दुनिया में अभी क्या चल रहा है? तो जवाब है प्रदर्शन. फ्रांस से लेकर अर्जेंटीना तक, इटली से लेकर पुर्तगाल तक और ब्रुसेल्स से लेकर अल्बानिया तक. भारत में कुछ यही चल रहा है. इनमें से कई विरोध-प्रदर्शन ऐसे मुद्दों को लेकर हो रहे हैं, जो लगभग हर देश में देखने को मिलते हैं. इनमें आवास की बढ़ती लागत, महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं के लिए फंड की कमी और मौजूदा सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी जैसे मुद्दे शामिल हैं.
फ्रांस के हालात
इस समय फ्रांस और अल्बानिया को अपनी नीतियों को लेकर हिंसक प्रदर्शनकारियों का सामना करना पड़ रहा है.अब हालात अराजकता की ओर जाते दिख रहे हैं. फ्रांस में दो वजहों से बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. एक तो राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले बढ़ती कीमतों को लेकर लोगों में भारी गुस्सा है, और दूसरी तरफ छात्र और शिक्षक स्कूलों की खराब हालत तथा शिक्षा के बजट में कटौती के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. फ्रांस में अगले साल चुनाव होने हैं. फ्रांस के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते. फिर भी ये हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

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फ्रांस में छात्रों का संकट पिछले महीने पेरिस में शुरू हुआ था. यह शिक्षकों और छात्रों द्वारा शिक्षा के लिए फंडिंग की मांग को लेकर एक छोटा, स्थानीय विरोध-प्रदर्शन था, जो बाद में बड़े इलाके में फैल गया. विरोध-प्रदर्शन शुरू होने के बाद से ही हिंसक झड़पों की खबरें आ रही हैं, और कई इलाकों में कक्षाएं बाधित हुई हैं. आज, ईंधन की बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को लेकर यह एक बड़े विरोध-प्रदर्शन में बदल गया है. फ्रांस के आंतरिक मंत्री लॉरेंट नुनेज़ ने समाचार चैनल 'फ्रांस 24' को बताया कि लोगों की घटती क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) के खिलाफ हुए इन विरोध-प्रदर्शनों में 5.5 लाख लोगों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 1.10 लाख लोग अकेले पेरिस की सड़कों पर उतरे.
इन देशों में भी हो रहे प्रदर्शन
- बेल्जियम में, सार्वजनिक खर्च में कटौती के बीच घरेलू खर्चों में हो रही बढ़ोतरी ने छात्रों को भी विरोध करने के लिए प्रेरित किया है; वे उच्च शिक्षा या विश्वविद्यालय पंजीकरण के लिए अधिक शुल्क नहीं देना चाहते. देखते ही देखते, जीवन-यापन की लागत से जुड़ी चिंताओं को लेकर पूरे बेल्जियम में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए.
- कल, ब्रुसेल्स और लीज में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जिसके चलते पुलिस को उनके खिलाफ वॉटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा. बेल्जियम के आंतरिक मंत्री बर्नार्ड क्विंटिन ने इसे "पूरी तरह से हिंसा" करार दिया, जो "हमारे समाज को अस्थिर करने के लिए सुनियोजित तरीके से बार-बार की गई है." उन्होंने प्रदर्शनकारियों को "दंगाई" कहा.
- पुर्तगाल में, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, कम वेतन और किफायती आवास मिलने में आ रही कठिनाइयों के कारण लिस्बन में हजारों लोगों ने मार्च निकाला. लिस्बन और कई अन्य शहरों में, 2017 के बाद से संपत्तियों की कीमतें दोगुनी से भी अधिक हो गई हैं, जबकि नए किराये के समझौतों (लीज़) के लिए किराये में भी लगभग इतनी ही बढ़ोतरी हुई है. इस स्थिति ने युवा कामगारों और कम आय वाले परिवारों पर दबाव बढ़ा दिया है. कई लोगों का मानना है कि समस्या सिर्फ घर न खरीद पाने तक सीमित नहीं है, बल्कि किराए पर रहना भी लगातार महंगा और आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है. फ्रांसीसी प्रदर्शनकारियों के विपरीत, पुर्तगाल में हो रहे विरोध-प्रदर्शन मुख्य रूप से वेतन, आवास और घर के खर्चों के वहन करने की क्षमता जैसे मुद्दों तक ही सीमित रहे हैं.
- इटली में भी, यूरोप के अन्य हिस्सों की तरह ही हालात देखने को मिल रहे हैं. यहां कई लोग बढ़ती जीवन-लागत के खिलाफ विरोध कर रहे हैं, जबकि उनकी क्रय-शक्ति लगातार घट रही है. मिलान में वेतन न बढ़ने, महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने में आ रही दिक्कतों को लेकर विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनमें झड़पें भी देखने को मिलीं. हालांकि, इटली में हुए ये विरोध-प्रदर्शन फ्रांस की घटनाओं की तुलना में छोटे स्तर के थे.

