- ईरान में अमेरिकी फाइटर जेट के गिरने पर अमेरिका ने भारी संसाधनों के साथ पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन किया.
- ऑपरेशन में ब्लैक हॉक, एफ-35 लड़ाकू विमान, टैंकर विमान, निगरानी विमान और भारी परिवहन विमान सी-130 शामिल थे
- सी-130 विमान का उपयोग सामान्य रेस्क्यू मिशन में नहीं होता, जिससे मिशन के पीछे गुप्त उद्देश्य पर सवाल उठ रहे
ईरान में अमेरिकी फाइटर जेट के गिरने के बाद अमेरिका ने फिल्मी अंदाज में अपने पायलट को रेस्क्यू किया. फिर ट्रंप ने इस मिशन को साहसी ऑपरेशन तक बता दिया. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये वाकई सिर्फ एक बचाव अभियान थाया इसके पीछे कोई बड़ा और छुपा हुआ मकसद था? शक की सुई इसलिए इस ओर जा रही है क्योंकि जिस तरह के संसाधन इस मिशन में लगाए गए, वो एक पायलट के रेस्क्यू मिशन से कहीं ज्यादा लगते हैं. इस ऑपरेशन में सिर्फ हेलीकॉप्टर ही नहीं थे, बल्कि ब्लैक हॉक, ए-10 थंडरबोल्ट, एफ-35 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान, हवा में ईंधन भरने वाले टैंकर, निगरानी करने वाले विमान और सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि सी-130 जैसे भारी-भरकम परिवहन विमान भी शामिल थे.ट्रंप ने तो खुद कहा है कि दर्जनों जहाज इस मिशन में लगे हुए थे.
कितने जहाज मिशन में तैनात किए गए थे?
• 4-6 रेस्क्यू हेलिकॉप्टर
• 4-6 कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू एयरक्राफ्ट
• 12-20 फाइटर जेट्स
• 2-3 इंटेलिजेंस/सर्विलांस AWACS एयरक्राफ्ट
• 6-8 टैंकर विमान (हवा से हवा में तेल भरने के लिए)
US 'RESCUE OPERATION'… COVER-UP FOR URANIUM SEIZURE?!
— RT (@RT_com) April 6, 2026
Two C‑130s, multiple helicopters… OVERWHELMING FORCE for one-man mission
Landed conveniently MILES from Isfahan NUCLEAR-LINKED facilities
'Perhaps this OPERATION was NEVER a RESCUE AT ALL!' — Iran's Head of Energy Mgmt pic.twitter.com/QsLFokshpF
C-130 विमान का इस्तेमाल क्यों हजम नहीं हो रहा है?
अब यहीं से कहानी पलटती है. क्योंकि सामरिक तौर पर देखें तो रेस्क्यू मिशन में सी-130 जैसे परिवहन विमान का इस्तेमाल आमतौर पर नहीं किया जाता. तो सवाल उठता है, क्या अमेरिका सिर्फ अपने पायलट को लेने गया था या कुछ और लेकर वापस आने वाला था?
यूरोनियम के लिए ईरान में घुसे थे 100 कमांडो?
तो क्या ये सिर्फ एक संयोग है? या फिर बचाव अभियान सिर्फ एक आड़ था और असली खेल कहीं और चल रहा था? क्योंकि रिपोर्ट्स ये भी कहती हैं कि अमेरिका ने इस मिशन में करीब 100 स्पेशल फोर्सेज के कमांडो तैनात किए थे. सिर्फ एक पायलट के लिए इतनी संख्या में फौजियों की जान जोखिम में डालने का क्या मोल हो सकता है. अगर ये सिर्फ बचाव था तो फिर अमेरिकी विमान क्रैश साइट से दूर, परमाणु ठिकानों के आसपास क्या कर रहे थे? एक जवाब ये हो सकता है कि वो रेस्क्यू मिशन की आड़ में यूरेनियम सीज करने गए थे.
आखिर में सवाल यही है कि सच्चाई क्या है. ये मिशन असल में क्या था? एक जोखिम भरा बचाव अभियान या उसके पीछे छुपा कोई बड़ा रणनीतिक खेल? अभी तक जो जानकारी सामने आई है, वो अधूरी है और अलग-अलग दावों पर टिकी हुई है.
ऐसे में सच और शक के बीच की ये रेखा और भी धुंधली हो जाती है. जब तक ठोस सबूत सामने नहीं आते, तब तक ये कहानी सिर्फ एक मिशन की नहीं, बल्कि उन सवालों की है जो जवाब मांगते हैं. उम्मीद है आने वाले समय में ही इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे.
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