अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस 'बोर्ड ऑफ पीस'का ढोल-नगाड़ा पीटकर पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटा था, उसकी अंदरूनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है. गाजा के पुनर्निर्माण के बड़े-बड़े दावों के बीच इस बोर्ड के आधिकारिक फंड में अभी तक एक भी रुपया जमा नहीं हुआ है. ब्रितानी अखबार 'फाइनेंशियल टाइम्स' (FT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सदस्य देशों की ओर से अरबों डॉलर की मदद के वादों के बावजूद इस वक्त आधिकारिक फंड में 'जीरो' कैश है.
यह मामला तब सामने आया है जब अक्टूबर में अमेरिका की कोशिशों से इजरायल और हमास के बीच दो साल से जारी जंग को रोकने के लिए सीजफायर हुआ था. ट्रंप ने इसी जंग से तबाह हुए गाजा को दोबारा खड़ा करने के इरादे से इस बोर्ड का ताना-बाना बुना था. लेकिन शुरुआत से ही यह बोर्ड विवादों और कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा, क्योंकि ट्रंप ने इसके लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत उन देशों को भी न्योता भेज दिया था, जिनका मध्य-पूर्व की कूटनीति से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था.
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जेपी मॉर्गन का क्या है कनेक्शन?
'फाइनेंशियल टाइम्स' ने मामले से जुड़े चार अनजान सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि जनवरी में इस बोर्ड के गठन के बाद से इसके आधिकारिक फंड में एक भी डॉलर जमा नहीं किया गया है. इस अकांउट को वर्ल्ड बैंक संभाल रहा है और संयुक्त राष्ट्र (UN) की मंजूरी हासिल है.
तो फिर सवाल उठता है कि आखिर सदस्य देशों की ओर से घोषित किया गया पैसा जा कहां रहा है?
अखबार ने बोर्ड के प्रवक्ता के हवाले से बताया कि दरअसल, इस बोर्ड को मिलने वाला चंदा (डोनेशन) सीधे 'जेपी मॉर्गन' (JPMorgan) के एक निजी खाते में जमा कराया जा रहा है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस जेपी मॉर्गन वाले खाते के लिए कोई 'स्वतंत्र पारदर्शिता नियम' तय नहीं किए गए हैं. यानी इस पैसे के लेन-देन की निगरानी करने वाली कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है.
यूरोपीय देशों ने बनाई दूरी, ट्रंप के हाथ में है 'रिमोट कंट्रोल'
इस बोर्ड के तौर तरीकों को देखकर फ्रांस और ब्रिटेन जैसे बड़े यूरोपीय देशों ने इससे पूरी तरह दूरी बना ली है. फिलहाल इस बोर्ड में ज्यादातर अमेरिका के पुराने साथी, मध्य पूर्व के देश, ट्रंप की विचारधारा से मेल खाने वाले नेता और पाकिस्तान सरीखे छोटे देश जो ट्रंप की सरपरस्ती हासिल करना चाहते हैं.
गाजा को चाहिए 71 अरब डॉलर
फंडिंग की इस कंगाली के बीच गाजा की सूरत-ए-हाल बद से बदतर है. इसी साल अप्रैल में जारी हुए यूरोपीय संघ (EU) और संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक, जंग से पूरी तरह बर्बाद हो चुके गाजा को दोबारा बसाने के लिए अगले एक दशक में 71 अरब डॉलर से ज्यादा की भारी-भरकम रकम की दरकार है.
ट्रंप ने खुद इस बोर्ड के लिए अमेरिका की तरफ से 10 अरब डॉलर देने का ऐलान किया था, जबकि कतर, सऊदी अरब और यूएई ने भी कम से कम 1-1 अरब डॉलर देने का वादा किया था. गाजा में अमन की राह अब भी कोसों दूर है. अक्टूबर में हुए सीजफायर के बाद भी गाजा में हर रोज हिंसा और बमबारी का दौर जारी है.
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