- अल्बानिया में भी छात्र अपने विश्वविद्यालयों की खराब हालत, शिक्षा की उच्च लागत, वित्तीय सहायता की कमी और ग्रेजुएशन के बाद रोजगार के अवसरों के अभाव को लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं. 13 अक्टूबर को तिराना में शिक्षा मंत्रालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गया. प्रदर्शनकारियों ने इमारत पर ईंटें और कंक्रीट के ब्लॉक फेंके, जिसके जवाब में पुलिस ने सख्त कार्रवाई की. जल्द ही, इन विरोध-प्रदर्शनों का दायरा बढ़ गया और इसमें असमानता, बेरोजगारी तथा अमीर-गरीब के बीच की खाई जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए. इन प्रदर्शनों ने सरकार को एक ऐसी युवा पीढ़ी के दबाव में ला दिया है, जो इस बात को लेकर चिंतित है कि क्या उनकी अर्थव्यवस्था उन्हें ग्रेजुएशन के बाद काम दे पाएगी.
- अर्जेंटीना में इस हफ्ते की शुरुआत में, ब्यूनस आयर्स में राष्ट्रपति जेवियर माइली द्वारा उच्च शिक्षा के बजट में कटौती किए जाने को लेकर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई. संसद के बाहर हजारों विश्वविद्यालय छात्रों, कर्मचारियों, ट्रेड यूनियन के सदस्यों और विपक्षी कार्यकर्ताओं का मुख्य प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन भीड़ से अलग हुए दर्जनों प्रदर्शनकारियों (जिनमें से ज्यादातर ने अपने चेहरे ढके हुए थे) ने पुलिस पर पत्थर और अन्य चीजें फेंकीं. 2023 के आखिर में माइली के सत्ता में आने के बाद से, शिक्षा फंडिंग संकट को लेकर यह पांचवां प्रदर्शन था. यह प्रदर्शन तब हुआ है जब अदालतों ने सरकार को 2025 के एक कानून का पालन करने का आदेश दिया है, जिसके तहत सरकार को सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के लिए अधिक फंड देना अनिवार्य है.
- पिछले महीने तुर्की में, लगातार बढ़ती महंगाई के बीच, पेंशनभोगियों और मजदूर समूहों ने जीवन-यापन के भारी खर्च और अपर्याप्त पेंशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. पेंशनभोगी अंकारा में संवैधानिक न्यायालय के बाहर इकट्ठा हुए और सम्मान के साथ जीने तथा घर के बुनियादी खर्चों को पूरा करने के अपने संवैधानिक अधिकार की मांग की. प्रदर्शन के दौरान, 60 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी अली सेकेरोग्लू ने अपनी आर्थिक परेशानियों और अपने दो बेरोजगार बेटों के बारे में बात करने के बाद, अपनी सर्विस गन से खुद को गोली मार ली.
भारत में क्यों हो रहे प्रदर्शन
भारत में, विपक्षी दलों और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) नामक एक नए व्यंग्यात्मक राजनीतिक समूह (जिसे विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त है) ने सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है. सीजेपी ने NEET परीक्षा पेपर लीक को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था. इस विरोध के चलते अंततः धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. अब सीजेपी और विपक्षी दलों का आरोप है कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (एसआईआर) नामक प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची संशोधन करने में अनियमितताएं बरती गई हैं.भारत के चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े सभी आरोपों को खारिज कर दिया है.

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अमेरिका भी अछूता नहीं
अमेरिका में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का विरोध करने वाले 'नो किंग्स' नेटवर्क ने देश भर के शहरों और समुदायों में रैलियां आयोजित कीं. इनका मकसद लोगों को मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म इलेक्शन) में जल्दी वोट डालने के लिए प्रेरित करना था. इन कार्यक्रमों को 'गैर-राजनीतिक' बताया गया था, हालांकि, इनका आधार ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल से नाराज लोगों द्वारा पिछले लगभग दो वर्षों से किए जा रहे 'नो किंग्स' मार्च और प्रदर्शन ही थे.
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