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खंडहर गाजा में कैसी मन रही बकरीद? हर साल कुर्बानी करने वाले 1 किलो मांस नहीं खरीद पा रहे

Bakrid 2026 in Gaza: गाजा में इस बार बकरीद खुशियों नहीं, मजबूरियों और दर्द के बीच मनाई जा रही है. महंगाई, युद्ध और तबाही के कारण माता-पिता अपने बच्चों के लिए नए कपड़े, मिठाइयां और यहां तक कि एक किलो मांस तक नहीं खरीद पा रहे.

खंडहर गाजा में कैसी मन रही बकरीद? हर साल कुर्बानी करने वाले 1 किलो मांस नहीं खरीद पा रहे
Bakrid 2026 in Gaza: गाजा में रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए इस बार की बकरीद भी फीकी ही है
  • जंग, महंगाई और लगातार तबाही ने गाजा की खुशियां छीन ली हैं, हर त्योहार की तरह बकरीद भी उदास गुजर रही
  • गाजा में अब केवल करीब 15,000 भेड़ें बची हैं, कीमतें 15 गुना तक बढ़ चुकी हैं
  • गैस की भारी कमी होने की वजह से घर में खाना बनाना और बेकिंग करना भी मुश्किल हो गया है
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Bakrid 2026 in Gaza: कभी गाजा में बकरीद खुशियों, नए कपड़ों, कुर्बानी और मिठाइयों का त्योहार हुआ करती थी. बच्चे नए कपड़े पहनते थे, घरों में मामूल और काक जैसी मिठाइयां बनती थीं और हर तरफ रौनक दिखाई देती थी. लेकिन अब हालात इतने खराब हैं कि लोग सिर्फ बाजार जाकर चीजों को देख सकते हैं, खरीद नहीं सकते. जंग, महंगाई और लगातार तबाही ने गाजा की खुशियां छीन ली हैं. लाखों लोग अब भी टेंटों में रहने को मजबूर हैं. इस बार बकरीद गाजा में त्योहार कम और संघर्ष ज्यादा बन गई है, जहां माता-पिता अपने बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहे.

"सिर्फ बाजार जाकर सामान देख सकती हूं"

फिलिस्तीनी महिला नादिया अबू शमाला ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा, “मैं बाजार सिर्फ देखने जाती हूं क्योंकि मैं कुछ खरीद नहीं सकती. जब भी कीमत पूछती हूं, दिल टूट जाता है.” गाजा के उत्तर से विस्थापित होकर पिछले दो साल से मध्य गाजा के डेयर अल-बलाह में रह रहीं 40 साल की नादिया ने कहा, “इस साल बकरीद में वह खुशी नहीं है जो कभी गाजा में हुआ करती थी. युद्ध, बढ़ती कीमतों और बच्चों की छोटी जरूरतें तक पूरी न कर पाने की वजह से त्योहार फीका पड़ गया है.”

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(गाजा में मार्केट प्लेस खंडहर हो चुके हैं, अब टेबल की पूरा का पूरा बाजार बन जा रहा (फोटो- एएफपी) 

बता दें कि अक्टूबर 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता से सीजफायर शुरू हुआ था, लेकिन इसके बावजूद गाजा में इजरायली हवाई हमले अब भी जारी हैं.

संयुक्त राष्ट्र (UN) के मुताबिक, युद्ध में गाजा की 80 प्रतिशत इमारतें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं और ज्यादातर लोग अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए मदद पर निर्भर हैं. जमीनी स्तर पर काम कर रहे एनजीओ का कहना है कि इजरायल गाजा में आने-जाने के सभी रास्तों को नियंत्रित करता है. विदेशी मदद और निजी सामान वाले ट्रकों को बहुत कम संख्या में अंदर आने दिया जाता है, जिससे महंगाई और सामान की कमी कम नहीं हो पा रही.

