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3500 साल पहले ही पालतू बन गए थे कबूतर! नई रिसर्च ने खोला इतिहास का नया चैप्टर

भले आज के जमाने में कबूतरों को शहरों में गंदगी फैलाने वाले पक्षी के रूप में जाना जाता है लेकिन इन्हें इंसानों ने 3500 साल पहले ही पालतू बनाया था, वे उस वक्त में टेलीफोन और व्हाट्सएप का काम किया करते थे.

3500 साल पहले ही पालतू बन गए थे कबूतर! नई रिसर्च ने खोला इतिहास का नया चैप्टर
New Science Research: कबूतरों का चौंकाने वाला है इतिहास, इंसानों के साथ 3500 साल पुराना रिश्ता
  • नई रिसर्च के अनुसार इंसानों ने करीब 3500 साल पहले कबूतरों को पालतू बनाना शुरू किया था
  • कबूतरों का इंसानी समाज में उपयोग मैसेज पहुंचाने और युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए किया जाता था
  • वैज्ञानिकों ने साइप्रस के हाला सुल्तान टेक्के पुरातात्विक स्थल पर मिले कबूतरों की हड्डियों का अध्ययन किया है
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आज शहरों में कबूतरों को अक्सर गंदगी फैलाने वाला पक्षी माना जाता है. लोग उन्हें भगाने के लिए इमारतों पर नुकीले स्पाइक्स तक लगाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही कबूतर कभी इंसानों के सबसे भरोसेमंद साथी हुआ करते थे? वे चिट्ठियां पहुंचाते थे, युद्ध में मदद करते थे, खेती के लिए खाद का जरिया थे और धार्मिक प्रतीक भी माने जाते थे. अब एक नई रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है कि इंसानों और कबूतरों का रिश्ता जितना हम सोचते थे, उससे करीब 1000 साल ज्यादा पुराना है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान लगभग 3500 साल पहले ही कबूतरों को पालने लगे थे.

नई रिसर्च में बड़ा खुलासा

कभी इंसानों के बेहद काम आने वाले कबूतर आज ज्यादातर शहरों में गंदे और परेशान करने वाले पक्षी माने जाते हैं. लेकिन नई रिसर्च से पता चला है कि इन पक्षियों का इंसानी समाज से रिश्ता बहुत पुराना है. न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार को प्रकाशित रिसर्च में बताया गया कि कबूतरों को पहली बार करीब 3500 साल पहले पालतू बनाया गया था. इसका मतलब है कि इंसानों और कबूतरों का साथ पहले की सोच से लगभग 1000 साल ज्यादा पुराना है.

नीदरलैंड की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी की बायोआर्कियोलॉजिस्ट एंडरसन कार्टर ने एएफपी से कहा, “इंसानों का कबूतरों को भूलना मानव इतिहास में हाल ही की बात है.” नई स्टडी जर्नल एंटीक्विटी में प्रकाशित हुई है. स्टडी की मुख्य लेखिका एंडरसन कार्टर ने कहा कि 19वीं और 20वीं सदी तक भी कबूतर समाज के लिए बहुत उपयोगी थे.

उन्होंने बताया, “कबूतरों का इस्तेमाल मैसेज पहुंचाने के लिए किया जाता था और खासकर युद्धों में उनकी अहम भूमिका होती थी.” लेकिन बाद में तकनीक तेजी से आगे बढ़ी. टेलीग्राफ और फिर टेलीफोन का आविष्कार हुआ और धीरे-धीरे कबूतरों का काम खत्म हो गया. हालांकि इंसानों ने हजारों साल तक कबूतरों को अपने साथ रहने की आदत डाल दी थी, इसलिए वे इंसानों के आसपास ही बने रहे.

कार्टर ने कहा कि औद्योगिक क्रांति के बाद जब बड़े-बड़े शहर बने, तब लोगों ने कबूतरों को गंदा और बीमारी फैलाने वाला पक्षी मानना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि अब इमारतों के ऊपर लगाए जाने वाले “एंटी-पिजन स्पाइक्स” आम चीज बन चुके हैं. सामान्य कबूतर, जिन्हें रॉक डव भी कहा जाता है, मूल रूप से भूमध्यसागर क्षेत्र के थे और वहां से बाकि जगह गए. जीन संबंधी जांच में पता चला है कि आज शहरों में रहने वाले कबूतर मिडिल ईस्ट के जंगली कबूतरों से काफी जुड़े हुए हैं.

कैसे हुई यह रिसर्च

नई रिसर्च के लिए नीदरलैंड की अगुवाई वाली वैज्ञानिकों की टीम साइप्रस के दक्षिण-पूर्व में लारनाका साल्ट लेक के किनारे मौजूद हाला सुल्तान टेक्के पुरातात्विक स्थल पर पहुंची. वैज्ञानिकों ने वहां मिले 159 प्राचीन कबूतरों की हड्डियों का अध्ययन किया. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि ये कबूतर कैसे रहते थे, कैसे मरे और क्या इंसानों ने उनके साथ कोई हस्तक्षेप किया था.

जांच में पता चला कि ये कबूतर कांस्य युग यानी 13वीं और 14वीं सदी ईसा पूर्व के समय के थे. वैज्ञानिकों ने हड्डियों से कोलेजन निकालकर उसमें मौजूद नाइट्रोजन और कार्बन की मात्रा की जांच की. इससे उन्हें यह पता लगाने में मदद मिली कि कबूतर क्या खाते थे. इसके बाद इन नतीजों की तुलना उसी समय के साइप्रस में मिले इंसानों और दूसरे जानवरों से की गई. एंडरसन कार्टर ने कहा, “हाला सुल्तान टेक्के के कबूतरों का भोजन इंसानों के भोजन से काफी मिलता-जुलता था. इससे पता चलता है कि वे इंसानों के साथ रहते थे.”

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