- पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर शुक्रवार को बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने बड़े हमले का दावा किया.
- पाकिस्तान के अहम ग्वादर पोर्ट पर क्यों बार-बार होते है हमले. जो पाक के लिए अहम रहता है.
- बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के हमले में भी बड़े नुकसान का दावा किया गया है.
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आने वाले ग्वादर जिले के जिवानी इलाके में 3 जुलाई को बड़ा हमला हुआ. बलूच लिबरेशन आर्मी ने दावा किया कि उसने कोस्ट गार्ड्स के कैंप पर हमला किया है. जिसमें पाकिस्तान सेना के जवानों को मारे जाने का दावा किया था. ग्वादर पोर्ट के आस-पास के छोटे मछुआरा गांवों के परिवारों ने वही किया जैसा वह इस तरह के हमले के बाद हमेशा करते हैं. सभी लोग सुरक्षित जगह की तरफ भागे और रिश्तेदारों साथ मिलकर रहने का इंतजाम किया. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ग्वादर पोर्ट में ऐसा क्या है जिसके चलते यहां लगातार हमले होते हैं.
इतना अहम क्यों है ग्वादर पोर्ट
ग्वादर समुद्र के किनारे बसा एक शांत शहर लगता है. सुबह-सुबह मछुआरे जाल खींचते हैं, बच्चे समुद्र तट पर खेलते हैं, बकरियां धूल भरी सड़कों के पास चरती हैं. लेकिन यह एक ऐसी रणनीतिक जगह पर बसा है. जो पाकिस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी अहम रहता है. यहां से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर होर्मुज जलडमरूमध्य है. ईरान के कब्जे वाला होर्मुज दुनिया भर में तेल की ढुलाई के लिए एक अहम रास्ता माना जाता है. ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच दुनिया ने होर्मुज की अहमियत को और करीब से समझा है. इसी से लगा हुआ ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान के आर्थिक गलियारे का समुद्री सिरा है. बीजिंग के लिए यह बंदरगाह सामान और ऊर्जा के लिए एक छोटा वैकल्पिक रास्ता देता है, जबकि पाकिस्तान इसे व्यापार बढ़ाने और अपने दक्षिण-पश्चिमी तट पर नौसेना की मजबूत मौजूदगी बनाने के लंबे समय से प्रतीक्षित मौके के तौर पर देखता है. इतना सबकुछ होने के बाद भी यहां रहने वाले लोकल लोगों के लिए इसका ज्यादा फायदा नहीं है.
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यही असंतोष बलूचिस्तान के स्थानीय लोग और पाकिस्तान सरकार के बीच में गेप पैदा करता है. ग्वादर पोर्ट पर बाहरी दखल भी ज्यादा रहता है. जिससे असंतोष की खाई लगातार बढ़ती गई है. जिससे यहां लगातार हमले सामने आते हैं.
ग्वादर पर बलूचिस्तान के लोगों की सोच
ग्वादर और आस-पास के जिलों में रहने वाले स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें वे फायदे नहीं मिले जिनका वादा किया गया था. खदानें, पाइपलाइन और बंदरगाह उस जमीन पर बनाए गए हैं जो कभी मछली पकड़ने या छोटे खेतों के जरिए परिवारों का पेट पालती थी. स्थानीय नेता और आम नागरिक अक्सर खुद को दरकिनार किए जाने की भावना जाहिर करते हैं. संसाधन छीन लिए जाते हैं, नौकरियां बाहरी लोगों को दी जाती हैं और फैसले उनके गांवों से बहुत दूर लिए जाते हैं.
ग्वादर के एक दुकानदार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा यह उनका प्रोजेक्ट है, हमारा नहीं. हम टीवी पर विकास के बारे में सुनते हैं, लेकिन हमारे बच्चों को अभी भी नियमित काम नहीं मिल पाता. हम अलग-थलग महसूस करते हैं. हमारी इसी भावना का फायदा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन उठाते हैं. वे ग्वादर को इस बात के सबूत के तौर पर पेश करते हैं कि बाहरी लोग फायदा उठाते हैं जबकि स्थानीय लोग पीछे छूट जाते हैं.