गाजा में रहने वाले अबू अब्दुल्लाह अल-मोसादर ने कहा, “यह सीजफायर एक बड़ा झूठ है, लेकिन फिर भी हम बच्चों के लिए खुशी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं.” 59 साल के मोसादर ने बताया कि उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर करीब 13,000 शेकेल यानी लगभग 4.4 लाख रुपए जुटाए ताकि कुर्बानी के लिए एक भेड़ खरीदी जा सके. गाजा में बहुत कम लोग इतनी रकम खर्च कर सकते हैं.

मोसादर ने कहा, “मुझे पता है कि यह बहुत महंगा है, लेकिन मैंने इस साल कुर्बानी करने का फैसला किया.”

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गाजा में सामानों की किल्लत है जिसकी वजह से महंगाई भी चरम पर है (फोटो- एएफपी) 

गाजा में भेड़ों की भारी कमी

बकरीद मक्का की हज यात्रा के खत्म होने का प्रतीक है और उसमें भेड़ की कुर्बानी सबसे अहम मानी जाती है.  लेकिन छोटे से गाजा में अब बाहर से पशु नहीं आ पा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, युद्ध से पहले जितनी भेड़ें थीं, अब उनमें से सिर्फ एक चौथाई बची हैं. यानी 21 लाख आबादी वाले गाजा में अब केवल करीब 15,000 भेड़ें बची हैं.

गाजा के कृषि मंत्रालय के प्रवक्ता राफात असालिया ने कहा कि इस साल कुर्बानी के जानवरों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. इसकी वजह कम सप्लाई, पशुपालन का बढ़ता खर्च, चारे और ट्रांसपोर्ट की महंगाई और कई फार्मों का बंद होना है. उन्होंने कहा, “जो भेड़ या बकरी युद्ध से पहले करीब 1,000 शेकेल में मिलती थी, उसकी कीमत अब 11,000 से 15,000 शेकेल तक पहुंच गई है.”

गाजा में 15 गुना महंगी बिक कहीं भेड़ (फोटो- एएफपी)

गाजा में 15 गुना महंगी बिक कहीं भेड़ (फोटो- एएफपी)

अहमद अबू सलेम ने कहा, “हमने जिंदगी में कभी इतनी कीमतें नहीं सुनीं.” 50 साल के अहमद ने कहा, “हम जैसे परिवार, जो हर साल कुर्बानी करते थे, अब अपने बच्चों के लिए एक किलो मांस भी नहीं खरीद पा रहे.”

टेंट में बन रहीं ईद की मिठाइयां

गाजा में गैस की भारी कमी होने की वजह से घर में खाना बनाना और बेकिंग करना भी मुश्किल हो गया है. दक्षिण गाजा में परिवार के साथ विस्थापित होकर रह रहे अबू अहमद वाफी ने कहा, “बाजारों में काक, मामूल और मिठाइयां तो हैं, लेकिन पहले हम इन्हें घर पर बनाया करते थे. अब चीजें बहुत महंगी हो गई हैं और बेकिंग के लिए गैस भी नहीं है.”

दक्षिण गाजा के खान यूनिस में एक परिवार ने अस्थायी टेंट के नीचे मामूल बनाने की कोशिश की. उस टेंट पर संयुक्त राष्ट्र की बच्चों की एजेंसी यूनिसेफ का पुराना तिरपाल लगा हुआ था. जमीन पर बैठी एक महिला और उसकी बेटी गाजा शैली में गोल आकार का आटा तैयार कर रही थीं, जबकि एक आदमी मिट्टी के अस्थायी ओवन में उन्हें पका रहा था.

गाजा में कुछ ही परिवार इसबार खुद मिठाई बना रहे हैं (फोटो- एएफपी)

गाजा में कुछ ही परिवार इसबार खुद मिठाई बना रहे हैं (फोटो- एएफपी)

डेयर अल-बलाह में अपने टेंट से नादिया अबू शमाला ने बेहतर दिनों की उम्मीद जताई. उन्होंने कहा, “हम अब भी टेंटों में रह रहे हैं. यहां खुशी जैसा कुछ नहीं है, सिर्फ चिंता, डर और थकान है. वह खुशियां अब नहीं रहीं जो कभी हमारी जिंदगी का हिस्सा थीं.”

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