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रूस-यूक्रेन को 'मोदी का युद्ध' बताने वाले ट्रंप के सलाहकार नवारो को अमेरिका के ये 3 पाखंड नहीं दिखते?

US India Tariff Tension: भारत पर टैरिफ बम फोड़ने के बाद ट्रंप ने अपने संगी-साथियों को भी भारत के खिलाफ उलूल-जुलूल बोलने के काम में लगाया है. इसमें सबसे ज्यादा सीमा उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने लांघी है.

रूस-यूक्रेन को 'मोदी का युद्ध' बताने वाले ट्रंप के सलाहकार नवारो को अमेरिका के ये 3 पाखंड नहीं दिखते?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ पर अपना पाखंड नहीं दिख रहा
  • अमेरिकी राष्ट्रपति एक दिन में रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने का वादा किया था, लेकिन 222 दिन बाद भी शांति नहीं.
  • अब ट्रंप भारत पर आरोप लगा रहे कि वह रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध की फंडिंग कर रहा है, इसलिए टैरिफ लगाया है.
  • भारत ने कहा है कि रूस से तेल खरीदना उसकी आर्थिक जरूरत है. जबकि अमेरिका, यूरोप भी रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं
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जब किसी के पास हुनर न हो, उसे नाचना न आता हो तो उसके सामने सबसे आसान रास्ता क्या होता है? कहावत की माने तो वह आंगन को ही टेढ़ा बताने लगता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हाल भी कुछ ऐसा ही है. अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने के 24 घंटे के अंदर रूस-यूक्रेन जंग खत्म कराने का चुनावी वादा करने वाले ट्रंप के पास 222 दिन बाद भी दुनिया को दिखाने के लिए कोई शांति समझौता नहीं है और अपनी इसी असफलता को ठीकरा वो भारत पर मढ़ते दिख रहे हैं.

ट्रंप कह रहे हैं कि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन में उसकी जंग की फंडिंग कर रहा है. इसी को आधार बनाकर उन्होंने भारतीय सामानों पर अमेरिका के अंदर लगने वाले टैरिफ को दोगुना करके 50 फीसदी कर दिया है. जैसे जैसे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ट्रंप की हर कोशिश को धता बताकर यूक्रेन पर हमले तेज कर रहे हैं, बेबसी में ट्रंप भारत पर बार-बार ठीकरा फोड़ रहे हैं. उन्होंने अपने संगी-साथियों को भी भारत के खिलाफ उलूल-जुलूल बोलने के काम में लगाया है, जिसमें सबसे ज्यादा सीमा लांघी है उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने. पहले आप एक के बाद एक, नवारो के दो बेतुके बयानों को देखिए और फिर हम आपको बताएंगे कि कैसे ट्रंप और अमेरिका खुद की नाकामी छिपाने के लिए भारत को निशाने पर ले रहा हैं.

नवारो का बयान नंबर एक- व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को "मोदी का युद्ध" करार दिया. उन्होंने यह दावा किया कि नई दिल्ली ने ही रूस से लगातार तेल खरीदकर उसकी सैन्य आक्रामकता को बढ़ावा दिया है. 

नवारो का बयान नंबर दो- पहले बयान के ठीक अगले दिन पीटर नवारो ने एक कदम और आगे बढ़कर भारत पर यहां तक आरोप लगाया कि भारत रूस के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का काम कर रहा है. कहा कि भारत जो तेल खरीदकर रूस को पैसा देता है, वो सीधे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के "वॉर चेस्ट" में जाता है.

अब बारी है नवारो और ट्रंप की झुंझलाहट और उनके पाखंड को समझने की.

1. पुतिन की जिद्द के सामने ट्रंप की हर कोशिश फेल

डोनाल्ड ट्रंप को शांतिदूत दिखना है, शांति का नोबेल लेना है लेकिन काम गुंडो वाले हैं. चाहे रूस-यूक्रेन जंग हो या इजरायल-गाजा जंग… ट्रंप की हर कोशिश फेल साबित हुई है. ट्रंप बार बार यह भूल जाते हैं कि शांति का रास्ता सहमति से होकर गुजरता है, दबाव-जबरदस्ती से होकर नहीं. जब ट्रंप ने 20 जनवरी 2025 को दोबारा राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली तो जंग रोकने के लिए यूक्रेन के पास नहीं, रूस के पास गए. यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की को सबके सामने तानाशाह बोला. ओवल ऑफिस में सबके सामने बहस की, लगभग उन्हें डांट दिया. आगे संबंधों को फिर से सुधारने के लिए खुला दिल दिखाया. फिर यूक्रेन के साथ हथियार और खुफिया जानकारी शेयर करना बंद कर दी. जब बार-बार पुतिन ने झटका देते हुए सीजफायर समझौते पर राजी होने से इनकार किया तो वापस यूक्रेन को अपने पाले में लेते आएं. अब वापस पुतिन के साथ अलास्का में आमने सामने की बातचीत की है. दूसरी तरफ यूक्रेन की सैन्य मदद कर रहे हैं. मतलब ट्रंप हमेशा पलटते रहे. 

