- तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए 'मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट' समझौते में नया समीकरण आया है.
- तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है त्रिपक्षीय समझौता किसी खास देश या ईरान के खिलाफ नहीं है.
- तुर्की के विदेश मंत्री का बयान सऊदी अरब के लिए बड़ा झटाक माना जा रहा है.
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच पवित्र शहर मक्का में एक अहम समझौता हुआ था. जिसे 'इस्लामिक नाटो' भी कहा जा रहा है. इस समझौते को 'मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट' नाम दिया गया था. जिसके तहत तीनों देशों के बीच ऐतिहासिक त्रिपक्षीय सैन्य समझौता हुआ था. चर्चा थी कि इसके तहत तीनों में से किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमला किया जाता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और वे मिलकर उसका सैन्य जवाब देंगे. तीनों देशों के बीच यह बड़ा गठजोड़ माना गया. लेकिन 24 घंटे बाद ही इस मामले में नया समीकरण देखने को मिला है. क्योंकि तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने अपने बयान में साफ किया है कि यह त्रिपक्षीय समझौता किसी खास देश या ईरान के खिलाफ नहीं है.
हम ईरान के खिलाफ नहीं: हाकान फिदान
दरअसल, 'मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट' के बाद तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान के बयान के बाद नए रणनीतिक गठबंधन के स्वरूप को लेकर चर्चाओं का बाजार फिर गर्म हो गया है. तुर्की की समाचार एजेंसी 'अनादोलु' को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा 'यह समझौता किसी खास देश को ध्यान में रखकर नहीं किया गया है. हाकान फिदान ने जोर देकर कहा कि यह डील ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं है. कोई भी देश जो हम पर हमला नहीं करता, वह हमारा टारगेट नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि तीनों देश किसी भी राज्य को तब तक दुश्मन नहीं मानते, जब तक वे उनके खिलाफ कोई शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न करें.'
ये भी पढ़ेंः Explainer: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान मिलकर एक-दूसरे को क्या देंगे, भारत का बदहाल पड़ोसी इनके किस काम का
क्या सऊदी अरब के लिए झटका ?
विश्लेषकों का मानना है कि तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान का यह बयान एक तरह सेसऊदी अरब के लिए एक झटके की तरह हो सकता है. क्योंकि हालियां अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान ईरान समर्थित हमलों का सामना कर रहे रियाद को इस समझौते से बड़ी कूटनीतिक और सैन्य बैकिंग की उम्मीद थी. लेकिन तुर्की के विदेश मंत्री के ताजा बयानों के बाद यह समीकरण बदलते दिख रहे हैं.
कब शामिल हो सकती हैं सेनाएं ?
तुर्की के विदेश मंत्री समझौते की तुलना नाटो के अनुच्छेद 5 से की है. जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है. हालांकि, इसे लागू करने की शर्तें बेहद स्पष्ट हैं. जिसमें किसी सदस्य देश पर हमला होने पर अपने से ही तीनों देशों की सेनाएं युद्ध में नहीं उतरेंगी. इसके लिए पीड़ित देश को औपचारिक रूप से मदद का अनुरोध करना होगा. खतरे के पैमाने और प्रकृति के आधार पर सहायता का दायरा तय होगा. इसमें खुफिया जानकारी साझा करना और लॉजिस्टिक्स मदद या जरूरत पड़ने पर सैन्य टुकड़ियों की तैनाती शामिल हो सकती है. लेकिन स्पष्ट रूप से सेनाएं नहीं उतरती हैं.
ये भी पढ़ेंः पाकिस्तान और तुर्की संग इस्लामिक नाटो बनाने वाले सऊदी अरब पर ईरान का तंज- कागजी समझौता बचा नहीं पाएगा
इस समझौते के तहत सऊदी अरब में एक साझा सचिवालय स्थापित किया जाएगा. इसके अलावा, तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री अपने सैन्य प्रमुखों के साथ नियमित रूप से समिति की बैठकें करेंगे.
क्या मिस्र भी होगा शामिल
तुर्की के विदेश मंत्री ने यह संकेत भी दिए हैं कि इस समझौते में और देश भी शामिल हो सकते हैं. जिसमें सबसे पहले नजरें मिस्र पर दिख रही हैं. हालांकि हाकान फिदान उन्होंने किसी देश का नाम खुलकर नहीं लिया, लेकिन यह जरूर कहा कि उम्मीद है कि मिस्र अगले चरण में इस रक्षा समझौते से जुड़ेगा. यह नया समझौता पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं.
बता दें कि पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुई इस डील पर दुनियाभर की नजरें टिकी हैं. क्योंकि यह समझौता तीन ऐसे देशों के बीच हुआ है, जिनकी अपनी अलग-अलग खासियत है. इसमें सऊदी अरब की आर्थिक संपन्नता, तुर्किये की आधुनिक ड्रोन और उन्नत सैन्य तकनीक के साथ पाकिस्तान की परमाणु-सशस्त्र थल सेना को एक मजबूत रक्षा कवच में जोड़ता है. यही वजह है कि इस जानकार इस्लामिक नाटो भी कह रहे हैं.
ये भी पढ़ेंः मोजताबा खामेनेई की कैसी है तबीयत? 'मौत' की अफवाहों के बीच सामने आया नया VIDEO, समर्थकों से बातचीत करते दिखे
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं