अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे दौर की हुकूमत में वॉशिंगटन दो हिस्सों में बंटा नजर आता है. ऊपर वाला तबका लगातार मुश्किलें पैदा करता है, जबकि दूसरा तबका उन्हें संभालने और सुधारने की कोशिश में लगा रहता है.
विदेश मंत्री और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र मार्को रूबियो अपनी पहली भारत यात्रा पर 'मिस्टर फिक्स इट' की भूमिका में पहुंचे हैं. उनकी कोशिश होगी कि भारत की असहजता कम हो और यह एहसास दोबारा पैदा हो कि भारत अमेरिका के लिए अब भी कई अहम जियोपॉलिटिकल वजहों से मायने रखता है, भले ही पिछले एक साल में ऐसा महसूस नहीं हुआ हो. इसके साथ ही ट्रेड पर भी बात होगी. ट्रंप की ईरान के खिलाफ जंग जैसी पॉलिसी से पैदा हुए गंभीर ऊर्जा संकट में फंसे भारत को ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी और वेनेजुएला का तेल बेचने का मुद्दा भी एजेंडे में शामिल है.
कुछ चुनिंदा कैबिनेट मंत्रियों का काम पुराने दोस्ताना रिश्तों की गर्माहट को फिर से जिंदा करना, अतीत को नए अंदाज में पेश करना और ट्रंप के अंदाज़ में भविष्य को बेचने जैसा है. उन्हें एहसास है कि अमेरिका को अब भी दोस्तों और साझेदारों की जरूरत है, चाहे उनके नेता को ऐसा महसूस न होता हो. ट्रंप की असली तवज्जो तो उन लोगों को मिलती है जो ताकतवर और सख्त छवि वाले हों.
इसी मरम्मत और रिश्तों को संभालने वाली सोच के साथ 23 से 26 मई तक होने वाली रुबियो की भारत यात्रा को देखा जाना चाहिए. इस दौरान वह कोलकाता, जयपुर, आगरा और दिल्ली जाएंगे. उन्हें महसूस होगा कि ट्रंप के साथ गुजरे इस मुश्किल साल में भारतीय डिप्लोमैट्स ने भावनात्मक रवैया छोड़ दिया है. अब माहौल काफी सख्त और प्रैक्टिकल हो चुका है. बड़े-बड़े जज़्बाती पैगाम, गैर-हकीकी वादे और धुंधली उम्मीदों की जगह अब ठोस रवैये और डिगा न पाने वाली सोच ने ले ली है.
सवाल यह है कि क्या रुबियो रिश्तों में खींची डोर को ढीला कर पाएंगे और भरोसा दोबारा कायम कर सकेंगे?
रुबियो ने यूरोप को भरोसा दिलाने में अच्छी भूमिका निभाई थी, खास तौर पर तब जब उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक साल पहले उसी मंच से यूरोपीय देशों को फ्री स्पीच दबाने और बेलगाम इमिग्रेशन पर जमकर खरी-खोटी सुनाई थी.
रुबियो ने यूरोप को अपने अंदाज से प्रभावित किया और कॉलोनियलिज्म, साम्राज्यों और मिशनरियों की तारीफ भी की, लेकिन दुनिया के उन हिस्सों में इस पर सवाल उठे जो कभी उपनिवेश रहे हैं. भारत में उनकी कोशिशें ज्यादा नपी-तुली होंगी, क्योंकि वह शब्दों का इस्तेमाल काफी सलीके से करते हैं.
रुबियो के पास दो अहम जिम्मेदारियां हैं और इसी वजह से वह किसी भी दूसरे कैबिनेट मंत्री से ज्यादा वक्त व्हाइट हाउस में बिताते हैं. इसलिए दिल्ली में होने वाली बातचीत असली और गंभीर मानी जा रही है.
वह रक्षा सहयोग, व्यापार, ईरान जंग, ऊर्जा संकट, पाकिस्तान, चीन पर बात करेंगे. रुबियो अपनी यात्रा के आखिरी दिन क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी हिस्सा लेंगे. भले ही ट्रंप खुद इस समूह में ज्यादा दिलचस्पी न दिखाते हों. इसमें भारत के एस जयशंकर, ऑस्ट्रेलिया की पेनी वॉन्ग और जापान के तोशिमित्शू मोटेगी शामिल होंगे.
क्वाड की अहमियत दिखाने के लिए रुबियो शायद यह बात याद दिलाएं कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनका पहला आधिकारिक कार्यक्रम वही था, जब उन्होंने ट्रंप के शपथ ग्रहण के दौरान वॉशिंगटन में मौजूद क्वाड मंत्रियों की बैठक बुलाई थी.
इसके बावजूद, क्वाड नेताओं की बैठक अब तक न हो पाना सवाल खड़े करता है, खासकर तब जब ट्रंप का चीन के प्रति रवैया काफी नरम माना जा रहा है. दरअसल, ट्रंप के पहले कार्यकाल में क्वाड को दोबारा सक्रिय करने का मकसद चीन के इर्द-गिर्द लोकतांत्रिक देशों की एक सुरक्षा दीवार खड़ी करना और छोटे एशियाई देशों को विकल्प देना था.
पाकिस्तान का मुद्दा भी आधिकारिक बातचीत में उठेगा. रुबियो को फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की इस्लामी, खतरनाक, बांटने वाली और भारत विरोधी शख्सियत पर विस्तार से जानकारी दी जाएगी.
लेकिन इससे अमेरिकी सोच में बदलाव आए, इसकी उम्मीद कम है, क्योंकि पहले भी ऐसा नहीं हुआ. ट्रंप उनसे प्रभावित हैं और शायद आगे भी रहेंगे.
आखिर में बात यह है कि पाकिस्तान और चीन को लेकर अमेरिकी नीतियों ने मुश्किलें जरूर पैदा की हैं, लेकिन भारत-अमेरिका रिश्ते आगे बढ़ते रहेंगे क्योंकि दोनों देशों को इस साझेदारी में असली फायदा नजर आता है. फिलहाल 'सबसे खास दोस्त' वाला एहसास जरूर कम हो गया है.
(सीमा सिरोही कॉलमनिस्ट हैं और वॉशिंगटन डीसी में रहती हैं. आप 'Friends With Benefits: The India-US Story' की लेखिका हैं. यह किताब पिछले 30 सालों में भारत-अमेरिका रिश्तों की कहानी बयां करती है.)
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं