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प्रॉफिट की गारंटी भी होता है युद्ध, पढ़ें-कैसे जंग से जेबें भर रहे दुनिया के दबंग देश

युद्ध सिर्फ तबाही नहीं, बल्कि मुनाफे का बड़ा कारोबार भी बन चुका है. ईरान युद्ध के बहाने हथियारों की डील, तेल बाजार, ड्रोन टेक्नोलॉजी और वैश्विक डिफेंस बजट कैसे दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं, पढ़िए-

युद्ध बन रहे मुनाफे का जरिया (एआई इमेज)
  • ईरान की राजधानी तेहरान से जुड़ा B1 ब्रिज अमेरिका के हवाई हमले में तबाह हो गया है, जिसे नागरिक संरचना बताया गया
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले को लेकर सोशल मीडिया पर डील की धमकी देते हुए कड़ा रुख दिखाया
  • अमेरिका ने ईरान के ड्रोन हमलों के जवाब में सस्ते और प्रभावी काउंटर‑ड्रोन सिस्टम विकसित करने पर जोर दिया है

ईरान पर इजरायल और अमेरिका का जॉइंट अटैक—सेना के लिए यह युद्ध है, नेता के लिए राजनीति, कवि के लिए त्रासदी, डिप्लोमैट के लिए एक्टिविटी और ब्यूरोक्रेट के लिए प्लानिंग. लेकिन पूंजीपति के लिए युद्ध प्रॉफिट की गारंटी होता है. यही वजह है कि हर बुरी इकोनॉमी को एक अच्छे युद्ध का इंतजार रहता है. बुरी से बुरी मंदी का सबसे सटीक इलाज युद्ध माना जाता है. इस समय पूरी दुनिया में बम के पीछे डील चल रही हैं. कौन, किसके साथ और क्या डील कर रहा है, इसे समझना जरूरी है. ईरान की राजधानी तेहरान को पश्चिम ईरान से जोड़ने वाला प्रमुख ब्रिज B1 तबाह हो गया है. इस पर अमेरिका ने हवाई हमला किया. युद्ध में सेना से जुड़ी चीजों को तबाह किया जाता है, जबकि ईरान इस पुल को नागरिक उपयोग की संरचना बताता है. हमले की तस्वीरें जब पूरी दुनिया में फैल गईं तो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर तबाह पुल की तस्वीरें साझा कीं और लिखा कि ईरान का सबसे बड़ा पुल टूट चुका है. यह फिर कभी खड़ा नहीं हो पाएगा, अभी बहुत कुछ आने वाला है. ईरान के लिए यही वक्त है कि वह डील कर ले, इससे पहले कि देर हो जाए और ऐसा कुछ भी न बचे जो किसी देश को महान बनाने के लिए जरूरी है.

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तेहरान का B1 ब्रिज तबाह, हमले के बाद ‘डील' का संदेश

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ‘डील' शब्द का इस्तेमाल बहुत ज्यादा हुआ है. ईरान युद्ध से पहले जब उन्होंने दुनिया भर के देशों के खिलाफ टैरिफ वॉर का ऐलान किया था, तब भी वह हर देश को डील की धमकी देते रहे. ट्रेड में डील की बात आम है, लेकिन युद्ध में डील की बात सुनते ही हैरानी होती है. ट्रंप के युद्ध मंत्री खुले तौर पर कहते हैं कि अमेरिका बम पर डील करता है. अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ को लेकर अमेरिकी सीनेट में सवाल उठे हैं. डेमोक्रेट सांसदों ने पूछा है कि क्या उन्होंने अपनी वित्तीय जानकारी में सही और पूरी जानकारी दी है और क्या उन्होंने पद के एथिकल नियमों का पालन किया है. यह सवाल एक बड़े अखबार की रिपोर्ट के बाद उठा, जिसमें दावा किया गया कि हेगसेथ के निजी स्टॉक ब्रोकर ने उन कंपनियों में निवेश की संभावनाएं तलाशी थीं जो पेंटागन में हथियारों की बड़ी सप्लायर हैं. हालांकि पेंटागन और पीट हेगसेथ ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है, लेकिन पूरे अमेरिका में इस कथित डील को लेकर चर्चा तेज है.

