
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी दो दिन की जापान यात्रा के दौरान दारुमा गुड़िया भेंट की गई. टोक्यो के मशहूर शोरिनजान मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें ये गुड़िया उपहार के तौर पर दी है. ये जापान की एक पारंपरिक गुड़िया है, जिसे वहां के लोग भगवान की तरह मानते हैं. ये दोनों देशों के रिश्तों को और ज्यादा बेहतर बनाने के संकेत के तौर पर पीएम मोदी को भेंट की गई है. आइए जानते हैं कि इस डॉल की क्या कहानी है.
क्या होती है दारुमा डॉल?
दारुमा डॉल सैकड़ों सालों से जापानी परंपरा का अहम हिस्सा रही है और इसे गुड लक का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है. इसे इसके गोल, लाल रंग और खोखले आकार से पहचाना जाता है. इसमें सिर्फ एक चेहरा बना हुआ होता है, लेकिन इसके हाथ या पैर नहीं होते हैं. ये किसी गुल्लक की तरह नजर आती है. ये डॉल बोधिधर्म, या जापानी में दारुमा का प्रतिनिधित्व करती है. दारुमा पांचवीं शताब्दी के एक बौद्ध संत थे, इन्हें ही जापान में इस धर्म की स्थापना का श्रेय दिया जाता है.
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इस डॉल की बनावट के पीछे भी जापान में एक कहानी है. मान्यताओं के मुताबिक बौद्ध संन्यासी के कठोर ध्यान के कारण उनके हाथ और पैर गायब हो गए थे और वो कुछ ऐसे ही दिखते थे, जैसे दारुमा डॉल नजर आती है. इस डॉल को कुछ इस तरह से बनाया जाता है कि ये गिरने पर खुद ही खड़ी हो जाती है.
भारत से भी है कनेक्शन
दारुमा डॉल का सिर्फ जापान से ही कनेक्शन नहीं है, बल्कि इसके तार भारत से भी जुड़े हैं. दारुमा मदुरई के बोधिसेना नाम के बौद्ध भिक्षु से प्रेरित बताई जाती है. जो 5वीं शताब्दी के दौरान चीन गए थे और फिर यहां से उन्होंने जापान का रुख किया. उन्हें ही जापान और चीन में बौद्ध धर्म के संस्थापक के रूप में जाना जाता है. शिंतो धर्म के बाद जापान में बौद्ध धर्म को मानने वाले सबसे ज्यादा लोग रहते हैं.
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