- असीम मुनीर तुर्की के दो दिन के आधिकारिक दौरे पर सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व से मुलाकात कर रहे हैं
- तुर्की पाकिस्तान के साथ सैन्य संबंध बढ़ाना चाहता है और सऊदी अरब की तरह रक्षा समझौता करना चाहता है
- तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान मुस्लिम देशों का नेतृत्व करना चाहते हैं और नाटो जैसे गठबंधन का सपना देख रहे हैं
पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर दो दिनों के लिए तुर्की के आधिकारिक दौरे पर हैं. हालांकि, इस दौरे को काफी लो प्रोफाइल रखा जा रहा है. पाकिस्तान से लेकर तुर्की तक इस दौरे पर एक तरह की खामोशी है. दोनों देश लगातार सैन्य संबंध बढ़ा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या तुर्की भी सऊदी अरब की तरह पाकिस्तान से रक्षा समझौता करने की तरफ बढ़ रहा है.
ताबड़तोड़ हो रही मीटिंग
पाकिस्तान की सरकारी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, असीम मुनीर सोमवार को दो दिन के सरकारी दौरे पर तुर्की पहुंचे. सुरक्षा सूत्रों के हवाले से सरकारी रेडियो पाकिस्तान ने बताया कि तुर्की पहुंचने पर मुनीर का जोरदार स्वागत किया गया. सुरक्षा सूत्रों ने आगे बताया कि इस दौरे के दौरान मुनीर तुर्की के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के साथ अहम बैठकें करेंगे. पिछले महीने ही तुर्की की जमीनी सेना के कमांडर जनरल मेटिन टोकेल ने पाकिस्तान यात्रा के दौरान मुनीर से मुलाकात की थी. उस दौरान इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने बताया था कि दोनों ने क्षेत्रीय सुरक्षा हालात और आपसी रक्षा सहयोग को बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. अपनी यात्रा के दौरान जनरल टोकेल ने नौसेना और वायु सेना प्रमुखों से भी मुलाकात की थी. इस महीने की शुरुआत में, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तुर्की का दौरा किया था, जिसमें आर्थिक और व्यापारिक सहयोग पर ध्यान दिया गया.
आखिर किस फिराक में दोनों देश
तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगान की सबसे बड़ी तमन्ना है कि मुस्लिम देश उन्हें खलीफा मान लें. वो मुस्लिम देशों का नेतृत्व करना चाहते हैं. कुछ-कुछ ओटोमन साम्राज्य की तरह. मगर दिक्कत ये थी कि ईरान एक तरफ शिया मुस्लिमों का सबसे बड़ा नेता था और दूसरी तरफ सऊदी अरब सुन्नी मुस्लिमों का. इन दोनों के सामने पैसे और ताकत होते हुए भी तुर्की मुस्लिम देशों के लिए कोई खास महत्व नहीं रखता था. मगर ट्रंप के दोबारा सत्ता में लौटते ही तुर्की को मौका मिलने लगा. पाकिस्तान को वो पहले से ही कश्मीर प्रेम दिखाकर अपने पाले में किए हुए थे. फिर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में मनमुटाव बढ़ा तो पाकिस्तान ने तत्काल उसके साथ रक्षा समझौता कर लिया. इसके बाद एर्दोगान चाहते हैं कि पाकिस्तान-सऊदी अरब के साथ उनका देश भी शामिल हो जाए. हालांकि, उनकी मंशा है कि ये गठबंधन नाटो की तरह बने और उसमें अन्य देश भी शामिल किए जाएं.
तो फिर देर क्यों हो रही
सऊदी अरब से पाकिस्तान ने जब समझौता किया तो उसमें भी लिखा है कि एक देश पर हमला दूसरे देश पर माना जाएगा. मगर, दोनों देश इस पर बात करने या खुलकर बयान देने से बचते रहे हैं. दोनों के हित तो इससे जुड़े हैं, लेकिन इसका साथ ही ये दोनों के लिए बोझ भी है. अगर सऊदी का यूएई से युद्ध हो जाए तो पाकिस्तान क्या करेगा. क्योंकि यूएई में भी काफी पाकिस्तानी रहते हैं. उससे भी पाकिस्तान के हित जुड़े हुए हैं. यही नहीं सऊदी के अन्य कई मुल्कों से भी तनावपूर्ण संबंध हैं. वहीं पाकिस्तान की दुश्मनी भारत से है. भारत से पाकिस्तान का पूर्ण युद्ध 1971 में अंतिम बार हुआ था. 1998 में करगिल में जो युद्ध हुआ उसे भारत तो युद्ध मानता है पर पाकिस्तान नहीं.
वहीं हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर को भी युद्ध नहीं कहा जा सकता. ऐसे में पाकिस्तान को अक्सर युद्ध नहीं करना, और युद्ध होने पर सऊदी पैसे के अलावा पाकिस्तान की कोई बहुत ज्यादा मदद भी नहीं कर सकता. तो देखें तो पाकिस्तान को ही अपने सैनिक सऊदी की लड़ाई में बार-बार भेजने पड़ेंगे. उधर, सऊदी के भी भारत से अच्छे संबंध हैं. ऐसे में वो भारत के खिलाफ पाकिस्तान की खुलकर मदद करने में दस बार सोचेगा. यही बातें तुर्की और अन्य मुस्लिम देशों को नाटो बनाने से रोक रही हैं. क्योंकि इनका आपस में ही विवाद ज्यादा है. नाटो जैसा संगठन बनाने के बाद ये युद्ध ही लड़ते रहेंगे. हालांकि, तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा संबंध बढ़ते जा रहे हैं. दोनों देश ड्रोन से लेकर युद्धपोतों और मिसाइलों पर काम कर रहे हैं. साथ ही नाटो जैसा संगठन बनाने के फायदे और नुकसान को भी परख रहे हैं.
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