Opinion: सिंधु जल संधि को लेकर मुनीर-शहबाज बेचैन, पाकिस्तान को मान लेना चाहिए कि दाल अब गलने वाली नहीं
पाकिस्तान के गुस्से और बौखलाहट से भारत पर कोई असर नहीं पड़ा है और न ही संधि पर अपने स्टैंड पर दोबारा सोचा है. अगर इस्लामाबाद पानी पाने के लिए धमकी देने की कोशिश कर रहा है, तो वह पहले ही फेल हो चुका है.
नब्बे के दशक की शुरुआत से ही जब पाकिस्तान खुलेआम भारत में आतंकवाद के कांटे बो रहा था, तब भारतीय रणनीतिकारों के एक धड़े का मानना था कि भारत को पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए 'सिंधु जल समझौते' (IWT) को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहिए. लेकिन उस दौर की सरकारों ने इस विकल्प पर सोचने पर भी गुरेज किया. अब इसे आप तब की सरकार की बुजदिली कहें या फिर उसकी पारंपरिक संजीदगी और एहतियात बरतने की पुरानी आदत. सच तो यह भी था कि उस जमाने में भारत पर पश्चिमी देशों का भारी दबाव रहता था, जो पाकिस्तान की हर नापाक हरकत को नजरअंदाज कर उसे शह देते थे. लिहाजा, तब फूंक-फूंक कर कदम रखने के फैसले को जायज ठहराया जा सकता था.
मगर आज वक्त बदल चुका है. पिछले एक दशक में पाकिस्तानी आतंकवाद को लेकर भारत के सब्र का बांध अब टूट चुका है. अब भारत ने दुनिया के नक्शे पर वो आर्थिक और कूटनीतिक रुतबा हासिल कर लिया है कि अब उसे दबाना मुमकिन नहीं. ऊपर से एक बात ये भी है कि मौजूदा सरकार रिस्क लेने से जरा भी नहीं हिचकिचाती है.
2019 के पुलवामा हमले के बाद ही भारत इस समझौते को सस्पेंड करने का मन बना चुका था, लेकिन तब जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक सुधार (धारा 370 हटाना) पहली प्राथमिकता बन गए. हालांकि, इस समझौते की बुनियाद को हिलाने का काम तभी शुरू हो गया था. छह साल बाद पाकिस्तान ने खुद भारत को एक और मौका दे दिया, जब उसके पाले हुए लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों ने पहलगाम में बेगुनाहों का कत्लेआम कर दिया. यह नरसंहार भारत के लिए 'टिपिंग पॉइंट' यानी सब्र की आखिरी सीमा साबित हुआ और भारत ने वो कर दिखाया जिसकी पाकिस्तान ने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी.
पहले घमंड में बोला, अब गीदड़भभकी
अपनी पुरानी आदत के मुताबिक, पाकिस्तान ने शुरुआत में भारत के इस कदम को हल्के में लेने की कोशिश की. पाकिस्तानी फौज के बड़बोले प्रवक्ता ने हमेशा की तरह ऊंची आवाज में शेखी बघारते हुए कहा कि अगर भारत ने पाकिस्तान का पानी रोका, तो पाकिस्तान भारत का 'गला घोंट' देगा. इस्लामाबाद से यह राग भी अलापा गया कि इस समझौते से छेड़छाड़ को एक्स ऑफ वॉर यानी 'जंग का ऐलान' माना जाएगा.
लेकिन जैसे-जैसे हफ्ते और महीने गुजरे, पाकिस्तान को जमीनी हकीकत का अहसास होने लगा, खासकर पिछले साल पंजाब में आई भयंकर बाढ़ के बाद. बाढ़ से पहले तक पाकिस्तान के तथाकथित 'एक्सपर्ट' टीवी चैनलों पर बैठकर दावा कर रहे थे कि भारत ज्यादा से ज्यादा पानी का डेटा शेयर करना बंद कर सकता है, जिसे पाकिस्तान कहीं और से भी हासिल कर लेगा.
