अंतरिक्ष मिशन Artemis II के तहत लौट रहा Orion capsule जब पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल हुआ, तो आसमान में एक चमकता हुआ 'आग का गोला' नजर आया. यह नजारा जितना रोमांचक था, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी. क्योंकि इसी चरण में मिशन की सफलता या विफलता तय होती है. लेकिन तय प्रोटोकॉल, सटीक इंजीनियरिंग और वर्षों की तैयारी ने इस जोखिम भरे चरण को सफलतापूर्वक पार करा दिया.
री-एंट्री: सबसे खतरनाक लेकिन अहम चरण
The crew module on Orion has separated from its service module. After traveling around the Moon, seeing its far side, and experiencing a solar eclipse, the Artemis II astronauts are on the last leg of their trip home. pic.twitter.com/j9u5j1Noi9
— NASA (@NASA) April 10, 2026
अंतरिक्ष से लौटते वक्त कैप्सूल की रफ्तार करीब 35,000 से 40,000 किमी/घंटा तक होती है. जैसे ही यह पृथ्वी के घने वायुमंडल से टकराता है, घर्षण के कारण तापमान 2700°C से भी ऊपर पहुंच जाता है. इसी वजह से कैप्सूल के चारों ओर प्लाज़्मा की परत बन जाती है, जो उसे कुछ मिनटों के लिए 'आग के गोले' जैसा बना देती है. इस दौरान कम्युनिकेशन ब्लैकआउट भी होता है, यानी कुछ मिनटों तक ग्राउंड कंट्रोल से संपर्क टूट जाता है. लेकिन Orion का एडवांस्ड हीट शील्ड, जिसे विशेष एब्लेटिव मटेरियल से बनाया गया है. इस भीषण गर्मी को सहते हुए अंदर मौजूद सिस्टम और संभावित क्रू को पूरी तरह सुरक्षित रखता है.
पैराशूट सीक्वेंस: सटीक टाइमिंग का खेल
Orion's main parachute has deployed. The spacecraft has a system of 11 chutes that will slow it down from around 300 mph to 20 mph for splashdown.
— NASA (@NASA) April 11, 2026
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री-एंट्री के बाद कैप्सूल की स्पीड धीरे-धीरे कम की जाती है. इसके लिए मल्टी-स्टेज पैराशूट सिस्टम काम करता है. पहले छोटे ड्रोग पैराशूट खुलते हैं, जो कैप्सूल को स्थिर करते हैं. फिर तीन बड़े मेन पैराशूट खुलते हैं, जो स्पीड को सुरक्षित स्तर तक ले आते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में टाइमिंग और एंगल बेहद अहम होते हैं. थोड़ी सी भी गड़बड़ी लैंडिंग को खतरनाक बना सकती है. सफल सीक्वेंस के बाद Orion कैप्सूल ने प्रशांत महासागर में तय लोकेशन के पास स्मूद स्प्लैशडाउन किया.

जब समुद्र की सतह से टच हुआ Orion capsule
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समुद्र में ऑपरेशन: नेवी का हाई-टेक रेस्क्यू
कैप्सूल के पानी में उतरते ही United States Navy की स्पेशल रिकवरी टीम एक्टिव हो गई. पहले हेलिकॉप्टर ने ऊपर से विजुअल कन्फर्मेशन लिया. डाइवर्स पानी में उतरे और कैप्सूल को स्टेबल किया. इसके बाद विशेष केबल और उपकरणों की मदद से उसे रिकवरी शिप तक खींचा गया. अंतरिक्षयात्रियों को समुद्र से लाने के लिए NASA ने USS John P. Murtha का इस्तेमाल किया.
दरअसल USS John P. Murtha एक Amphibious Transport Dock (LPD) जहाज है. यह मुख्य रूप से मरीन्स को समुद्र से लेकर जमीन तक ले जाने के लिए बनाया गया है, लेकिन अब इसे नासा के आर्टेमिस मिशन के लिए स्पेशल रिकवरी शिप के रूप में चुना गया है. जहाज की लंबाई लगभग 684 फीट है. इसमें कई खास सुविधाएं हैं जो स्पेसक्राफ्ट रिकवरी के लिए बहुत उपयोगी हैं.
यह पूरा ऑपरेशन मिनट-टू-मिनट प्लानिंग पर आधारित होता है, क्योंकि समुद्र की लहरें, हवा और मौसम लगातार चुनौती पेश करते हैं.

जब US नेवी ने कैप्सूल पर लिया कंट्रोल
क्यों मील का पत्थर है Artemis II?
NASA का Artemis प्रोग्राम इंसानों को फिर से चंद्रमा पर भेजने की महत्वाकांक्षी योजना है. Artemis II को मानवयुक्त मिशन के रूप में डिजाइन किया गया है (हालांकि इस तरह के टेस्ट और रिकवरी प्रोसेस हर मिशन के लिए क्रिटिकल होते हैं). यह मिशन भविष्य के Artemis III की नींव रखता है, जिसमें इंसानों को चंद्रमा की सतह पर उतारने का लक्ष्य है. लंबे समय में यही प्रोग्राम चंद्रमा पर स्थायी बेस और फिर मंगल मिशन का रास्ता खोल सकता है.
तकनीक की परीक्षा
री-एंट्री, पैराशूट डिप्लॉयमेंट और समुद्री रिकवरी. ये तीनों फेज किसी भी स्पेस मिशन के सबसे जोखिम भरे हिस्से होते हैं. Artemis II ने इन सभी चरणों को सफलतापूर्वक पार कर यह साबित कर दिया कि आधुनिक स्पेस टेक्नोलॉजी अब पहले से कहीं ज्यादा विश्वसनीय और सुरक्षित हो चुकी है.
आग के गोले जैसी खौफनाक दिखने वाली वापसी दरअसल विज्ञान और इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी जीत है. Orion कैप्सूल का सुरक्षित स्प्लैशडाउन सिर्फ एक लैंडिंग नहीं, बल्कि इंसान की चांद और उससे आगे की यात्रा की दिशा में मजबूत कदम है.
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