साल 2018 की 8 मई को डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के डिप्लोमैटिक रिसेप्शन रूम से दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया था. अपने 12 मिनट के आक्रामक भाषण में उन्होंने बराक ओबामा के कार्यकाल में हुई 'ईरान न्यूक्लियर डील' (JCPOA) से अमेरिका को बाहर कर लिया था. उस वक्त ट्रंप ने इसे अब तक का सबसे खराब और एकतरफा समझौता बताया था. उनका कहना था कि इस डील से कभी शांति नहीं आ सकती.
अब वक्त का पहिया घूम चुका है. साल 2026 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद ईरान के साथ एक नए समझौते की टेबल पर हैं. उनकी टीम का दावा है कि यह नया समझौता ओबामा के दौर की डील से कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत है. दोनों देशों ने हाल ही में 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU)' पर दस्तखत किए हैं, जो मध्य पूर्व में पिछले 110 दिनों से चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए 14 सूत्रीय खाका तैयार करता है. लेकिन सवाल उठता है कि नई डील वाकई बराक ओबामा की डील से अलग है या सिर्फ पुरानी डील की ही रंगाई पुताई की जा रही है?
ओबामा के वक्त पर हुआ JCPOA एक मुकम्मल और विस्तृत समझौता था. इसे तैयार करने में 18 महीने का लंबा वक्त लगा था और यह 150 से ज्यादा पन्नों का था. इसमें ईरान के परमाणु सेंट्रीफ्यूज की सीमा, कड़े निरीक्षण और टेक्निकल प्रोटोकॉल की बारीक जानकारियां थीं. इसके अलावा, इसमें अमेरिका और ईरान के साथ-साथ चीन, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे वैश्विक दिग्गज भी शामिल थे.

Photo Credit: US Dept of State
परमाणु हथियार न बनाने का संकल्प
दोनों ही समझौतों में एक बात समान है ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा. ओबामा की डील में इसके नियम बहुत सख्त थे, जिसके तहत ईरान को अपना 97 फीसदी यूरेनियम देश से बाहर भेजना पड़ा था और संवर्धन की सीमा 3.67 प्रतिशत तय की गई थी. उस समय ईरान का परमाणु कार्यक्रम आज जितना आधुनिक नहीं था.
आज यानी 2026 में हालात बिल्कुल बदल चुके हैं. ईरान अब 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम बना चुका है, जो परमाणु बम बनाने के बेहद करीब (90%) माना जाता है. नए इस्लामाबाद MoU में इस भारी-भरकम भंडार को नष्ट करने या कम करने को लेकर अभी कोई ठोस बात नहीं कही गई है, बल्कि इसे भविष्य की वार्ताओं पर छोड़ दिया गया है. ट्रंप ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि अमेरिकी हवाई हमलों के बाद ईरान का ज्यादातर संवर्धित मटीरियल मलबे में दबा हुआ है, इसलिए फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है.
🚨 President Donald J. Trump has SIGNED the Iran Memorandum of Understanding at Versailles in France. 🇺🇸 pic.twitter.com/JQ6qlbvFAF
— The White House (@WhiteHouse) June 17, 2026
300 अरब डॉलर का फंड देगा अमेरिका
पाबंदियां हटाने के मामले में दोनों समझौतों का ढांचा लगभग एक जैसा ही दिखता है. ओबामा की डील में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध हटाए जाने थे. वहीं, नए MoU में भी अंतिम समझौते के बाद पाबंदियां हटाने की बात है, लेकिन अंतर यह है कि यह सीधे तौर पर अमेरिका और ईरान के बीच का मामला है. इस नए समझौते के तहत ईरान को तुरंत तेल और पेट्रोलियम निर्यात करने की छूट मिल गई है.
ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर ट्रंप का नरम रुख
ओबामा प्रशासन की इस बात के लिए कड़ी आलोचना होती थी कि उन्होंने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और मिडिल ईस्ट में उसके सशस्त्र गुटों पर कोई रोक नहीं लगाई. हैरान करने वाली बात यह है कि ट्रंप के नए इस्लामाबाद MoU में भी बैलिस्टिक मिसाइलों या आतंकी फंडिंग का कोई जिक्र नहीं है.
इस मुद्दे पर ट्रंप का रुख बदला हुआ नजर आ रहा है. उन्होंने कहा कि अगर पड़ोसी देशों के पास मिसाइलें हैं, तो ईरान के पास भी अपनी सुरक्षा के लिए मिसाइलें होना कोई गलत बात नहीं है. उनके मुताबिक, न्यूक्लियर हथियारों पर लगाम लगाना ज्यादा जरूरी है, न कि सामान्य मिसाइलों पर. इसके अलावा, ईरान के भीतर चल रहे मानवाधिकार आंदोलनों या प्रदर्शनकारियों की मदद को लेकर भी इस मसौदे में चुप्पी साधी गई है.
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