उनका दावा था कि भारत के पास नदियों के रुख को मोड़ने या पानी को रोकने का बुनियादी ढांचा ही नहीं है. लेकिन पंजाब की तबाही ने इन सारे दावों की हवा निकाल दी. बाढ़ के कुछ ही हफ्तों के भीतर पाकिस्तान ने देखा कि चिनाब नदी में पानी का बहाव बेकाबू हो गया है. तब जाकर पाकिस्तान को समझ आया कि भारत ने नदियों पर जो 'रन-ऑफ-रिवर' (बहते पानी से बिजली बनाने वाले) डैम बनाए हैं, उनके जरिए भी वह पानी के बहाव को इस कदर नियंत्रित कर सकता है कि पाकिस्तान पानी-पानी हो जाए, क्योंकि पाकिस्तान के पास इस पानी को जमा करने के लिए जरूरी रिजर्वायर ही नहीं हैं.
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुंह की खाई
उसी दौरान अमेरिका के तुनकमिजाजी राष्ट्रपति के आने से पाकिस्तान खुद को उनका नया 'BFF' (पक्का दोस्त) समझने लगा था. उसे लगा कि उसकी कूटनीतिक साख बढ़ गई है और वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेर लेगा. पाकिस्तान इस मामले को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में ले गया और वहां से अपने पक्ष में कुछ फैसले भी करा लाया. लेकिन भारत ने इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को ही मानने से साफ इनकार कर दिया और उसके फैसलों को नजरअंदाज कर दिया.
इसके बाद से बदहवास पाकिस्तान कभी परमाणु युद्ध की धमकी देता है, कभी भारत के हाथ काटने की बात करता है, तो कभी कोई और अजीबोगरीब खौफनाक राग अलापने लगता है. अपनी बात मनवाने के लिए पाकिस्तान ने अपने बड़े अफसरों को पश्चिमी देशों के दौरों पर भेजा ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके, लेकिन दुनिया ने उसकी एक न सुनी. यहां तक कि इस समझौते में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले वर्ल्ड बैंक ने भी इस मामले में अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं.
झूठा नैरेटिव बनाने की नाकाम कोशिश
पाकिस्तान ने अपनी साख बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस आयोजित कीं, सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी मुहिम चलाईं और पंजाबी और अंग्रेजी टीवी चैनल तक लॉन्च कर दिए, लेकिन उसके सारे तीर हवा में ही रह गए.
हालात ये हैं कि पाकिस्तानी हुक्मरान खुद को ही तसल्ली देने के लिए प्रोपेगैंडा चला रहे हैं. दुनिया को दिखाने के लिए उन्होंने चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के पिट्ठू विक्टर गाओ और कुछ गुमनाम रूसी प्रोफेसरों को अपने मंचों पर बिठाया, ताकि लगे कि भारत पर कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय दबाव है. लेकिन ऐसे लोगों की बातों का वैश्विक बिरादरी में कोई वजन नहीं है.
पाकिस्तान की दलीलों में वैसे भी कोई दम नहीं है. मिसाल के तौर पर, पाकिस्तान भारत पर 'पानी को हथियार' बनाने का इल्जाम लगाता है. लेकिन हकीकत यह है कि पानी हमेशा से एक हथियार रहा है, खुद पाकिस्तान ने भारत की सीमा पर जो 'बंध-कम-डिच' (नहर और खाइयां) का डिफेंस सिस्टम बनाया है, वो पानी का सैन्य इस्तेमाल ही है.
पाकिस्तान ने चीनी सरकार का दरबारी विक्टर गाओ के जरिए धमकी दिलवाई कि चीन भारत आने वाली नदियों पर बांध बनाना शुरू कर देगा. मगर सच तो यह है कि चीन पहले से ही ब्रह्मपुत्र और बाकी नदियों पर गुपचुप तरीके से बांध बना रहा है और उसने कभी भारत को इसकी जानकारी देना या डेटा साझा करना जरूरी नहीं समझा. हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान ने चीन की तरफ सिंधु, सतलुज या ब्रह्मपुत्र पर बनाए जा रहे इन बांधों पर कभी एक शब्द तक नहीं कहा है.
