- पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने इलेक्शन अमेंडमेंट बिल पास कर सांसदों की संपत्ति गोपनीय रखने का प्रावधान किया है
- नए संशोधन के तहत नेता लिखित प्रमाण देने पर संपत्ति विवरण सार्वजनिक न करने का आदेश मिल सकता है
- चुनाव आयोग ने 159 सांसदों की सदस्यता संपत्ति विवरण न देने पर निलंबित कर दी थी, लेकिन बिल से बचाव किया गया
पाकिस्तान, जो इन दिनों पाई-पाई के लिए मोहताज है, वहां की सत्ता में बैठे लोगों ने अपनी ही जनता से बचने के लिए एक नया और शर्मनाक 'सुरक्षा कवच' तैयार कर लिया है. पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 'इलेक्शन अमेंडमेंट बिल, 2026' पास कर दिया है. यह बिल किसी सुधार के लिए नहीं, बल्कि सांसदों की अगाध संपत्ति को जनता की नजरों से दूर रखने के लिए लाया गया है.सीधे शब्दों में कहें तो, पाकिस्तान सरकार अपनी ही उस जनता से डर गई है, जिसके सामने वे कल तक वोट के लिए हाथ फैलाते थे.
अजीब तर्क: वोट देने वाली जनता ही बनी 'खतरा'
नए संशोधन (धारा 138) के तहत, यदि कोई नेता लिख कर दे दे कि उसकी संपत्ति सार्वजनिक होने से उसकी "जान को खतरा" है, तो नेशनल असेंबली का अध्यक्ष या सीनेट का चेयरमैन उसे गोपनीय रखने का आदेश दे सकता है. अब सवाल उठना तो लाजिमी हैं कि चुनाव के वक्त जनता के बीच जाने वाले इन नेताओं को अब अपनी संपत्ति दिखाने में जनता से ही डर क्यों लग रहा है? क्या ईमानदारी की कमाई सार्वजनिक करने से जान को खतरा होता है, या खतरा इस बात का है कि बदहाल पाकिस्तान की 'कंगाल' जनता को उनके प्रतिनिधियों की 'अमीरी' का सच पता चल जाएगा?
जब कानून का डर लगा, तो कानून ही बदल दिया!
इस बिल को लाने की टाइमिंग किसी फिल्मी कॉमेडी से कम नहीं है. ठीक एक हफ्ते पहले पाकिस्तान चुनाव आयोग (ECP) ने 159 सांसदों की सदस्यता इसलिए सस्पेंड कर दी थी क्योंकि उन्होंने अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया था. इन 'माननीयों' ने अपनी गलती सुधारने के बजाय रास्ता ही बदल दिया. उन्होंने कानून में ही ऐसा छेद कर दिया कि अब न विवरण सार्वजनिक होगा और न ही उनकी कुर्सी पर कोई आंच आएगी. इस सूची में सिंध के पूर्व मुख्यमंत्री कायम अली शाह और संघीय मंत्री मुसादिक मलिक जैसे रसूखदार नाम शामिल थे, जिन्हें बचाने के लिए यह 'बैकडोर' रास्ता निकाला गया.
पारदर्शिता के ताबूत में आखिरी कील
लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की संपत्ति का एक-एक पैसा जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए. लेकिन पाकिस्तान में 'उल्टी गंगा' बह रही है:
- गोपनीयता का कवच: अब नेताजी की तिजोरी 'टॉप सीक्रेट' रहेगी.
- जनता का हक खत्म: जिस जनता के टैक्स से ये नेता वेतन और शाही सुविधाएं लेते हैं, उसी जनता से यह हक छीन लिया गया है कि वह अपने प्रतिनिधियों की आर्थिक स्थिति जान सके.
जनता की आंखों में धूल और सत्ता का अहंकार
पाकिस्तान की आम जनता इस समय महंगाई और कंगाली की दोहरी मार झेल रही है. ऐसे में नेताओं का अपनी संपत्ति छिपाने के लिए कानून बनाना यह साबित करता है कि सरकार को जनता की समस्याओं से ज्यादा अपनी 'साख' और 'दौलत' बचाने की चिंता है. 'सुरक्षा' का हवाला देना महज एक पर्दा है, जिसके पीछे जवाबदेही से भागने की कोशिश की जा रही है.अगर अपनी ही जनता से इतना डर है कि उन्हें सच नहीं बताया जा सकता, तो इसे 'जनता की सरकार' कहना लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा मज़ाक है. यह वाकई देश की जनता के साथ विश्वासघात है.
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