- अमेरिका हो, यूरोप या एशिया- कई देशों में 2007 के बाद जन्मदर गिरती दिखी है. तब स्मार्टफोन का दौर शुरू हुआ था.
- अब एक नए शोध ने इस बहस को फिर से तेजी दे दी है कि क्या स्मार्टफोन जन्मदर गिरावट की बड़ी वजह हो सकता है?
- अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के इस शोध में शोधकर्ताओं का ध्यान एक दिलचस्प पैटर्न पर गया.
अमेरिका हो, यूरोप हो या एशिया के कई देश 2007 के बाद से लगभग हर जगह जन्मदर तेजी से गिरती दिखी है. तब आईफोन आया था और स्मार्टफोन का दौर शुरू हुआ था. अब दो नई स्टडीज ने एक ऐसा एंगल दिया है जिसने इस बहस फिर से तेज कर दी है कि क्या स्मार्टफोन इस गिरावट की एक बड़ी वजह हो सकता है? इनमें से एक शोध अमेरिका कि नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च की तरफ से की गई है, जिसमें शोधकर्ताओं का ध्यान एक दिलचस्प पैटर्न पर गया.
आईफोन और गिरती जन्मदर
2007 में आईफोन लॉन्च हुआ और उसी साल से कई देशों में जन्मदर गिरनी शुरू हो गई. यह सिर्फ अमेरिका की बात नहीं है. यह ट्रेंड लगभग पूरी दुनिया में देखा गया है. इसलिए सवाल उठा कि क्या यह सिर्फ संयोग है या कोई गहरा कनेक्शन?
लेकिन शोधकर्ताओं के पास सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इसे साबित कैसे किया जाए कि स्मार्टफोन सच में वजह हैं. क्योंकि 2007 के दौरान दुनिया में कई चीजें एक साथ बदल रही थीं. 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी, महिलाओं की बढ़ती शिक्षा, गर्भनिरोधक का इस्तेमाल और लाइफस्टाइल में आ रहा बदलाव ये सभी चीजें उस दौरान हो रही थीं.

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ऐसे में शोधकर्ताओं ने एक स्मार्ट तरीका अपनाया.
अमेरिका के मिडिलबरी कॉलेज की अर्थशास्त्री कैटलिन मेयर्स और उनके छात्र इजेकिएल हूपर ने इसके लिए एक अनोखा तरीका इस्तेमाल किया. 2007 से 2011 तक आईफोन सिर्फ AT&T नेटवर्क पर ही मिलता था. तो उन्होंने जिन इलाकों में AT&T नेटवर्क मजबूत था (जहां आईफोन आसानी से पहुंचा) उसकी तुलना उन इलाकों से की जहां यह नेटवर्क कमजोर था. फिर देखा गया कि वहां जन्मदर में क्या फर्क आया है.
क्या नतीजा निकला?
इस शोध में यह नतीजा आया कि 2007 से 2011 के बीच जन्मदर में गिरावट का लगभग आधा हिस्सा आईफोन से जुड़ा हो सकता है. इसका सबसे अधिक असर 15–24 उम्र के युवाओं पर देखा गया. यानी युवा वर्ग में यह बदलाव अधिक देखने को मिला.
शोधकर्ताओं ने इसके कुछ संभावित कारण बताए. पहला, लोगों को फोन और सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना. दूसरा, डेटिंग और रिलेशनशिप के तरीके में बदलाव देखने को मिला, अब लोग स्क्रीन पर अधिक और वास्तविक जीवन में कम मिलते थे. तीसरा, ऑनलाइन कंटेंट ने वास्तविक संबंधों में कमी लाई. कुछ मामलों में पोर्नोग्राफी और अन्य मामलों में ऑनलाइन इंटरटेनमेंट कंटेट इसकी वजह बने. चौथा, पहले परिवार नियोजन की जानकारी का स्पष्ट तौर पर अभाव था लेकिन इंटरनेट आने की वजह से यह आसानी से उपलब्ध होने लगी और लोगों तक गर्भनिरोधक के उपायों की आसान उपलब्धता हुई.

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पर क्या यह सिर्फ अमेरिका तक सीमित है?
यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाती के एक अन्य शोध में 128 देशों के डेटा को देखा गया. इसमें पाया गया कि जिन देशों में स्मार्टफोन का तेजी से विस्तार हुआ वहां जन्मदर में तेजी से गिरावट देखी गई. और यह पैटर्न अलग-अलग देशों में लगभग एक जैसा था, चाहे वो देश अमीर हो या गरीब या वहां भिन्न संस्कृति ही क्यों न हो. शोधकर्ताओं ने इसे नाम दिया- ग्लोबल टेक्नोलॉजी शॉक.
चलिए जानते हैं कि अलग-अलग विकसित देशों में जन्मदर की स्थिति क्या है और सरकारें इसके लिए क्या कर रही हैं? सबसे पहले ये बता दें कि दुनिया की जनसंख्या की स्थिरता को बरकरार रखने के लिए इसे 2.1 की दर पर बरकरार रखना होगा. यानी हर कपल के पास कम से कम दो बच्चे हों.

दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे कम जन्मदर वाले देश में शामिल है
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दक्षिण कोरियाः यह दुनिया में सबसे कम जन्मदर वाला देश है. यहां जन्मदर 0.76 है. सरकार इसे यहां राष्ट्रीय संकट मान चुकी है. अगर यही ट्रेंड बना रहा तो आने वाले दशकों में कोरिया की आबादी तेजी से गिरेगी. सरकार ने यहां हर बच्चे के जन्म पर कैश इंसेंटिव, मुफ्त या सब्सिडाइज्ड चाइल्डकेयर, हाउसिंग सपोर्ट और कामकाजी माता-पिता के लिए बेहतर सुविधाएं दे रही है. निजी कंपनियों पर भी वर्क-लाइफ बैलेंस सुधारने का दबाव दिया जा रहा है. लेकिन यहां युवाओं की सोच अलग है. करियर को लेकर दबाव और घरों की बेतहाशा कीमतों को लेकर लोग बच्चे पैदा करने से बच रहे हैं. इसके साथ ही डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की लगातार मौजूदगी ने भी लाइफस्टाइल बदल दी है. लोग अब समय अकेले स्क्रीन पर बिताते हैं, और सामाजिक रिश्तों की जगह डिजिटल इंटरैक्शन ने ले ली है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां समस्या सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सोशल और साइकोलॉजिकल शिफ्ट भी है.

जापान ने गिरते जन्मदर को थामने के उपायों के लिए बर्थरेट मंत्रालय का प्रावधान किया है
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जापानः यह उन चुनिंदा देशों में है जहां जन्मदर में लगातार गिरावट देखने को मिल रहा है. यहां 1950 में जन्मदर 3.43 था, जिसमें लगातार गिरावट आती गई. 2023 में यह अपने निम्नतम स्तर 1.2 पर आ गई लेकिन बीते दो वर्षों से यह 1.38 बनी हुई है तो इसकी वजह सरकार बच्चों के जन्म पर आर्थिक सहायता से लेकर पेरेंटल लीव, चाइल्डकेयर सुविधाओं को सस्ता करने और सुलभ बनाने की कोशिश कर रही है. कई सोशल कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं पर जापान में अत्यधिक वर्क प्रेशर और लंबे समय तक काम (जॉब आवर) के कारण लोग शादी और परिवार बनाने से कतराते हैं. साथ ही डिजिटल लाइफस्टाइल और स्मार्टफोन का बढ़ता इस्तेमाल भी लोगों को अकेला कर रहा है. कई एक्सपर्ट मानते हैं कि यहां लोग ऑनलाइन तो कनेक्टेड हैं पर असल जिंदगी में उनका आपसी जुड़ाव कम है.

चीन में जन्मदर 1.0 है
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चीनः इस देश ने आबादी को नियंत्रित करने के मकसद से दशकों तक वन-चाइल्ड पॉलिसी अपनाई थी. लेकिन अब हालात उलट गए हैं. जन्मदर इतनी तेजी से गिरने लगी कि सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ी. यहां पहले दो और फिर तीन बच्चों की अनुमति दी गई. सरकार बच्चे पैदा करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन, टैक्स छूट और उनकी परवरिश के लिए सपोर्ट दे रही है. लेकिन चीन में शहरी जीवन बेहद महंगा हो चुका है. घरों की कीमतें, पढ़ाई का खर्च और करियर की प्रतिस्पर्धा के चलते एक बड़ा युवा वर्ग परिवार नहीं बढ़ाना चाहता. साथ ही स्मार्टफोन और डिजिटल लाइफस्टाइल ने भी सामाजिक व्यवहार बदल दिया है. लोग ज्यादा समय ऑनलाइन बिता रहे हैं, जिससे पारंपरिक पारिवारिक ढांचा कमजोर पड़ रहा है. चीन में जन्मदर 1.0 है.

जर्मनी ने जन्मदर को स्थिर रखने के लिए नायाब तरीका अपनाया है
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जर्मनी: जर्मनी में जन्मदर 1.5 के करीब है, इसकी वजह यह है कि उसने एक अलग तरीका अपनाया है. इसने यहां इमिग्रेशन यानी बाहर से कामगारों को बुलाने पर जोर दिया है. यहां वर्क वीजा आसान किए गए हैं. पर युवाओं की सोच, महंगाई, करियर पर फोकस करने और बदलती लाइफस्टाइल के कारण परिवार छोटे होते जा रहे हैं. डिजिटल लाइफस्टाइल और स्मार्टफोन यहां भी लोगों के आपसी रिश्ते को प्रभावित कर रहे हैं. शायद यही वजह है कि जर्मनी अब इमिग्रेशन डिपेंडेंट ग्रोथ मॉडल पर काम कर रहा है.

