ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है. ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ संदेश दिया है कि यह ऑपरेशन अभी खत्म नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि हालिया हमले सिर्फ शुरुआत हैं, और अमेरिकी सेना आगे और भी बड़े प्रहार करने को तैयार है.
ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि पिछले 47 सालों, यानी 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से, ईरान दुनिया भर में हिंसा और अस्थिरता फैलाता रहा है और अब उसे इन सभी वर्षों की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.
ईरान को आर्थिक रूप से तोड़ना चाहता है US
तेल कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका का लक्ष्य केवल सैन्य जवाब नहीं, बल्कि ईरान की आर्थिक रीढ़ यानी ऊर्जा नेटवर्क को पूरी तरह निष्क्रिय करना है. उनका कहना है कि यह अभियान तब तक चलेगा जब तक ईरान की क्षमता पूरी तरह खत्म न कर दी जाए.
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अमेरिकी राष्ट्रपति के इन बयानों से स्पष्ट है कि वॉशिंगटन किसी भी सूरत में पीछे हटने के मूड में नहीं है, और क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ सकता है.
ईरान ने भी भरी हुंकार
गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट की जंग हर गुजरते दिन के साथ और भयानक रूप लेती जा रही है. एक तरफ तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि उनकी आर्मी ने ईरान को घुटनों पर ला दिया गया है और जंग जल्द खत्म हो सकती है. वहीं दूसरी तरफ ईरान का साफ कहना है कि जंग भले अमेरिका-इजरायल ने शुरू की है लेकिन उसकी समाप्ति अब ईरान के शर्तों पर होगी. अब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने जंग खत्म करने के लिए तीन शर्त रखी हैं.
अपनी शर्तों पर युद्ध लड़ेगा ईरान
मसूद पेजेशकियान ने साफ-साफ संकेत दिया है कि युद्ध को समाप्त करने का एकमात्र रास्ता यह है कि ईरान के निर्विवाद अधिकारों को स्वीकार किया जाए. जंग के कारण ईरान को जो क्षति पहुंची है उसका हर्जाना दिया जाए. और आखिरी शर्त यह है कि भविष्य की आक्रामकता के खिलाफ निर्णायक अंतरराष्ट्रीय गारंटी लागू किया जाए.
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राष्ट्रपति पेजेशकियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'रूस और पाकिस्तान के राष्ट्रपतियों के साथ बात करते हुए मैंने क्षेत्र में शांति और शांति के लिए इस्लामी गणराज्य की प्रतिबद्धता की घोषणा की. मैंने इस बात पर भी जोर दिया कि जायोनी शासन (इजरायल के लिए इस्तेमाल) और अमेरिका की युद्धोन्माद के साथ शुरू हुए युद्ध को समाप्त करने का एकमात्र तरीका ईरान के निर्विवाद अधिकारों को स्वीकार करना, जंग के कारण हुई क्षति के बदले हर्जाने का भुगतान करना और उनकी आक्रामकता को दोबारा होने से रोकने के लिए एक दृढ़ अंतरराष्ट्रीय गारंटी है.'
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