश और असम पर पड़ सकते हैं, जहां ब्रह्मपुत्र नदी कृषि, परिवहन, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है.

चीन के मेडोग बांध पर भारत-बांग्लादेश-नेपाल को क्यों चेता रहा जापान
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के पास चीन बांध बना रहा है.
  • मेडोग बांध परियोजना यारलुंग त्सांगपो नदी पर स्थित है और इसकी उत्पादन क्षमता लगभग साठ गीगावाट बताई गई है
  • यह परियोजना भूवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील है जहां भूकंप, भूस्खलन और ग्लेशियर जैसी आपदाओं का खतरा रहता है
  • मेडोग बांध से भारत, बांग्लादेश और नेपाल में जल प्रवाह और पर्यावरणीय स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं

तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल मेडोग बांध पर हर किसी की नजर है. मेडोग एक जलविद्युत परियोजना है. इससे चीन के पड़ोसियों खासकर तिब्बत सीमा से सटे भारत-बांग्लादेश-नेपाल की समस्याएं बढ़ना तय है. मगर, जापान भी इससे अछूता नहीं है.जापान का मानना है कि मेडोग एक बढ़ती हुई भू-राजनीतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौती पेश करता है.

लगभग 60 गीगावाट की उत्पादन क्षमता के साथ, मेडोग दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक बनने की उम्मीद है. पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में 'नामचा बरवा' पर्वत समूह के पास स्थित यह परियोजना एक ऐसे भूवैज्ञानिक रूप से जटिल इलाके में है, जहां सक्रिय फॉल्ट, खड़ी ढलानें, ग्लेशियर, भूस्खलन और नदी का तीव्र बहाव जैसी स्थितियां मौजूद हैं. यारलुंग त्सांगपो नदी भारत के अरुणाचल प्रदेश में 'सियांग' के नाम से प्रवेश करती है, ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली में मिलती है और अंततः बांग्लादेश में बहती है. इसलिए, जिसे बीजिंग एक घरेलू ऊर्जा परियोजना के रूप में पेश कर रहा है. उसके भारत, बांग्लादेश और दक्षिण एशिया में जापान के बढ़ते रणनीतिक हितों पर गंभीर सीमा-पार परिणाम हो सकते हैं.

मेडोग बांध से क्या खतरा

जापान की मुख्य चिंता केवल यह नहीं है कि क्या चीनी इंजीनियर तकनीकी रूप से उन्नत बांध बना सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या आसपास के पहाड़, ग्लेशियर, जलाशय और नदी प्रणालियां कई तरह की आपदाओं को झेल पाएंगी. बताया जाता है कि 2017 में न्यिंगची में आए भूकंप के कारण 1,800 से अधिक भूस्खलन हुए और अस्थायी झीलें बन गईं, जो यह दर्शाती हैं कि यह क्षेत्र एक के बाद एक आने वाले भूवैज्ञानिक खतरों के प्रति कितना संवेदनशील है.

मेडोग के पास आने वाला भूकंप ढलानों को अस्थिर कर सकता है, नदी के रास्ते को रोक सकता है या भारी मात्रा में पानी के बहाव का कारण बन सकता है. इटली में 1963 की 'वजोंट' आपदा ने दिखाया था कि बांध के पूरी तरह से टूटे बिना भी विनाशकारी बाढ़ आ सकती है. इन संभावनाओं को देखते हुए, स्वतंत्र भूकंपीय आकलन और पारदर्शी पर्यावरणीय निगरानी अनिवार्य हो जाती है.

जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को और बढ़ा देता है. हिमालयी ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, हिमनद झीलें फैल रही हैं, और बारिश के बदलते पैटर्न पहाड़ी जल विज्ञान को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रहे हैं. बढ़ता तापमान, अस्थिर ढलानें, भूकंपीय गतिविधियां और बड़े पैमाने पर जलविद्युत निर्माण मिलकर ऐसे जोखिम पैदा करते हैं, जिन्हें पारंपरिक इंजीनियरिंग गणनाओं के जरिए पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता.

हालांकि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मेडोग परियोजना निश्चित रूप से विफल हो जाएगी, लेकिन किसी बड़ी आपदा की संभावना को देखते हुए एहतियाती क्षेत्रीय योजना बनाना जरूरी है. इंजीनियरिंग सुरक्षा को लेकर बीजिंग के आश्वासनों की जगह स्वतंत्र और सत्यापित आकलन नहीं ले सकते, खासकर तब जब पड़ोसी देशों के पास इस परियोजना के कामकाज से जुड़ी जानकारी तक कोई खास पहुंच न हो.

भारत पर मेडोग का क्या प्रभाव

जापान के अनुसार, भारत के लिए, इसके तत्काल प्रभाव अरुणाचल प्रदेश और असम पर पड़ सकते हैं, जहां ब्रह्मपुत्र नदी कृषि, परिवहन, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है. नदी के बहाव में अचानक आने वाला बदलाव बस्तियों, पुलों, सड़कों, सिंचाई प्रणालियों और जलविद्युत बुनियादी ढांचे के लिए खतरा बन सकता है.

इस रणनीतिक भूगोल में अरुणाचल प्रदेश एक बेहद संवेदनशील स्थिति में है. हालांकि राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण जापान वहां सीधे तौर पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल नहीं हो सकता, लेकिन पड़ोसी पूर्वोत्तर राज्यों में बेहतर कनेक्टिविटी उस व्यापक नेटवर्क को मजबूत करती है जो अरुणाचल प्रदेश को असम, शेष भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ता है.

इन निवेशों का मूल्य केवल सड़कों और पुलों पर ही नहीं, बल्कि ब्रह्मपुत्र बेसिन की पर्यावरणीय स्थिरता पर भी निर्भर करता है. भीषण बाढ़, तलछट के बहाव में बदलाव या लंबे समय तक जल-प्रणाली में व्यवधान आने से परिवहन गलियारों को नुकसान पहुंच सकता है, रखरखाव की लागत बढ़ सकती है, व्यापार में रुकावट आ सकती है और निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है.

बांग्लादेश-नेपाल की परेशानी

इस प्रयास में बांग्लादेश को भी शामिल किया जाना चाहिए. वहां जापान के लंबे समय से विकास संबंधी हित रहे हैं, जिनमें परिवहन बुनियादी ढांचा, औद्योगिक कनेक्टिविटी और 'मातारबारी विकास पहल' शामिल हैं. ब्रह्मपुत्र-जमुना प्रणाली में हाइड्रोलॉजिकल अस्थिरता, नदी के निचले इलाकों में जापान समर्थित आर्थिक गतिविधियों के लिए खतरा बन सकती है. आपदा तैयारियों, बुनियादी ढांचे की मजबूती और वैज्ञानिक सहयोग पर केंद्रित भारत-जापान-बांग्लादेश का एक त्रिपक्षीय ढांचा, पर्यावरणीय चिंताओं को सीधे भू-राजनीतिक टकराव में बदले बिना, एक सकारात्मक समाधान दे सकता है. नेपाल में तिब्बत से ही अभी बाढ़ आई थी. अगर ये बांध बन गया तो आने वाले समय में नेपाल पर इस तरह की आपदाओं का खतरा और बढ़ जाएगा.

जापान की समस्या

'मेडोग' परियोजना जापान और भारत को रणनीतिक कनेक्टिविटी और पारिस्थितिक सुरक्षा के बीच के संबंधों पर फिर से विचार करने के लिए प्रेरित करेगी. चीन को विकास करने का पूरा अधिकार है, लेकिन जिन परियोजनाओं के सीमा-पार परिणाम हो सकते हैं, उनमें पारदर्शिता, परामर्श और भरोसेमंद सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है. बीजिंग को हाइड्रोलॉजिकल और परिचालन संबंधी जरूरी जानकारी साझा करनी चाहिए और वैज्ञानिक स्तर पर इसकी सार्थक जांच की अनुमति देनी चाहिए.

इस बीच, भारत और जापान को यह समझना होगा कि पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए उन नदी प्रणालियों की सुरक्षा करना जरूरी है, जिन पर इस क्षेत्र की समृद्धि निर्भर करती है. हिमालय में आने वाली अगली बड़ी आपदा भले ही भारत की सीमाओं के बाहर शुरू हो, लेकिन इसके परिणाम उस बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) तक पहुंच सकते हैं, जिसे टोक्यो और नई दिल्ली मिलकर तैयार कर रहे हैं.

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