इटली में खाली होते गांव
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इटली और स्पेन: इन देशों में स्थिति और भी गंभीर मानी जाती है. यहां जन्मदर 1.1 से 1.25 के बीच है. आज यहां कई गांव खाली हो रहे हैं और युवा बेहतर अवसरों के लिए दूसरे देशों में जा रहे हैं. जन्मदर इतनी कम है कि जनसंख्या घटने का साफ खतरा दिख रहा है. यहां सरकारें बेबी बोनस, टैक्स रियायतें और परिवार सहायता योजनाएं चला रही हैं. लेकिन युवा वर्ग का कहना है कि असली समस्या आर्थिक असुरक्षा और नौकरी की अनिश्चितता है. इसके अलावा शहरी लाइफस्टाइल, अकेलापन और डिजिटल वर्ल्ड का बढ़ता प्रभाव भी भूमिका निभा रहा है. स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने भी सामाजिक पैटर्न बदल दिया है.
अमेरिकाः अमेरिका में भी जन्मदर गिर रही है. यह 1.62 है, जो कि एशिया और यूरोप की तरह फिलहाल उतनी गंभीर नहीं है. लेकिन अमेरिकी समाज में भी बदलाव साफ दिख रहा है. शादी की उम्र बढ़ रही है. लोग कम बच्चे चाहते हैं. नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च जैसी कुछ स्टडीज यह भी कहती हैं कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने लोगों की सामाजिक आदतों को प्रभावित किया है, जिससे वास्तविक रिश्तों की जगह डिजिटल इंटरैक्शन बढ़ा है.
भारतः फिलहाल यह उन देशों में नहीं है जहां जन्मदर संकट बन चुका है, पर यहां भी ट्रांजिशन देखने को मिल रहा है. राष्ट्रीय जन्मदर भले ही 1.9 है, लेकिन राजधानी दिल्ली में यह 1.2 है. वहीं केरल, सिक्किम, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, गोवा, कर्नाटक जैसे राज्यों में यह 1.5 से कम है. इसकी अहम वजहें शादी का देर से होना, खर्च और लाइफस्टाइल बताया जाता है. हालांकि स्मार्टफोन और डिजिटल लाइफस्टाइल भारत में भी तेजी से पसरा है पर अभी ऐसे कोई शोध यहां नहीं हुए हैं कि ये घटते जन्मदर के अहम घटकों में शामिल हैं.
शोध से हर कोई सहमत नहीं
अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च जैसी संस्थानों के स्मार्टफोन से जन्मदर को जोड़ने की थ्योरी पर कुछ एक्सपर्ट्स सवाल भी उठा रहे हैं. उनका कहना है कि अमेरिका में जन्मदर 1990 के दशक से ही गिर रही थी. यानी स्मार्टफोन से पहले ही यह ट्रेंड शुरू हो चुका था. एक अर्थशास्त्री थियोडोर जॉयसी ने कहा कि यह नतीजा अभी 'पूरी तरह से साबित हुआ' नहीं माना जा सकता. उनके मुताबिक यह हो सकता है कि स्मार्टफोन एक वजह हो, लेकिन जन्मदर गिरने की यह अकेली वजह नहीं है.
तो फिर असली तस्वीर क्या है?
असल में जन्मदर गिरने के पीछे कई फैक्टर हैं. इसमें स्मार्टफोन से भी अधिक अहम बढ़ती महंगाई और खर्च का बढ़ना, विभिन्न वजहों से देर से शादी का करना, करियर को प्राथमिकता देना, शहरी लाइफस्टाइल अपनाना और पहले से चली आ रही पारिवारिक सोच को बदलना- जैसे- कम बच्चे या बिना बच्चे जीवन व्यतीत करने का निर्णय लेना शामिल है.
तो स्मार्टफोन घटती जन्मदर की कहानी का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह अकेले इसकी वजह नहीं है. ये दो शोध यह इशारा करते हैं कि 2007 के बाद निश्चित रूप से स्मार्टफोन के आने से लोगों की लाइफस्टाइल इसके मुताबिक बदली है. आज लोगों का सामाजिक मेलजोल पहले की तुलना में कम हुआ है. कई घरों में इसका असर रिश्तों और परिवार बढ़ाने की प्रवृति पर भी हो सकता है.
लेकिन साफ तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि स्मार्टफोन ही अकेली वजह है जो जन्मदर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. यानी स्मार्टफोन समाज में हो रहे बदलाव की एक वजह है पर जन्मदर पर अर्थव्यवस्था और लाइफस्टाइल जैसे विभिन्न कारक साथ मिल कर काम कर रहे हैं.
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