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ग्वादर में बदल रहा हमलों का तरीका
ग्वादर में हमलों का तरीका भी बदल रहा है. पहले सड़क किनारे बम या घात लगाकर हमला होता था. अब उग्रवादी ज्यादा मुश्किल ऑपरेशन करते हैं. जैसे बंदरगाह की सुविधाओं, नौसेना की चौकियों और गश्ती नावों को निशाना बनाना. इतना ही नहीं ड्रोन का इस्तेमाल तक यहां होता है. उन्होंने समुद्र और हवा में काम करने वाली विंग्स बनाई हैं, जिससे पता चलता है कि वे पारंपरिक गुरिल्ला तरीकों से आगे बढ़कर लड़ाई का दायरा बढ़ाना चाहते हैं. शुक्रवार को कोस्ट गार्ड के एक मजबूत कैंप पर आत्मघाती ट्रक हमले से पता चलता है कि यह खतरा अभी भी बदलता रहता है और जानलेवा है.
क्या पाकिस्तान ने हमले रोक पा रहा है ?
पाकिस्तान सरकार लगातार हमलों को रोकने की कोशिश करती है. इस्लामाबाद ने चीनी कर्मचारियों और रणनीतिक प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के लिए एक खास सुरक्षा डिवीजन बनाया और पिछली घटनाओं के बाद ग्वादर के आस-पास सुरक्षा कड़ी कर दी थी. फिर भी उग्रवादी नए-नए टारगेट ढूंढते रहते हैं. अधिकारी कभी-कभी मदद के लिए विदेशी ताकतों को दोषी ठहराते हैं, लेकिन कई एनालिस्ट और खुद बलूच लोग कहते हैं कि इसकी जड़ें स्थानीय हैं. राजनीतिक उपेक्षा, कमजोर संस्थाएं और इलाके की दौलत में हिस्सेदारी न मिलना है.
ग्वादर पोर्ट से आम लोगों कितना फायदा ?
ग्वादर पोर्ट से आम लोगों कितना फायदा हुआ है, इसका जबाव मिला जुला मिलता है. इतने भारी निवेश के बाद भी सड़कें, रेल, बिजली प्रोजेक्ट, लेकिन कई प्लान तय समय से पीछे चल रहे हैं. कुछ तो कभी कागज से आगे ही नहीं बढ़ पाए और बंदरगाह पर कमर्शियल गतिविधियां भी धीमी रही हैं. अधिकारी तरक्की के तौर पर ग्वादर के जरिए ईरान तक ट्रांजिट कार्गो की इजाजत जैसे कदमों का जिक्र करते हैं. लेकिन ग्वादर के परिवारों के लिए सबसे जरूरी चीजे हैं. जिसमें पक्की नौकरियां, अच्छे स्कूल और अस्पताल और ऐसी सड़कें जो उन्हें मौकों से जोड़ें. केवल वादों से कुछ नहीं होता है.
क्या हालात बदल सकते हैं?
सवाल यह है कि क्या यहां के हालात बदल सकते हैं. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. अगर इस्लामाबाद और उसके पार्टनर चाहते हैं कि ग्वादर सिर्फ हेडलाइन या लड़ाई का मैदान न रहे, तो उन्हें स्थानीय लोगों का भरोसा जीतना होगा. इसका मतलब है साफ है कि स्थानीय लोगों के भरोसे के बिना यहां हमले रोकना मुश्किल है. इसके लिए स्थानीय कर्मचारियों को भी जोड़ना होगा. स्थानीय कर्मचारियों को ट्रेनिंग देना और नौकरी पर रखना, असल में कमाई में हिस्सेदारी, बेहतर स्कूल और क्लिनिक के साथ प्लानिंग और गवर्नेंस में जब तक साथ नहीं होगा तब तक यहां हमले रोकना मुश्किल है.
ग्वादर के लोगों के लिए, स्थिरता कोई अमूर्त लक्ष्य नहीं है. यह बिना किसी अचानक हिंसा की चिंता के बच्चे को स्कूल भेजने, बिना चेकपॉइंट्स की रुकावट के उन्हीं पानी में मछली पकड़ने और आखिरकार यह महसूस करने का मौका है कि शहर का भविष्य उनका है.
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