दूसरी तरफ पुतिन अपनी मर्जी और अपनी शर्त पर जंग को और तीखा करते जा रहे हैं. जब ट्रंप उनसे जेलेंस्की के साथ आमने सामने की बैठकी की अपील कर रहे हैं, पुतिन अबतक की जंग में सबसे खतरनाक हवाई हमले कर रहे हैं. ट्रंप बेबस हैं.

2. भारत पर टैरिफ लेकिन खुद रूस से व्यापार- कमाल है!

ट्रंप का पाखंड तो भारत के विदेश मंत्रालय ने उसी दिन सबके सामने ला दिया था जब उसने भारत पर जुर्माने के रूप में 25% टैरिफ लगाए थे. ट्रंप दावा कर रहे हैं कि भारत रूस से सस्ते दाम पर तेल खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ उसकी जंग की फंडिंग कर रहा है. लेकिन भारत का कहना है कि अगर ऐसा है तो अमेरिका और यूरोपीय संघ फिर रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को जारी क्यों रखे हुए हैं. भारत का कहना है कि रूस  से तेल का व्यापार करना हमारी आर्थिक जरूरत है लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ बिना कोई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बाध्यता के रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं. 

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा, 'जब लोग कहते हैं कि हम युद्ध को फंड कर रहे हैं और पैसा लगा रहे हैं, तो उन्‍हें बता दूं कि रूस-यूरोपियन व्यापार भारत-रूस व्यापार से कहीं बड़ा है. तो क्या यूरोप का पैसा खजाने में नहीं जा रहा है?'

जयशंकर ने कहा, 'यह हास्यास्पद है कि व्यापार-समर्थक अमेरिकी प्रशासन के लोग दूसरों पर व्यापार करने का आरोप लगा रहे हैं. अगर आपको भारत से तेल या रिफाइंड उत्पाद खरीदने में कोई समस्या है, तो उसे न खरीदें. कोई आपको उसे खरीदने के लिए मजबूर नहीं करता. यूरोप खरीदता है, अमेरिका खरीदता है, इसलिए अगर आपको वह पसंद नहीं है, तो उसे न खरीदें.'  

3. चीन पर कोई एक्शन नहीं, खुद अमेरिका में हो रहा विरोध

क्या ट्रंप को चीन और रूस का व्यापार नहीं दिख रहा? चीन भी रूसी तेलों का प्रमुख खरीदार है लेकिन ट्रंप उसके साथ व्यापार वार्ता में लगे हैं और उसपर क्यों सेकेंडरी टैरिफ नहीं लगा है, इसका कोई जवाब उनके पास नहीं है. ठीक यही बात अब अमेरिका में ट्रंप से पूछा जा रहा है. अमेरिकी सदन की विदेश मामलों की समिति में डेमोक्रेट्स पार्टी ने साफ शब्दों में कहा है कि रूस के सबसे बड़े कच्चे तेल खरीदार में से एक चीन पर कोई जुर्माने वाला टैरिफ नहीं लगाया गया है.

डेमोक्रेट्स ने कहा कि भारतीय आयात पर ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ "अमेरिकियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं" और "अमेरिका-भारत संबंधों को नुकसान पहुंचा रहे हैं", जो पिछले दो दशकों में अमेरिका की दोनों पार्टियों- रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी- के प्रयासों से बने हैं.

यही नहीं खुद अमेरिकी अर्थशास्त्री भी यह बात कह रहे. अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड वोल्फ ने कहा है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है. अमेरिका अपने इस कदम से ब्रिक्स को पश्चिम का आर्थिक विकल्प बनने का मौका दे रहा है. उन्होंने कहा है “अमेरिका का भारत को यह बताना कि क्या करना है, एक चूहे द्वारा हाथी पर अपना मुक्का मारने जैसा है."

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