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ट्रंप युग में ‘डील' की भाषा, टैरिफ वॉर से वॉर डील तक

2003 में इराक युद्ध के दौरान दुनिया ने पहली बार युद्ध का सीधा प्रसारण देखा. यही वह मौका था जब पहली बार यह दावा सामने आया कि दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही नष्ट किया जा सकता है. पैट्रियट और स्कड मिसाइलों को लेकर बड़े‑बड़े दावे किए गए, लेकिन बाद में कुछ निजी शोधकर्ताओं ने कहा कि स्कड और पैट्रियट को लेकर किए गए सैन्य दावे हर बार सही साबित नहीं हुए. शोधकर्ताओं का कहना था कि हथियारों की क्षमता को बढ़ा‑चढ़ाकर पेश किया गया और इसमें टीवी न्यूज की बड़ी भूमिका रही. टीवी पर दिखाया गया हर इंटरसेप्शन एक तरह का लाइव विज्ञापन था. यहां अमेरिका के राष्ट्रपति आइजनहावर की वह भविष्यवाणी सच होती दिखी. सरकार, सेना और हथियार निर्माता कंपनियों का गठजोड़ युद्ध को बिजनेस बना सकता है. ऐसी स्थिति में युद्ध एक टेस्टिंग ग्राउंड, मीडिया एक मार्केटिंग प्लेटफॉर्म और युद्ध से पैदा हुआ डर डिमांड ड्राइवर बन जाता है. यही स्थिति ईरान युद्ध में भी दिख रही है, जहां युद्ध एक तरह से हथियारों का शोरूम बन गया है. युद्ध के दौरान पैदा हो रहे खतरों का डर कई देशों को नए हथियार और सिस्टम खरीदने पर मजबूर कर रहा है.

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इराक युद्ध से ईरान तक: हथियारों का लाइव विज्ञापन

ईरान युद्ध में अमेरिका बार‑बार अपनी सैन्य श्रेष्ठता का दावा कर रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप कहते हैं कि अमेरिका और उसकी सेना से ज्यादा ताकतवर दुनिया में कोई नहीं है. लेकिन ईरान के ड्रोन ने इस दावे को चुनौती दी है. इसी वजह से अमेरिका ने ईरान के शाहेद ड्रोन की तर्ज पर LUCAS (Low‑Cost Uncrewed Combat Attack System) नाम का नया ड्रोन तैयार किया है. यह अमेरिका की मजबूरी थी, क्योंकि उसके महंगे हथियारों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे थे. लाखों रुपये के ड्रोन को मार गिराने के लिए अरबों की मिसाइलें दागनी पड़ रही थीं, इसलिए अब अमेरिका सस्ते काउंटर‑ड्रोन सिस्टम पर जोर दे रहा है. ड्रोन डोम सिस्टम तैयार करने में लगभग ₹31,26,42,000 का खर्च आता है और यह कम लागत में ड्रोन गिराने का दावा करता है. ड्रोन हंटर ₹94,71,000 में तैयार हो जाता है. इंटरसेप्टर ₹1 करोड़ में बनता है और मिसाइल की तरह काम करता है. LOCUST सिस्टम ₹94,71,00,000 में तैयार होता है और ₹300 में एक ड्रोन गिराने का दावा करता है. आयरन बीम और USS प्रिबले जैसे सिस्टम भी ₹300 से ₹1,000 में एक ड्रोन को निष्क्रिय करने का दावा करते हैं.

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ड्रोन वॉर ने बदली रणनीति, सस्ते हथियारों पर जोर

इसी कड़ी में एक अमेरिकी कंपनी T‑POWERUS का नाम सामने आता है. दावा किया गया है कि इस कंपनी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटों एरिक ट्रंप और डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की हिस्सेदारी है. यह कंपनी मिडिल ईस्ट के देशों को ड्रोन से बचाने वाले इंटरसेप्टर बेचने की तैयारी कर रही है. यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी चर्चा में हैं. यूक्रेन खुद युद्ध में फंसा है, लेकिन ईरान युद्ध में अमेरिका ने उनसे ड्रोन पकड़ने की तकनीक मांगी. बदले में जेलेंस्की ने अपनी शर्तें रखीं. इसके बाद उन्होंने सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और कुवैत के साथ काउंटर‑ड्रोन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का समझौता किया. बदले में यूक्रेन को मिसाइल इंटरसेप्टर तकनीक और पैसा दोनों मिलेगा. दुनिया युद्ध में विनाश देख रही है, जबकि पर्दे के पीछे डर और ताकतवर बनने का कारोबार चल रहा है.