धमकियों से बाज आए पाकिस्तान, अब दाल नहीं गलने वाली
पाकिस्तान की इस छटपटाहट और ड्रामेबाजी का भारत पर कोई असर नहीं होने वाला. भारत का रुख बिल्कुल साफ है कि पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है, उसने इस समझौते की सबसे बुनियादी शर्त यानी अच्छे और दोस्ताना माहौल की भावना का कत्ल कर दिया है. इसलिए भारत अब इस समझौते को मानने के लिए कतई मजबूर नहीं है.
यह उन लोगों के लिए भी एक साफ सबक है जो भारत और पाकिस्तान में बैठकर यह वकालत करते हैं कि यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता की गारंटी है. इतिहास गवाह है कि इस समझौते के रहते हुए भी पाकिस्तान ने भारत पर दो बड़ी जंगें और कई छोटी लड़ाइयां थोपी थीं.
लिहाजा, पानी को एक दबाव के मोहरे की तरह इस्तेमाल करना ही शायद पाकिस्तान की सेना के ढीठ जनरलों के दिमाग को ठिकाने लगाने का इकलौता जरिया है.
जमीनी हकीकत यह है कि भले ही यह समझौता कागजों पर अभी 'अधर' में है, लेकिन व्यावहारिक रूप से पुराना समझौता हमेशा के लिए खत्म हो चुका है. भारत का स्टैंड बिल्कुल सीधा है कि यह समझौता तभी बहाल हो सकता है जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ काम कर रहे जिहादी और आतंकवादी ढांचे को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दे. और अगर कल को यह बहाल होता भी है, तो इसे आज की टेक्नोलॉजी और पर्यावरण के बदलते हालात के हिसाब से दोबारा लिखा जाएगा.
इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान पहले जिस तरह इस समझौते की कमियों का फायदा उठाकर भारत के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में अड़ंगे लगाता था, वो अब मुमकिन नहीं होगा. पाकिस्तान के हलक में जान इसलिए अटकी हुई है क्योंकि भारत ने उसकी मर्जी के बिना 'पश्चिमी नदियों' पर नए प्रोजेक्ट्स और पुराने बांधों के नवीनीकरण का काम ताबड़तोड़ शुरू कर दिया है.
खुद का खोदा हुआ कुआं
पाकिस्तान के पास अपनी हरकतों को सुधारने और बातचीत की मेज पर आने का यह आखिरी मौका है. परमाणु हमले की गीदड़भभकियों से यह समझौता वापस अमल में नहीं आने वाला है. भारत इस समझौते को कुछ जरूरी बदलावों के साथ बहाल करने को तैयार है, लेकिन अगर पाकिस्तान ने अपनी पुरानी जिद और जंग की रट नहीं छोड़ी, तो वह इस मौके को भी गंवा देगा. फिर उसके सामने भारत के नए बांध और नए प्रोजेक्ट्स एक ऐसी सच्चाई बनकर खड़े होंगे, जिसे वह चाहकर भी नहीं बदल पाएगा.
लेकिन पाकिस्तान का जो मिजाज है, उसे देखते हुए लगता है कि वह पहले अंतरराष्ट्रीय अदालतों का चक्कर काटेगा, फिर भारत में छद्म युद्ध भड़काने की कोशिश करेगा. जब ये दोनों रास्ते बंद हो जाएंगे, तब वह भारत में मौजूद अपने हमदर्दों के जरिए कूटनीतिक बातचीत की भीख मांगेगा.
भारत को पाकिस्तान की इस छटपटाहट से निपटने के लिए सैन्य और सुरक्षा के मोर्चे पर पूरी तरह मुस्तैद रहना होगा. मुमकिन है कि अपनी बदहाली और मायूसी में पाकिस्तान बहुत जल्द 'ऑपरेशन सिंदूर 2.0' जैसी किसी नापाक हिमाकत को अंजाम देने की कोशिश करे. लेकिन इस्लामाबाद को यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि इस बार भारत सिर्फ समझौते को सस्पेंड नहीं करेगा, बल्कि सिंधु जल समझौते को हमेशा के लिए फाड़कर इतिहास के मलबे में दफन कर देगा.
(लेखक ORF में एक वरिष्ठ फेलो हैं)
अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं.
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