- दुनिया के सबसे ज्यादा बारिश वाले राज्यों में शामिल मेघालय में सामान्य से 57% कम बारिश दर्ज की गई है.
- बंगाल की खाड़ी से बना गहरा निम्न दबाव मध्य भारत की ओर बढ़ गया, इससे मानसून की नमी उत्तर भारत की तरफ चली गई.
- हालांकि मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में पूर्वोत्तर में बारिश बढ़ने की उम्मीद जताई है.
दुनिया में सबसे अधिक बारिश वाले इलाकों में गिनती किए जाने वाले मेघालय में इस बार मानसून का बिल्कुल अलग चेहरा देखने को मिल रहा है. चेरापूंजी और मासिनराम जैसे इलाके, जहां बारिश के वर्ल्ड रिकॉर्ड बनते रहे हैं, वहां इस बार बादल उम्मीद के मुताबिक नहीं बरस रहे. नतीजा यह है कि मानसून के अपने चरम पर होने के बावजूद, मेघालय में अब तक हुई बारिश में 57 फीसद की कमी दर्ज की गई है. सवाल ये है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? क्या मानसून का रास्ता बदल गया है? क्या यह सिर्फ एक मौसमी घटना है या जलवायु परिवर्तन का संकेत?
भारत में मानसून की चर्चा होते ही सबसे पहले जिन राज्यों का नाम आता है, उनमें मेघालय सबसे ऊपर होता है. यहां का मासिनराम और सोहरा (चेरापूंजी) दुनिया के सबसे ज्यादा बारिश वाले स्थानों में गिने जाते हैं. गुवाहाटी स्थित मौसम विभाग (आईएमडी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक मासिनराम 11802.4 मिली मीटर की औसत वार्षिक बारिश के साथ देश में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है. वहीं चेरापूंजी (सोहरा) में एक साल में औसतन 11359.4 मिली मीटर बारिश होती है.
यही कारण है कि हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक मेघालय सिर्फ यहां की बारिश का लुत्फ लेने पहुंचते हैं. साल 2025 में मेघालय में अनुमानित 18 लाख पर्यटक आए. जो खासी, जयंतिया और गारो हिल्स के विभिन्न पर्यटन स्थलों को देखने यहां पहुंचे. खास कर यहां बारिश के मौसम में पर्यटकों की संख्या काफी बढ़ जाती है, जो यहां होने वाली वर्ल्ड रिकॉर्ड बारिश को देखने पहुंचते हैं. लेकिन इस साल तस्वीर बिल्कुल उलट है. जिस राज्य की पहचान लगातार होने वाली बारिश की है, वही इस साल बारिश की भारी कमी से जूझ रहा है.

पूरे देश में बारिश की कमी से जुड़े आंकड़े
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कितना बड़ा है बारिश का घाटा?
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 4 जून से 28 जुलाई के बीच मेघालय में सामान्य तौर पर 632.1 मिमी बारिश होनी चाहिए थी. लेकिन इस अवधि में राज्य में केवल 272.9 मिमी बारिश दर्ज हुई. यानी बारिश में सामान्य से करीब 57 फीसद की कमी आई.
यह तस्वीर और विकराल तब दिखती है जब इसे इस तरह देखें कि इस साल मेघालय देश में सबसे अधिक बारिश की कमी से जूझ रहे राज्यों में शामिल हो गया है. सबसे अहम यह कि बारिश की कमी की मार से केवल मेघालय नहीं, बल्कि पूरा पूर्वोत्तर ही जूझ रहा है. मौसम विभाग के बारिश विश्लेषण के मुताबिक पूरे पूर्वोत्तर भारत में मानसून अब तक कमजोर रहा है.
- मेघालय: 57% बारिश कम हुआ
- मणिपुर: 42% बारिश कम हुआ
- असम: 40% बारिश कम हुआ
- अरुणाचल प्रदेश: 40% बारिश कम हुआ

