अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को जो जंग शुरू हुई थी, वह अब खत्म हो गई है. बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साइन कर दिए. इसके साथ ही यह समझौता अब लागू हो गया है. अमेरिका-ईरान में डील साइन होना दुनिया के लिए सबसे बड़ी राहत की बात है, क्योंकि लगभग 4 महीने से बंद पड़ा होर्मुज स्ट्रेट अब दोबारा खुल गया है.
दोनों मुल्कों के बीच जिस 14 पॉइंट पर MoU साइन हुआ है, उसके 5वें पॉइंट में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने की बात है. इस पॉइंट में होर्मुज को 60 दिन तक तो टोल-फ्री रखने की बात लिखी गई है, लेकिन भविष्य में टोल लगाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया गया है.
MoU का 5वां पॉइंट क्या है?
5वें पॉइंट में तीन बड़ी बातें हैं, जो होर्मुज का भविष्य तय करेंगी. पहली- यह पॉइंट कहता है कि 'MoU पर साइन होने के बाद कमर्शियल जहाज बिना किसी टोल के सिर्फ 60 दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान सागर और ओमान सागर से फारस की खाड़ी तक आ-जा सकेंगे.'
- इसका मतलब: इस लाइन का मतलब तो यही हुआ कि 60 दिन तक होर्मुज से गुजरने वाले रास्तों पर कोई टोल नहीं लगाया जाएगा.
इसी पॉइंट में दूसरी बड़ी बात यह है- 'जहाजों की आवाजाही तुरंत शुरू हो जाएगी, लेकिन रास्ते में जो टेक्निकल और मिलिट्री रुकावटें हैं और बारूदी सुरंगे हैं, उन्हें ईरान 30 दिन में हटाएगा.'
- इसका मतलब: जंग के दौरान ईरान ने समुद्री रास्ते में जगह-जगह माइंस बिछा दी थीं. इन्हें हटाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है.
और तीसरी बड़ी बात जो काफी अहम है, वह है- 'ईरान ओमान के साथ बातचीत करेगा और तय करेगा कि होर्मुज स्ट्रेट का आगे का मैनेजमेंट कैसे होगा. इसमें फारस की खाड़ी से सटे देशों के साथ भी चर्चा होगी. सब कुछ अंतरराष्ट्रीय कानून और होर्मुज के तटीय देशों के संप्रभु अधिकारों को ध्यान में रखकर होगा.'
- इसका मतलब: 60 दिन बाद ईरान और ओमान मिलकर तय करेंगे कि होर्मुज से जहाज कैसे गुजरेंगे. यानी, दोनों चाहेंगे तो टोल देना होगा.
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...तो अब क्या करेगा ईरान?
अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस MoU से अब इतना तो साफ हो गया है कि 28 फरवरी से पहले तक जो हालात थे, अब वैसे तो बिल्कुल नहीं रहेंगे. खासकर होर्मुज पर तो बिल्कुल भी नहीं.
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गलिबाफ ने साफ कर दिया है कि 60 दिन के बाद ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से चार्ज वसूलेगा. सरकारी टीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'होर्मुज अब युद्ध से पहले की स्थिति में नहीं लौटेगा.'
उन्होंने आगे कहा, 'होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का संप्रभुता का अधिकार है और जाहिर है कि हम सर्विस के लिए फीस लेंगे.'
🇮🇷 Ghalibaf says fees will be imposed in the Strait of Hormuz, stating that hostile actions have turned Iran's potential in the area into reality and that charges will be collected in exchange for the services provided. pic.twitter.com/54cFYUIZCf
— WAR (@warsurv) June 17, 2026
'टोल' नहीं 'फीस' लेगा ईरान!
ईरान का कहना है कि वह 'टोल' नहीं, बल्कि 'सर्विस फीस' लेगा. पैसा दोनों में देना है लेकिन शब्दों के कारण मतलब बदल जाता है.
टोल को आमतौर पर एक जरूरी चार्ज के तौर पर समझा जाता है, जो सिर्फ इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि कोई जहाज किसी खास जगह से गुजरना चाहता है. वहीं, सर्विस फीस बिल्कुल अलग तरीके से काम करती है. इसका मकसद जहाज को दी गई किसी खास सर्विस या ऑपरेशनल सपोर्ट के बदले पैसा लेना है.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने तस्नीम न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कहा कि ईरान होर्मुज का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर टोल लगाने की बजाय सर्विस फीच लगाएगा. यह फीस जरूरी सर्विसेस, जैसे- नेविगेशन में मदद, पर्यावरण संरक्षण के उपाय, जहाज का बीमा और बाकी मैरिटाइम सर्विसे के खर्च को पूरा करने के लिए होगी.
उन्होंने कहा, 'हमने हमेशा यही कहा है कि हम ट्रांजिट टोल वसूलना नहीं चाहते हैं. सर्विस फीस केवल दी जाने वाली सर्विसेस की लागत को पूरा करने के लिए ही लिया जाएगा.'
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ऐसा हुआ तो इसका असर क्या होगा?
अब लगभग साफ हो गया है कि 60 दिन बाद होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को पैसा देना ही होगा.
अल-जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज के रास्ते से रोजाना 120 से 140 जहाज गुजरते थे. इनमें आधे से ज्यादा जहाजों में 2 करोड़ बैरल तेल होता था. अब तक इन जहाजों को होर्मुज से गुजरने पर कोई पैसा नहीं देना पड़ता था लेकिन दो महीने बाद देना होगा.
भारत पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा. वह इसलिए क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80 से 85% कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. इसके अलावा, 60% LPG भी आयात करता है. भारत की जरूरत का जितना कच्चा तेल आता था, उसमें से 30% होर्मुज के रास्ते से आता है. जबकि, 60% LPG में से 90% यहीं से आती है. इसके अलावा, 30% LNG भी होर्मुज के रास्ते ही आती है.
पिछले आंकड़ों से तुलना कर एक अनुमान लगाया जाए तो भारत ने 2025-26 में 24.57 करोड़ बैरल कच्चा तेल आयात किया, जिसमें से अनुमानित 7.37 करोड़ बैरल होर्मुज के रास्ते से आया. इसी तरह 2025-26 में 2.12 करोड़ मीट्रिक टन LPG आयात की थी, जिसमें से 1.90 करोड़ मीट्रिक होर्मुज के रास्ते से आई.
अगर होर्मुज पर ईरान सर्विस फीस लगाता है तो भारत के इम्पोर्ट बिल पर बड़ा असर पड़ सकता है. 2025-26 में भारत ने लगभग 11 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल इम्पोर्ट किया था. अब अगर होर्मुज पर सर्विस फीस लगती है तो अनुमानित 7 से 8 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है. इम्पोर्ट बिल बढ़ने से डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर हो सकता है, क्योंकि ये सारी पेमेंट डॉलर में ही होती है.
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