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T‑POWERUS से जेलेंस्की तक, काउंटर‑ड्रोन की वैश्विक डील

चीन के नेता माओ त्से तुंग का कथन है कि राजनीति बिना खून‑खराबे का युद्ध है और युद्ध खून‑खराबे वाली राजनीति का. ईरान युद्ध में साफ दिखाई देता है. इस युद्ध में चीन‑अमेरिका‑रूस का त्रिकोण अहम भूमिका निभा रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध के लिए अमेरिकी कांग्रेस से ₹139.5 लाख करोड़ का बजट मांगा है, जो अमेरिका के इतिहास का सबसे महंगा युद्ध बजट है और कई देशों के संयुक्त रक्षा बजट से भी ज्यादा है. युद्ध के असर से बाजारों में भारी उतार‑चढ़ाव देखा गया. ट्रंप के बयानों से यूएस स्टॉक फ्यूचर्स गिरे, तेल की कीमतें उछलीं और डिफेंस शेयरों में तेजी आई. जैसे ही युद्ध के जल्दी खत्म होने के संकेत दिए गए, तेल में नरमी और कई सेक्टरों में उछाल देखने को मिला. टेक, कंज्यूमर और बैंकिंग सेक्टर पर दबाव रहा, जबकि ऊर्जा और डिफेंस सेक्टर में सकारात्मक माहौल बना रहा. जोखिम बढ़ने पर अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ.

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चीन‑अमेरिका‑रूस त्रिकोण और युद्ध का बाजार पर असर

टंगस्टन जैसी धातुएं, जिनका इस्तेमाल मिसाइल, लड़ाकू विमानों और सेमीकंडक्टर में होता है, अब डील का बड़ा कारण बन रही हैं. चीन ने टंगस्टन की सप्लाई पर नियंत्रण कर लिया है, जिससे इसके दाम बढ़ गए हैं. जिन देशों के पास टंगस्टन है, वे अमेरिका के संपर्क में आ रहे हैं. अमेरिका में 2023 के बाद नौकरियों की भर्तियां तेज हुई हैं. बेरोजगारी दर 4.4% से घटकर 4.3% हो गई है. युद्ध और उससे जुड़ी डील्स ने बाजार में पैसा डाला है. पेट्रोलियम, गैस और ऊर्जा से जुड़े सेक्टरों में डील्स बढ़ी हैं. चीन ने मिडिल ईस्ट पर अपनी पेट्रोलियम निर्भरता घटाकर इलेक्ट्रिक ऊर्जा पर जोर दिया है. वह ईवी क्रांति का बड़ा खिलाड़ी बन चुका है. इसी वजह से अमेरिका और चीन के बीच टकराव बढ़ा है. अमेरिका चाहता है कि जब तक पेट्रोलियम ऊर्जा का मुख्य स्रोत है, चीन उससे दूर रहे, जबकि चीन बिना सीधे युद्ध के अमेरिका के खर्च को बढ़ा रहा है और डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है.

तेल, धातु, हथियार और डर—युद्ध के पीछे चलती डील्स

होर्मूज संकट, टैरिफ वॉर, NATO की भूमिका और मिडिल ईस्ट में हथियारों की बिक्री, हर जगह डील्स की परतें दिखती हैं. अमेरिका ने यूएई, कुवैत और जॉर्डन को करीब 23 बिलियन डॉलर के हथियार बेचने को मंजूरी दी है. कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुके हैं. युद्ध से पूरी दुनिया में मंदी का खतरा है, लेकिन हथियार, ऊर्जा और डर के कारोबार में मुनाफा लगातार जारी है. जैसे कहा जाता है कि डर के आगे जीत है, वैसे ही युद्ध के पीछे डील है.

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