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आखिर बारिश गई कहां?
पहले समझते हैं कि मानसून की सामान्य प्रक्रिया क्या होती है? भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी लेकर पूरे देश में आगे बढ़ता है. आमतौर पर बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाएं जब सबसे पहले करीब 200 किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों से टकराती हैं तो ऊपर की ओर उठ कर उनका तापमान कम होने लगता है.
ठंडी हवाएं नमी को अपने अंदर नहीं रोक सकती हैं. ऐसे में ये पानी की बूंदों में बदल जाती है और पहाड़ों पर बहुत अधिक बारिश कर देती हैं. मेघालय में इसी वजह से अत्यधिक बारिश होती है. लेकिन इस बार मौसम की स्थिति अलग रही.
मौसम विभाग के मुताबिक इस समय बंगाल की खाड़ी से बना एक गहरा निम्न दबाव का क्षेत्र ओडिशा के रास्ते मध्य भारत की ओर बढ़ गया. इसके साथ मानसूनी नमी भी पश्चिम और मध्य भारत की तरफ खिंच गई.बेशक इसका फायदा ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों को मिला और इन इलाकों में इस वक्त बारिश हो रही है.
पर पूर्वोत्तर भारत मानसून की मुख्य सक्रिय पट्टी से बाहर हो गया. यानी बादलों और नमी का बड़ा हिस्सा वहां तक पहुंच ही नहीं पाया. यही वजह है कि मेघालय जैसे राज्य में भी लगातार भारी बारिश नहीं हो सकी.

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सैटेलाइट तस्वीरें क्या बता रही हैं?
भारत के मौसम उपग्रह इनसैट-3डीएस की ताजा तस्वीरें भी यही संकेत देती हैं. इन तस्वीरों में मध्य भारत और हिमालय की तलहटी के ऊपर घने बादल साफ दिखाई दे रहे हैं. वहीं मेघालय के ऊपर बादल अपेक्षाकृत कमजोर और बिखरे हुए नजर आए. यानी राज्य के ऊपर लगातार विकसित होने वाले भारी वर्षा वाले बादल इस बार नहीं बन सके.
मौसम विभाग के शिलांग मौसम केंद्र की दैनिक रिपोर्ट भी यही तस्वीर पेश कर रही है. पिछले 24 घंटों के दौरान राज्य के अधिकांश हिस्सों में केवल हल्की से मध्यम बारिश दर्ज हुई. सोहरा यानी चेरापूंजी और मासिनराम जो दुनिया में सबसे अधिक बारिश के लिए मशहूर दो जगहें हैं, वहां भी केवल सामान्य या हल्की बारिश दर्ज हुई.
Meghalaya Dt. 30-07-2026 #WeatherUpdate #weatherdata #temperature #Meghalaya #HarHarMausam pic.twitter.com/r0BUPYUmHy
— Meteorological Centre Shillong (@imd_shillong) July 30, 2026
इन इलाकों में 70 से 130 मिली मीटर ही बारिश दर्ज की गई है. वैसे बारिश भले ही यहां न हुई हो पर मौसम अब भी सुहावना है और तापमान सोहरा (चेरापूंजी) में 18.8 डिग्री सेल्सियस तो राजधानी शिलॉन्ग में 17.6 डिग्री सेंटीग्रेड दर्ज की गई है.
पर बारिश का आलम ये है कि राज्य के पश्चिमी इलाकों में तो महज 2.5 से 20 मिली मीटर तक बारिश दर्ज की गई है, ऐसे में कई जगहों पर मौसम लगभग सूखा ही बना रहा.

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आखिर मेघालय में इतनी बारिश होती क्यों है?
इस सवाल का जवाब उसकी भौगोलिक स्थिति में छिपा है. बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाएं सबसे पहले मेघालय की खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ियों से टकराती हैं.
जब हवा पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती है तो उसका तापमान कम हो जाता है और उसमें मौजूद नमी ठंडी हो कर बारिश की बूंदों के रूप में गिरने लगती है. इसी प्रक्रिया को ओरोग्राफिक रेनफॉल कहा जाता है. इसे रिलीफ रेनफॉल भी कहते हैं. इसी कारण मासिनराम और सोहरा में दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश दर्ज होती है. वहीं जब ये मानसूनी हवाएं ही कमजोर पड़ जाती हैं या उनका रास्ता बदल जाता है तो यही इलाके सामान्य से कम बारिश भी देखते हैं.

क्या यह जलवायु परिवर्तन का असर है?
केवल एक मानसून के आधार पर जलवायु परिवर्तन का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. हालांकि वैज्ञानिक कई वर्षों से यह कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का व्यवहार बहुत अधिक अनिश्चित होता जा रहा है.
अर्थ साइंस मंत्रालय की असेस्मेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन रिपोर्ट के डेटा से पता चलता है कि बढ़ते तापमान की वजह से बीते कुछ दशकों में बारिश के पैटर्न में भारी बदलाव देखने को मिला है.
अब बारिश पहले जैसी लगातार नहीं होती. इसके बजाय कहीं बहुत ज्यादा बारिश तो कहीं बिल्कुल कम बारिश होती है. वहीं कुछ इलाकों में बहुत कम दिनों में ही अत्यधिक वर्षा देखने को मिलती है, जैसा इस बार असम के शिवसागर और चराइदेव जैसे जिलों में देखने को मिला. राज्य सरकार के अनुसार यहां बाढ़ अभूतपूर्व थी, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से इन जिलों में बाढ़ का खतरा नहीं रहा है.
मौसम विभाग और अर्थ साइंस मंत्रालय भी समय-समय पर यह बताते रहे हैं कि बदलती जलवायु के कारण वर्षा का वितरण पहले की तुलना में अधिक असमान होता जा रहा है.

नोहकलिकाई वाटरफॉल, चेरापूंजी, मेघालय
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सबसे अधिक असर किस पर?
अगर अगस्त में भी यही स्थिति बनी रही तो इसका सीधा असर खेती, पीने के पानी और पर्यटन समेत कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है.
खेती: मेघालय में धान की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है. बारिश कम रहने पर बुवाई और फसल दोनों प्रभावित हो सकती हैं. राज्य में संतरा, अनानास, अदरक, हल्दी और कई अन्य फसलें होती हैं. इनके लिए भी समुचित बारिश जरूरी होती है.
पीने का पानीः पहाड़ी इलाकों में बड़ी आबादी प्राकृतिक झरनों पर निर्भर करती है. बारिश कम होने से पेयजल का संकट भी खड़ा हो सकता है.
नदियां और ग्राउंड वाटरः अगर लगातार कम बारिश हुई तो इससे नदियों में पानी का स्तर भी कम हो सकता है. साथ ही ग्राउंड वाटर रिचार्ज भी इससे प्रभावित होगा.
पर्यटनः मेघालय का अर्थ बादलों का घर होता है. यह नाम ही इसे इसलिए दिया गया क्योंकि यहां खूब बारिश होती है. यही वजह है कि झरने यहां के आकर्षण हैं. अगर बारिश कम हुई तो इन झरनों में प्रवाह भी कम हो सकता है और इसका प्रतिकूल असर पर्यटन उद्योग पर पड़ सकता है.
District Level Forecast Warning map Dt. 30-07-2026 for Meghalaya #forecasting #warning #meteorology #Meghalaya #WeatherUpdate #meghalaya #HarHarMausam #HarGharMausam pic.twitter.com/I6sq3FIRSD
— Meteorological Centre Shillong (@imd_shillong) July 30, 2026
क्या स्थिति सुधर सकती है?
फिलहाल मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में हालात बेहतर हो सकते हैं. मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक आगामी दिनों में पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भी मानसूनी गतिविधियां धीरे-धीरे मजबूत हो सकती हैं. हालांकि यह निर्भरता बंगाल की खाड़ी से मिलने वाली पर्याप्त नमी और मानसून ट्रफ पर निर्भर है.
बता दें कि जब बादलों के बीच ठंडी और गर्म हवा आपस में मिलती है तो एक कम दबाव का क्षेत्र बनता है, उस सिस्टम से निकलने वाली पट्टी को मानसून टर्फ लाइन कहते हैं. इसमें अचानक ही मौसम में बदलाव हो जाता है और तेज बारिश होती है.
तो अगर बंगाल की खाड़ी से फिर पर्याप्त नमी मिले और मानसून टर्फ पूर्व की ओर खिसके, तो मेघालय में अच्छी बारिश की संभावना बढ़ जाएगी. ऐसा होने पर अब तक बारिश में दर्ज की गई कमी कुछ हद तक सामान्य स्तर की ओर बढ़ेगी.

मौसम विभाग बता रहा है कि अगस्त में अच्छी बारिश के आसार हैं
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मौसम विभाग क्या बता रहा है?
मौसम विभाग लगातार अपने दैनिक बुलेटिन में यह बता रहा है कि मानसून फिलहाल मध्य भारत और उत्तर भारत के बड़े हिस्से में अधिक सक्रिय है, जबकि पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में वर्षा सामान्य से कम बनी हुई है. विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि सप्ताह के अंत तक पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में वर्षा गतिविधियों में बढ़ोतरी हो सकती है. यही उम्मीद मेघालय के लिए राहत की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है.
मानसून अभी समाप्त नहीं हुआ है और मौसम विभाग के संकेत इस संभावना को बढ़ा रहे हैं कि अगस्त में अच्छी बारिश होगी और वर्षा में आई कमी काफी हद तक ठीक हो जाएगी.
लेकिन यह घटना एक बड़ा संकेत जरूर देती है. जिस राज्य की पहचान ही बारिश है, वहां भी यदि मानसून कमजोर पड़ सकता है, तो यह बताता है कि भारतीय मानसून पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल और अनिश्चित होता जा रहा है.
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