- अमेरिका ने Visa Bond के लिए 5 हजार डॉलर से लेकर 15 हजार डॉलर तक की राशि तय की थी.
- FIFA World Cup के लिए अमेरिका इसी वीजा नीति को जारी रखता, तो कई देशों के फैंस स्टेडियम तक पहुंच ही नहीं पाते.
- इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता था. इसलिए अमेरिका ने इसे बदल दिया.
FIFA World Cup 2026 से पहले अमेरिका ने अपनी सख्त वीजा पॉलिसी में बड़ी राहत दी है. अब कई देशों के फुटबॉल फैंस को अमेरिका आने के लिए भारी-भरकम वीजा बॉन्ड नहीं देना पड़ेगा. लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह वीजा बॉन्ड सिस्टम क्या है. अमेरिका ने इसे लागू क्यों किया था. और अब अचानक इसमें ढील क्यों दी जा रही है. आइए समझते हैं पूरा मामला...
क्या है वीजा बॉन्ड सिस्टम?
वीजा बॉन्ड एक तरह की सिक्योरिटी डिपॉजिट है. अगर कोई व्यक्ति ऐसे देश से आता है जिसे अमेरिका हाई रिस्क मानता है, तो उससे अमेरिका आने से पहले हजारों डॉलर जमा कराने को कहा जाता है. यह रकम इस भरोसे के लिए ली जाती है कि व्यक्ति तय समय पूरा होने के बाद अमेरिका छोड़ देगा.
अगर व्यक्ति वापस लौट जाता है तो पैसा वापस कर दिया जाता है. लेकिन अगर वह अमेरिका में अवैध रूप से रुक जाता है, तो यह रकम जब्त हो सकती है.
ट्रंप प्रशासन ने इस नियम को अवैध इमिग्रेशन रोकने के लिए लागू किया था.
कितनी रकम जमा करनी पड़ती थी?
अमेरिका ने कुछ देशों के नागरिकों के लिए 5 हजार डॉलर से लेकर 15 हजार डॉलर तक की राशि तय की थी.
भारतीय रुपये में देखें तो यह रकम करीब 4 लाख रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक बैठती है.
गरीब और विकासशील देशों के आम लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम जमा कर पाना लगभग नामुमकिन माना जा रहा था.
किन देशों पर लागू था यह नियम?
करीब 50 विकासशील देशों के नागरिक इस नीति से प्रभावित थे.
इनमें कई अफ्रीकी देश शामिल थे. खास बात यह है कि इन देशों में से पांच देश FIFA World Cup 2026 के लिए क्वालिफाई भी कर चुके हैं.
इनमें शामिल हैं- अल्जीरिया, केप वर्दे, आइवरी कोस्ट, सेनेगल और ट्यूनिशिया जैसे देश. इनके फैंस के लिए अमेरिका जाकर अपनी टीम को सपोर्ट करना बेहद मुश्किल हो रहा था.

वर्ल्ड कप के कारण क्यों बदले नियम
फीफा वर्ल्ड कप दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन माना जाता है. लाखों फैंस अलग-अलग देशों से मैच देखने आते हैं.
अगर अमेरिका अपनी सख्त वीजा नीति जारी रखता, तो कई देशों के फैंस स्टेडियम तक पहुंच ही नहीं पाते. इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता था.
इसी वजह से अमेरिकी विदेश विभाग ने फैसला लिया कि जिन देशों की टीमें वर्ल्ड कप खेल रही हैं और जिन फैंस के पास मैच टिकट हैं, उन्हें वीजा बॉन्ड में राहत दी जाएगी.
इसके लिए फैंस को वीजा पाने की तीव्र प्रक्रिया में रजिस्ट्रेशन कराना होगा.
ट्रंप प्रशासन पर क्यों उठ रहे सवाल?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इमिग्रेशन नीति पहले से काफी सख्त मानी जाती है.
ट्रंप प्रशासन अवैध इमिग्रेशन रोकने के नाम पर लगातार नए नियम ला रहा है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये नियम गरीब देशों के लोगों को ज्यादा निशाना बनाते हैं.
कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि वीजा बॉन्ड जैसी नीतियां आर्थिक भेदभाव पैदा करती हैं क्योंकि अमीर देशों के लोगों पर ऐसे नियम कम लागू होते हैं.

फीफा वर्ल्ड कप 2026 के लिए रवाना होने से पहले ईरान की टीम
Photo Credit: AFP
ईरान और हैती का मामला क्यों अलग है?
ईरान और हैती को लेकर मामला ज्यादा संवेदनशील है.
ईरान के साथ अमेरिका के रिश्ते लंबे समय से खराब हैं. वहीं हैती राजनीतिक संकट और गरीबी से जूझ रहा है.
रिपोर्ट्स में कहा गया कि इतनी सख्त वीजा से जुड़ी पाबंदियां के कारण इन देशों के फैंस शायद अपनी टीम के मैच देखने अमेरिका ही न जा पाएं.
यानी वर्ल्ड कप में टीमें तो पहुंच जाएंगी, लेकिन उनके समर्थक पीछे छूट सकते हैं.
सोशल मीडिया जांच भी बढ़ी
अमेरिका अब केवल वीजा दस्तावेजों को ही नहीं देख रहा, बल्कि कई यात्रियों के सोशल मीडिया अकाउंट्स भी चेक कर रहा है.
अमेरिकी एजेंसियां यह जानना चाहती हैं कि व्यक्ति ऑनलाइन क्या पोस्ट करता है, किन विचारों का समर्थन करता है और उसकी गतिविधियां क्या हैं.
इससे प्राइवेसी और नागरिक अधिकारों को लेकर भी बहस तेज हो गई है.
क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले का असर सिर्फ फुटबॉल तक सीमित नहीं रहेगा.
यह फैसला दिखाता है कि बड़े खेल आयोजन कई बार देशों को अपनी सख्त नीतियां नरम करने पर मजबूर कर देते हैं.
फीफा वर्ल्ड कप अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको मिलकर आयोजित कर रहे हैं. ऐसे में अमेरिका नहीं चाहता कि दुनिया उसे एक बंद दरवाजे वाले देश के रूप में देखे.
लेकिन यह भी साफ है कि सुरक्षा और राजनीति के नाम पर इमिग्रेशन नियंत्रण अभी भी ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता बना हुआ है.
यानी फीफा वर्ल्ड कप के लिए राहत जरूर मिली है, लेकिन अमेरिका की सख्त वीजा पॉलिसी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
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